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बातचीतः मैं चुनाव नहीं, परंपरा के मुताबिक अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष बना हूं

निरंजनी अखाड़ा के अध्यक्ष रवींद्र पुरी ने इंडिया टुडे के एसोसिएट एडिटर आशीष मिश्र से बातचीत की.

निरंजनी अखाड़ा के अध्यक्ष रवींद्र पुरी निरंजनी अखाड़ा के अध्यक्ष रवींद्र पुरी

निरंजनी अखाड़ा के अध्यक्ष रवींद्र पुरी को 25 अक्तूबर को प्रयागराज में अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष चुना गया. उन्होंने अपने ऊपर आरोपों पर सफाई दी.

 अखाड़ा परिषद में विवाद की आप क्या वजह मानते हैं?

विवाद कुछ नहीं है. असल में मेरा चुनाव नहीं हुआ है. एक वर्ष पहले अखाड़ा परिषद का चुनाव हुआ था जिसमें नरेंद्र गिरि को अध्यक्ष बनाया गया था. अखाड़ा परिषद की परंपरा है कि अगर कार्यकाल के बीच में अध्यक्ष की मौत हो जाती है, तो उसका पद उसी अखाड़े के दूसरे पदाधिकारी को मिल जाता है.

इस तरह परंपरा के अनुसार अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष पर मेरा ही अधिकार है. अखाड़ा परिषद का चुनाव व्यक्ति का नहीं बल्कि अखाड़ों का होता है. अध्यक्ष का पद रिक्त होने पर पूरी कार्यकारिणी का चुनाव हो, ऐसा नहीं होता है. दूसरे अखाड़ों की महत्वाकांक्षाएं ही अखाड़ा परिषद के विवाद की जड़ है.

 उनकी क्या महत्वाकांक्षाएं हैं?

यह मैं नहीं जानता. अगर 25 अक्तूबर को अखाड़ा परिषद की प्रस्तावित बैठक से पहले चुनाव कराना था तो नियमानुसार 20 दिन पहले एजेंडा जारी करना चाहिए था. दूसरे गुट ने शाम को अचानक बैठक की और 21 अक्तूबर को महानिर्वाणी अखाड़े के रवींद्र पुरी को अध्यक्ष घोषित कर दिया. यह कोई चुनाव नहीं है. अखाड़ा परिषद की बैठक बुलाने का अधिकार महामंत्री को होता है.

 दूसरे गुट का तर्क है कि नरेंद्र गिरि की मौत के बाद कार्यकारी अध्यक्ष देवेंद्र सिंह शास्त्री की अध्यक्षता में 21 अक्तूबर को हरिद्वार में अखाड़ा परिषद की बैठक बुलाई गई थी.

देवेंद्र सिंह शास्त्री से पूछो कि उन्हें कब कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया. उसका प्रस्ताव कहां है. वह दिखाएं. नरेंद्र गिरि की मौत के बाद अखाड़ा परिषद की कोई बैठक नहीं हुई तो वह कार्यकारी अध्यक्ष कैसे बन गए. दूसरे गुट ने केवल फर्जीवाड़ा किया है.

 आपको केवल संन्यासियों की अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष बताया जा रहा है. आपको सभी संप्रदायों का समर्थन नहीं हासिल है?

मुझे देश के 90 फीसदी संतों से जुड़े अखाड़ों का समर्थन हासिल है. मेरे पास भरपूर समर्थन होने के कारण ही दूसरे गुट ने आनन-फानन में हरिद्वार में चुनाव कराया. अगर उनके पास बहुतायत संतों का समर्थन होता तो वह ऐसा नहीं करते.

 निर्मल अखाड़े द्वारा आपको समर्थन पर सवाल खड़े हो रहे हैं?

निर्मल अखाड़े के अध्यक्ष या श्रीमहंत रेशम सिंह हैं. रेशम सिंह ने हमें समर्थन दिया है. हरिद्वार में दूसरा गुट ज्ञान देव सिंह के समर्थन का दावा कर रहा है जबकि कोर्ट ने इन्हें निर्मल अखाड़ा का अध्यक्ष नहीं माना है.

 वर्ष 2022 में उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में आपकी अखाड़ा परिषद की भी क्या कोई भूमिका रहेगी?

संत समाज तो भारतीय जनता पार्टी का सहयोगी है.

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