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टूलकिट मामलाः विरोध की जगह नहीं?

दिशा रवि की गिरफ्तारी ने राजद्रोह के बढ़ते मामलों पर भी ध्यान दिलाया है, अब बहुत सामान्य मामलों में भी इस कानून का इस्तेमाल हो रहा है

आजादी के गीत दिशा रवि की रिहाई की मांग में बेंगलूरू में 15 फरवरी को विरोध-प्रदर्शन आजादी के गीत दिशा रवि की रिहाई की मांग में बेंगलूरू में 15 फरवरी को विरोध-प्रदर्शन

राजद्रोह के आरोप में बेंगलूरू की 21 वर्षीया पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि की गिरफ्तारी ने लोकतंत्र में नागरिकों के विरोध के अधिकार का हनन करने वाले एक कठोर कानूनी प्रावधान पर फिर से बहस छेड़ दी है. मुंबई की वकील निकिता जैकब और पुणे के इंजीनियर शांतनु मुलुक के साथ दिशा पर किसानों के विरोध-प्रदर्शन के लिए तैयार एक विवादित 'टूलकिट' के ऑनलाइन संपादन के आरोप हैं. 26 जनवरी को दिल्ली में भड़की हिंसा में उस टूलकिट की कथित भूमिका की जांच हो रही है. तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में बीते नवंबर से राजधानी में किसानों का प्रदर्शन जारी है.

स्वीडिश जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग के 2 फरवरी को ट्वीट करने के बाद वह टूलकिट दुनिया की नजर में आया. 4 फरवरी को दिल्ली पुलिस ने इसके 'रचनाकारों' पर प्राथमिकी दर्ज की. उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए, 120ए और 153ए के तहत राजद्रोह, आपराधिक साजिश और घृणा को बढ़ावा देने के आरोप लगाए गए.

पुलिस का दावा है कि टूलकिट खालिस्तान समर्थक समूह कनाडा स्थित पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन (पीजेएफ) ने बनाया था और दिशा ने इसे संपादित करने के बाद थनबर्ग से साझा किया. उनका यह भी दावा है कि निकिता और मुलुक ने पीजेएफ की एक जूम मीटिंग में भाग लिया. पुलिस ने इसके लिए 21 और 27 जनवरी के बीच दिल्ली में टिकरी बॉर्डर पर प्रदर्शन के दौरान मुलुक की मौजूदगी का हवाला दिया.


निकिता और मुलुक ने अग्रिम जमानत के लिए बॉम्बे हाइकोर्ट का रुख किया, वहीं दिशा को 14 फरवरी को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में ले लिया. दिशा ने अदालत को बताया कि उन्होंने टूलकिट बनाया नहीं था, उसकी केवल 'दो पंक्तियों को संपादित' किया था. उन्हें पांच दिनों की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया.

टूलकिट में क्या है?

'टूलकिट' एक शब्द है जिसका इस्तेमाल कार्यकर्ताओं की ओर से अभियान सूचना दस्तावेज के लिए किया जाता है. इसका प्रयोग कार्यकर्ता किसी मुद्दे पर जरूरी जानकारियां देने और उपयोगकर्ताओं के आपसी समन्वय से विभिन्न तरीकों से विरोध प्रदर्शन और अधिकारियों पर दबाव बनाने के लिए मार्गदर्शन देने में करते हैं. इस मामले में टूलकिट किसानों के विरोध और स्थिति को बेहतर ढंग से समझने और अपने विवेक से यह फैसला लेने में सक्षम बनाने के लिए तैयार किया गया कि लोग किसानों का समर्थन किस प्रकार कर सकते हैं. पुलिस बताती है कि टूलकिट में 'एक डिजिटल स्ट्राइक और 26 जनवरी को वास्तविक कार्रवाई जैसे सक्रिय अभियान का खाका है'.

अधिकारियों के अनुसार, 26 जनवरी को लाल किले में हुई घटनाओं सहित हिंसा का पैटर्न टूलकिट में विस्तृत रूप से बताई गई 'कार्य योजना' के मुताबिक रहा. दिल्ली पुलिस के ज्वाइंट कमिशनर प्रेम नाथ कहते हैं, ''26 जनवरी को हुई घटनाओं के संदर्भ में देखें तो ऐसा लगता है कि टूलकिट में जो कार्य योजना बताई गई थी उसे जमीन पर क्रियान्वित किया गया था.''

टूलकिट के दूसरे भाग में कथित तौर पर भारत की सांस्कृतिक विरासत जैसे कि 'योग, चाय और विदेशों में विभिन्न राजधानियों में भारतीय दूतावासों को लक्षित करके व्यवधान पैदा करने का उल्लेख है.' सूचीबद्ध की गई तत्काल कार्रवाइयों में 'ट्विटर पर हंगामा' और दूतावासों के बाहर विरोध प्रदर्शन शामिल हैं.

फरवरी के पहले हफ्ते में अमेरिकी पॉप स्टार रिहाना, वकील-कार्यकर्ता मीना हैरिस (अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की भतीजी), पूर्व पोर्न स्टार मिया खलीफा और कई वैश्विक हस्तियों ने किसान आंदोलन के समर्थन में ट्वीट किया. विदेश मंत्रालय ने कड़े लहजे में इसका विरोध किया. सरकार इसे भारतीयों के बीच असहमति पैदा करने का 'वैश्विक अफवाह अभियान' कहती है.

