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कोविड टीकाः क्या हमें मिल पाएगी?

फाइजर के बीएनटी162 टीके के समान वितरण को लेकर विमर्श से पहले एक बड़ी समस्या टीके की पर्याप्त उपलब्धता को लेकर है

जादुई दवा? वैक्सीन टेक्नोलॉजी में फाइजर और बायोएनटेक की एमआरएनए वैक्सीन नए युग की शुरुआत कर सकती है जादुई दवा? वैक्सीन टेक्नोलॉजी में फाइजर और बायोएनटेक की एमआरएनए वैक्सीन नए युग की शुरुआत कर सकती है

सोनाली आचार्जी

नवंबर की 10 तारीख को जब दुनिया फाइजर और बायोएनटेक के एमआरएनए आधारित टीके को तीसरे चरण के ट्रायल में 90 फीसद प्रभावी पाए जाने का जश्न मना रही थी, भारत के चुनौतीपूर्ण स्वास्थ्य ईकोसिस्टम के कई छोटे खिलाड़ी सोच में थे कि क्या वे कभी इस टीके की उपलब्धता का हिस्सा बन पाएंगे. दरअसल, छोटे अस्पतालों और कुछ बड़े सरकारी अस्पतालों में टीके के भंडारण में अमूमन 2 से 8 डिग्री सेल्सियस तक तापमान बनाए रखने की क्षमता है. वहीं, फाइजर के नए टीके बीएनटी162 को छह महीने तक उपयोग के योग्य बनाए रखने के लिए माइनस 70 डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे तापमान में रखने की जरूरत है. मानक फ्रिज में इसका जीवनकाल पांच दिन ही होता है.

विकासशील देशों के लिए अत्यधिक ठंडे भंडारण शृंखला के लिए बुनियादी संरचना तैयार करना बड़ी चुनौती होगी. जिन सुविधा केंद्रों के पास उपयुक्त फ्रीजर नहीं हैं उनके सामने केवल दो विकल्प रह जाएंगे: क) उन्हें मानक फ्रिज में जमा करें और पांच दिनों से कम वक्त में हर कंटेनर में मौजूद सभी 975 डोज का उपयोग कर लें; ख) उन्हें फिर से बर्फ में रखें और जल्द खराब होने से बचाने के लिए कम बार खोलें. मॉडर्ना के विकसित किए जा रहे टीके, जो ऐसी ही तकनीक पर आधारित है, को इतने कम तापमान पर रखने की जरूरत नहीं है. दिलचस्प है कि टीका वितरण के लिए सरकार के मौजूदा ढांचे में स्कूल और आंगनवाड़ी केंद्रों के टीकाकरण बिंदु शामिल हैं जिनमें ऐसी भंडारण सुविधाएं नहीं हैं जिनकी इस टीके को जरूरत है.

टीका लगाने के लिए सिरिंज की कमी होने की भी आशंका है. टीकों की सबसे बड़ी खरीदार यूनिसेफ ने घोषणा की है कि वह प्रारंभिक आपूर्ति और टीकों के पहुंचने से पहले देशों में सिरिंज का पहुंचना सुनिश्चित करने के लिए 2021 तक 1 अरब सिरिंज के प्रबंध की अपनी बड़ी योजना के हिस्से के रूप में अपने गोदामों में 52 करोड़ सिरिंज का स्टॉक करेगी. ऑल इंडिया ड्रग ऐक्शन नेटवर्क की सह-संयोजक मालिनी ऐसोला कहती हैं, ''भारत में किसी भी टीके के समान वितरण के लिए निवेश और उचित कीमत रखने की जरूरत होगी.''

पूर्व में इस साल, कोविड जांच की कीमत अनियंत्रित होने से देश के कई हिस्सों में बहुत सारे लोगों को आरटी-पीसीआर जांच की मौजूदा मानक कीमत 2,400 रुपए से तीन गुना ज्यादा चुकानी पड़ी. स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का मानना है कि इसी तरह टीकों तक भी केवल उन्हीं लोगों की पहुंच होने की आशंका है जो उसे खरीदने में सक्षम होंगे. लेकिन, भारत जैसे विकासशील देशों में बीएनटी162 के समान वितरण की चुनौतियों को लेकर बहस से पहले एक बड़ी समस्या टीके की पर्याप्त आपूर्ति हासिल करने की है.
 
वहीं, जुलाई में ब्रिटेन ने टीके की 9 करोड़ खुराक के लिए फाइजर के साथ समझौता किया. टीके के नतीजों को देखने के बाद, ब्रिटेन ने कंपनी को टीके को अंतिम मंजूरी मिलने के साथ ही 4 करोड़ खुराक का ऑर्डर दिया है जो उसकी एक-तिहाई आबादी के टीकाकरण के लिए पर्याप्त है. अमेरिका और कनाडा ने भी जुलाई में फाइजर के साथ क्रमश: 60 करोड़ और 2 करोड़ खुराक के लिए सौदे किए थे. वहीं, भारतीय कंपनियों ने ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका टीके के लिए एक समझौता किया है जिसके नतीजों की अभी भी प्रतीक्षा ही है. इस पर कोई स्पष्टता नहीं है कि भारत को बीएनटी162 की कितनी खुराक इस साल मिल सकती है. टीके के समान वितरण के लिए संघर्षरत कार्यकर्ता, टीके के विकसित देशों के विशाल ऑर्डर को लेकर चिंतित हैं क्योंकि इससे विकासशील दुनिया के लिए बहुत सीमित मात्रा में ही स्टॉक बचेगा.

