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'बड़े भाई' भाजपा को नहीं दे रहे नीतीश थाह

देशव्यापी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के प्रति असहमति जताने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री अब चाहते हैं कि एनपीआर सर्वे में से विवादित नए प्रश्न हटाए जाएं

सोनू किशन सोनू किशन

अमिताभ श्रीवास्तव

देशव्यापी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) तैयार करने के नरेंद्र मोदी सरकार के प्रस्ताव को खारिज करने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अब मांग की है कि राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) बनाने के लिए शुरू होने जा रही प्रक्रिया में प्रस्तावित सर्वेक्षण के लिए शामिल किए गए नए अतिरिक्त प्रश्नों को हटा कर इसे मौजूदा प्रारूप के अनुसार ही आयोजित किया जाए.

बीती 28 जनवरी को पटना में मीडियाकर्मियों से बात करते हुए नीतीश ने कहा, ''अगर आप मुझसे मेरी मां के जन्म की तारीख पूछें तो मैं भी इसका जवाब नहीं दे पाऊंगा.'' पहले के समय में, गांव के लोग इस तरह के विवरणों का कोई लेखा-जोखा नहीं रखते थे. अब भी बड़ी संख्या में ऐसे गरीब लोग हो सकते हैं जिन्हें अपने माता-पिता की जन्म तिथि और जन्म स्थान का पता न हो.''

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के लिए सर्वेक्षण इस साल शुरू होना है जिसमें 21 सवाल हैं, जो 2010 में तत्कालीन यूपीए सरकार के कार्यकाल में सर्वेक्षण के लिए घोषित प्रक्रिया से छह अधिक हैं. इन नए सवालों में से कुछ—जैसे, माता-पिता के जन्म की जगह और तारीख - की वजह से राजनैतिक तूफान खड़ा हो गया है और विपक्षी दलों का दावा है कि मोदी सरकार ये विवरण राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनसीआर) तैयार करने में उपयोग के लिए जुटाना चाहती है.

बिहार में एनपीआर की कवायद विधानसभा चुनाव से चार महीने पहले मई में शुरू होने की संभावना है. यद्यपि उत्तरदाताओं के पास कुछ सवालों के जवाब न देने का विकल्प होगा और ऐसे में गणनाकर्मी उसे 'डैश' के निशान से चिह्नित करेगा, फिर भी अटकलें हैं कि एनआरसी बनाने के दौरान ये खाली प्रतिक्रियाएं लोगों के खिलाफ जा सकती हैं. जनता दल-यूनाइटेड जेडी(यू) के एक नेता का कहना है कि, ''हम चाहते हैं कि लोगों के बीच किसी भी तरह का भ्रम खत्म करने के लिए केंद्र एनपीआर का पुराना प्रारूप ही लागू करे.''

16 लोकसभा सांसदों के साथ, जद(यू) राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का दूसरा सबसे बड़ा घटक है. पार्टी ने पिछले साल दिसंबर में संसद में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) के पक्ष में मतदान किया था. लेकिन इसके बाद नीतीश ने संकेत भी दिए कि भाजपा यह मान कर न चले कि उनका समर्थन तो हर हाल में मिलेगा ही. उन्होंने 13 जनवरी को एनआरसी के विचार को अस्वीकार कर दिया था और अब जद(यू) एनपीआर पर अपना रुख साफ कर दिया है.

एनपीआर पर नीतीश की मांग उसी दिन सामने आई जिस दिन उन्होंने जद(यू) के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर और वरिष्ठ सदस्य पवन के. वर्मा को सीएए की आलोचना करने पर चेतावनी जारी की. किशोर और वर्मा को अगले दिन जद(यू)से निष्कासित कर दिया गया था. इन दोनों घटनाओं को अलग-अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए. जद(यू) के एक नेता का कहना है, ''एक दौर में प्रशांत किशोर सर्वश्रेष्ठ चुनाव अभियान रणनीतिकार रहे हैं. संभावना यह भी है कि बिहार विधानसभा चुनाव के लिए वे विपक्ष के साथ चले जाएं. ऐसे में, बहुत महत्वपूर्ण मुद्दों पर हम अपना रुख अस्पष्ट नहीं रख सकते ताकि विपक्षी उसका लाभ उठाएं.''

निष्कासन के बाद किए एक ट्वीट में किशोर ने नीतीश को धन्यवाद देते हुए उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी रखने के लिए शुभकामनाएं दीं. जद(यू) में कई लोग इसे व्यंग्यात्मक टिप्पणी के रूप में देखते हैं और इस संभावना को नकारते नहीं कि आगामी विधानसभा चुनाव में किशोर पार्टी के खिलाफ चुनौती खड़ी कर सकते हैं. एक अन्य जद(यू) नेता का कहना था, ''हम तैयार हैं. दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद प्रशांत किशोर को अपने इरादे स्पष्ट करने दें.''

बिहार के राजनीतिक दल चुनाव की तैयारियों में जुट गए हैं. राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता तेजस्वी यादव 'बेरोजगारी हटाओ यात्रा' शुरू करने वाले हैं तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआइ) नेता कन्हैया कुमार की सीएए के खिलाफ घोषित 'संविधान बचाओ' यात्रा राज्य में पहले से ही चल रही है. नीतीश ने जनवरी में पार्टी सदस्यों के साथ विचार-विमर्श किया था. अब जद(यू) बूथ स्तर पर तैयारियों को आगे बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है.

गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की है कि नीतीश बिहार विधानसभा चुनाव में राजग के अभियान का नेतृत्व करेंगे. 2019 के लोकसभा चुनाव में 40 में से 39 सीटें जीतने वाले गठबंधन के पास विपक्षी गठजोड़ के खिलाफ मनोवैज्ञानिक बढ़त है परंतु जद(यू) के एक वरिष्ठ नेता ने इंडिया टुडे से कहा कि आम चुनाव में विपक्ष धराशायी हो गया था, फिर भी विधानसभा का मुकाबला एकतरफा होने के आसार नहीं हैं. इस नेता ने कहा, ''हम जानते हैं कि कन्हैया को तेजस्वी के साथ लाने के प्रयास चल रहे हैं. लोकसभा चुनाव के विपरीत, विपक्षी गठबंधन विधानसभा चुनाव में वाम दलों को भी साथ ले सकता है. ऐसे में हम आत्मसंतुष्ट होने का जोखिम नहीं उठा सकते.''

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