दिशा रवि कौन हैं?

दिशा पहली बार अफसरों का सामना नहीं कर रही हैं. बेंगलूरू में माउंट कार्मेल कॉलेज से स्नातक रवि, 2018 में शुरू किए गए थनबर्ग के क्लाइमेट ऐक्शन ग्रुप फ्राइडेज फॉर फ्यूचर (एफएफएफ) का हिस्सा हैं. रवि भारत में इस संस्था की प्रमुख हैं. पिछली जुलाई में, दिल्ली पुलिस ने अस्थायी रूप से एफएफएफ इंडिया की वेबसाइट की सामग्री को 'आपत्तिजनक' और 'गैरकानूनी या आतंकी कार्रवाई' बताते हुए इसे ब्लॉक कर दिया था, और समूह पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम या यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया था. दिल्ली पुलिस ने बाद में 'लिपिकीय त्रुटि' का हवाला देते हुए आरोप वापस ले लिए. एफएफएफ के सदस्यों का कहना है कि उन्होंने नए पर्यावरण प्रभाव आकलन 2020 मसौदे का विरोध करने के लिए पर्यावरण मंत्रालय को ई-मेल की झड़ी लगाने के अलावा और कुछ नहीं किया था.

लीक हुई चैट में दिखता है कि 'टूलकिट' को थनबर्ग के ट्वीट करने के बाद, दिशा ने उसे दस्तावेज पोस्ट न करने के लिए कहा क्योंकि उन दोनों के नाम उस पर थे. एक बार पहले भी यूएपीए के चक्कर में उलझने के बाद, दिशा ने थनबर्ग को ''थोड़े वक्त के लिए कुछ भी नहीं कहने को कहा'' क्योंकि मुद्दे ने तूल पकड़ना शुरू कर दिया था और उन पर सख्त कानून के तहत फिर से कार्रवाई हो सकती है.

दुरुपयोग और भ्रम निवारण

राजनेताओं, शिक्षाविदों और कई हस्तियों ने दिशा की गिरफ्तारी की निंदा करते हुए इसे भारतीय लोकतंत्र पर हमला बताया है. न्याय के लिए समान पहुंच की वकालत करने वाले संगठनों के एक समूह कैंपेन फॉर जूडिशियल एकाउंटबिलिटी ऐंड जूडिशियल रिफॉर्म्स ने कहा कि दिल्ली पुलिस की कार्रवाई ''कानून की स्थापित प्रक्रियाओं का भद्दा मजाक'' है.

दिशा की गिरफ्तारी ने राजद्रोह के मामलों की बढ़ती संख्या पर भी ध्यान दिलाया है. इस ब्रिटिश युग के कानून को बीते कुछ वर्षों में सामान्य मामलों में भी लागू किया गया (इनमें कर्नाटक के बिदर में एक स्कूली नाटक जिसमें प्रधानमंत्री की आलोचना की गई थी, और अभिनेत्री-राजनीतिक दिव्या स्पंदना की टिप्पणी कि 'पाकिस्तान नरक नहीं है, वहां के लोग हमारे जैसे ही हैं' जैसे मामले शामिल हैं). राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, राजद्रोह के दर्ज मामले 2016 में 35 से बढ़कर 2019 में 93 हो गए.

कानूनी प्रणाली पर अनुसंधान और रिपोर्ट तैयार करने वाले एक मंच, आर्टिकल 14 ने पाया कि सिर्फ किसान आंदोलन को लेकर राजद्रोह के छह मामले दर्ज हुए हैं. यूपीए के दूसरे कार्यकाल (2010-14) की तुलना में एनडीए शासन (2014-20) में साल-दर-साल दर्ज राजद्रोह के मामलों में 28 फीसद की वृद्धि हुई है. ज्यादातर मामले अदालत में टिके नहीं—2016 में सजा दर 33.3 फीसद से 2019 में 3.3 फीसद रह गई है और आरोप हैं कि सरकार इसका इस्तेमाल असंतोष की आवाज को दबाने लिए कर रही है.

सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि राजद्रोह कानून सिर्फ हिंसा भड़काने या जिससे हिंसा भड़कने की आशंका हो उन कार्यों के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए. कुछ विशेषज्ञों का दावा है कि टूलकिट का कोई भी हिस्सा, विरोध के लिए हिंसा का प्रयोग करने की बात नहीं करता. सुप्रीम कोर्ट के वकील उत्कर्ष सिंह कहते हैं, ''महज टूलकिट का उपयोग कोई अपराध नहीं है. जांच में शामिल होने के लिए दिशा को उचित मौका दिया जाना चाहिए था. यह गिरफ्तारी विरोध करने वालों को सरकार की ओर से एक सख्त संदेश देने के लिए हुई है.'' वैसे सभी कानूनी विशेषज्ञ इससे सहमति नहीं जताते. सुप्रीम कोर्ट की वकील मोनिका अरोड़ा कहती हैं, ''जिसके पास भारत को बदनाम करने के उद्देश्य से तैयार किसी दस्तावेज को संपादित करने की पहुंच थी, वह निश्चित रूप से राजद्रोही कृत्य में शामिल है.''
—साथ में अनिलेश एस. महाजन

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