फाइजर के एक प्रवक्ता के अनुसार, ''वर्तमान अनुमानों के आधार पर, फाइजर ने 2020 में 5 करोड़ टीके की खुराक और 2021 में 1.3 अरब खुराक तक का उत्पादन करने की उम्मीद की है. अगर हमारा टीका सफल होता है, तो फाइजर उन देशों में उपलब्ध खुराक आवंटित करेगा जिनके साथ हमने आपूर्ति संबंधी समझौते किए हैं.''

वैक्सीन को अभी कुछ और मानदंडों पर खरा उतरना होगा. प्रवक्ता बताते हैं, ''वर्तमान नतीजा, चरण 3 नैदानिक अध्ययन से एक समिति (डीएमसी) की ओर से किए गए पहले और एकमात्र अंतरिम प्रभावकारिता विश्लेषण पर आधारित हैं. इस पहले अंतरिम विश्लेषण ने 16 से 85 वर्ष की आयु के बीच के कोविड संक्रमित ऐसे लोगों पर परीक्षण के आधार पर तैयार किया गया जिन्हें पहले कभी सार्स-सीओवी-2 संक्रमण नहीं हुआ था. प्रोटोकॉल के मुताबिक, हम तब तक अध्ययन जारी रखेंगे जब तक हम कम से कम 164 मामलों में अध्ययन और अंतिम विश्लेषण का काम पूरा कर लें. जरूरी सुरक्षा मानदंडों के प्राप्त होने के बाद इसे यू.एस. फूड ऐंड ड्रग ऐडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) के सामने आपातकालीन उपयोग मंजूरी के लिए पेश किया जाएगा. ऐसा नवंबर के तीसरे सप्ताह में होने की उम्मीद है.''

सब ठीक रहा तो बीएनटी162 टीका तकनीक एक नए युग की शुरुआत कर सकता है. एमआरएनए टीका नया है क्योंकि इसमें अन्य टीकों की तरह कमजोर या परिवर्तित रूप में वास्तविक वायरस नहीं होता. इसके बजाए, इसमें एक एमआरएनए स्ट्रैंड होता है जो एक रोग-विशेष ऐंटीजन के लिए कोड होता है. एक बार जब स्ट्रैंड शरीर की कोशिकाओं के अंदर पहुंच जाता है तो कोशिकाएं स्ट्रैंड में मौजूद आनुवांशिक जानकारी का उपयोग ऐंटीजन के स्वयं उत्पादन करने के लिए करती हैं. इस ऐंटीजन को प्रतिरक्षा प्रणाली पहचान लेती है जो प्रतिक्रियास्वरूप तब ऐंटीबॉडी का उत्पादन शुरू करती है और इससे शरीर तभी प्रतिक्रिया देना शुरू करता है जब उसे वास्तविक रूप में वायरस का सामना करना पड़ता है.

प्रभावी होने के लिए फाइजर टीके के दो खुराक की जरूरत होगी. कंपनी के प्रवक्ता ने कहा, ''चूंकि किसी वायरल वेक्टर का उपयोग नहीं हुआ है, एमआरएनए  टीके से ऐसे किसी ऐंटी-वेक्टर को पैदा होने की आशंका नहीं रहती जो ऐंटीबॉडी को प्रभावहीन कर दे. इससे बार-बार बूस्टिंग की अनुमति मिलती है, जो भविष्य में अतिरिक्त टीकाकरण की जरूरत में अहम हो सकती है.''

अगर टीके को संभावित म्युटेशन के लिए जल्दी से अनुकूल होने की जरूरत हो तो एमआरएनए तकनीक उसमें तेजी से सक्षम करती है. अन्य आरएनए या डीएनए आधारित टीकों में जटिल स्तनधारी कोशिका तंत्र की जरूरत होती है, पर यह तकनीक उसके बिना भी कुशल और तेजी से उत्पादन प्रक्रिया शुरू करती है. डीबीटी/वेलकम ट्रस्ट इंडिया एलायंस के डॉ. शाहिद जमील कहते हैं, ''यह एक नई तकनीक है, पर इससे टीकों का उत्पादन ज्यादा सुव्यवस्थित और तेज होगा.''

लेकिन जाहिर है, इस खुशी में बीएनटी162 की वैश्विक आपूर्ति और राष्ट्रीय वितरण की चुनौतियां भारत में खलल डालने वाली हैं.

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