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अब कांशीराम की राह पर मायावती

हालिया चुनावों में अपने बुरे प्रदर्शन से उबरने की कोशिश में बीएसपी. कांशीराम की नीतियों के रास्ते एक बार फिर मायावती करना चाहती हैं यूपी की सत्ता में वापसी.

लखनऊ में विधानभवन से दो किलोमीटर दूर मॉल एवेन्यू की 12 नंबर की कोठी के बाहर हमेशा की तरह सन्नाटा है, लेकिन अंदरूनी दृश्य आज बदला हुआ है. कोठी के भीतर हर ओर काफी हलचल है. कार्यालय प्रभारी 45 वर्षीय आर. ए. मित्तल बेहद व्यस्त हैं. प्रदेश भर में नए सिरे से सेक्टर और बूथ स्तर तक पार्टी के पुनर्गठन से जुड़ी जानकारियां जुटाई जा रही हैं. 60 फीसदी सेक्टर और 40 फीसदी बूथ कमेटियों का गठन हो चुका है और सितंबर समाप्त होते-होते बाकी काम भी पूरा हो जाएगा. यूपी में लोकसभा और विधानसभा की खाली सीटों के लिए उपचुनाव की घोषणा के 48 घंटे बाद 18 अगस्त को बीएसपी मुख्यालय चुपचाप राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती से मिले जमीनी संगठन के पुनर्गठन के आदेश को अमलीजामा पहनाने में जुटा है.
मायावती का यही अंदाज है. लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से एक भी सीट न जीत पाने के बाद वे चुपचाप प्रदेश में बीएसपी के संगठन को नया कलेवर देने में जुट गई हैं. उपचुनाव न लडऩे की अपनी पुरानी रणनीति पर कायम रहते हुए उन्होंने प्रदेश में संगठन को चुस्त-दुरुस्त करने को तवज्जो दी है. बीएसपी के विधानमंडल दल के नेता और प्रदेश प्रवक्ता स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं, ''यूपी में सपा और बीजेपी के बीच अंदरूनी खेल चल रहा है. जनता को इस खेल को समझने का मौका मिलना चाहिए, इसीलिए बीएसपी उपचुनाव नहीं लड़ रही है. ''
मायावती भले उपचुनाव न लडऩे की अपनी रणनीति पर कायम हों, लेकिन लोकसभा चुनाव में मिली बुरी हार ने उन्हें कई मुद्दों पर बदलने को मजबूर भी किया है. यह बदलाव तब दिखा, जब 2007 के बाद पहली बार 1 जून को मायावती बदायूं में उन दो किशोरियों के घर पहुंचीं जिनकी कथित तौर पर गैंग रेप के बाद पेड़ पर लटकाकर हत्या कर दी गई थी. इसके बाद 7 जुलाई को पिछले दस वर्षों के दौरान वह पहला मौका भी आया, जब बीएसपी के नेता और कार्यकर्ता जनता की समस्याओं को लेकर सड़कों पर उतरे.
दलित-पिछड़ा की सोशल इंजीनियरिंग
लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के तीन दिन बाद 19 मई को मायावती ने लखनऊ के पार्टी मुख्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ''मेरे लाख समझने के बावजूद ब्राह्मण और मुस्लिम समाज गुमराह हो गया, जिससे पार्टी को नुकसान हुआ. '' साफ था कि सोशल इंजीनियरिंग पर टिकी उनकी उम्मीदें धराशायी हो गई थीं. अब मायावती एक बार फिर दलित-पिछड़ा की सोशल इंजीनियरिंग पर वापसी करती दिखाई दे रही हैं. बीएसपी के नए खाके में किसी भी ब्राह्मण को जोन कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी नहीं दी गई है. मुसलमानों में भी पार्टी ने केवल राष्ट्रीय महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी, एमएलसी अतहर खां और नौशाद अली पर भरोसा जताया है. साथ ही मायावती ने सुस्त पड़े संगठन 'बैकवर्ड ऐंड माइनॉरिटी कम्युनिटी एम्प्लाईज फेडरेशन' (बामसेफ) को फिर से खड़ा करने का निर्णय लिया है.
कांशीराम के करीबियों पर भरोसा
लोकसभा चुनाव में बीएसपी के बेहद खराब प्रदर्शन ने मायावती को आखिरकार कांशीराम के के समय के नेताओं की याद दिला दी. लोकसभा चुनाव के बाद संगठन में जब बड़ी जिम्मेदारी देने की बात आई तो मायावती ने बीएसपी के संस्थापक सदस्य और कांशीराम के नजदीकी आर.के. चौधरी पर भरोसा जताया. बीएसपी की शुरुआती सरकारों में परिवहन, स्वास्थ्य और सहकारिता जैसे विभागों के मंत्री रह चुके चौधरी को मायावती ने अनबन के चलते 2001 में पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. चौधरी चुनाव नहीं जीत पाए. फिर भी मायावती ने उन्हें लखनऊ, इलाहाबाद और फैजाबाद मंडल का कोऑर्डिनेटर बना दिया. कांशीराम के साथी रहे आर.एस. कुशवाहा पिछले एक दशक से बीएसपी में हाशिए पर थे. चुनाव के बाद मायावती ने उन्हें न केवल एमएलसी बनाया, बल्कि कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी देकर सक्रिय कर दिया है.
इन तैयारियों के साथ मायावती एक बार फिर यूपी की सत्ता में वापसी का रोडमैप तैयार कर रही हैं. विपक्षियों पर हमलावर बीएसपी के तरकश में कुछ नए तीर भी आए हैं. इसकी बानगी 7 जुलाई को विधानभवन पर बीएसपी के प्रदर्शन में दिखी जब, 'यूपी बन गया अपराध प्रदेश, जिसके मुख्यमंत्री हैं अखिलेश' और 'महंगी सब्जी महंगा तेल, ये देखो मोदी का खेल' जैसे नारों से पूरा माहौल गूंज उठा था. बीएसपी के भीतर कुछ नया होने की आहट सुनाई दे रही है.

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