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पुरानी कांग्रेस का नया संकल्प

बहुतेरे लोग महसूस करते हैं कि नई कमेटियां कुछ और नहीं बल्कि जी-23 के बागी नेताओं के तेवर ठंडे करने की एक चेष्टा मात्र है

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एक नई विचार प्रक्रिया? सोनिया और राहुल गांधी अन्य कांग्रेस नेताओं के साथ उदयपुर में एक नई विचार प्रक्रिया? सोनिया और राहुल गांधी अन्य कांग्रेस नेताओं के साथ उदयपुर में

उदयपुर में कांग्रेस का तीन दिवसीय नवसंकल्प शिविर खत्म होने के एक दिन बाद 16 मई को पार्टी में एक औपचारिक हाव-भाव दिखाई दिया. अखिल भारतीय मछुआरा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष टी.एन. प्रतापन ने अपने पद से—यानी उस पद से जिसे वे 2017 से संभाल रहे थे—इस्तीफा दे दिया. ऐसा उन्होंने उदयपुर संकल्प की भावना का अक्षरश: पालन करते हुए किया, जिसमें अन्य बातों के अलावा घोषणा की गई कि पार्टी में कोई भी व्यक्ति एक पद पर पांच साल से अधिक नहीं रहेगा. अब मुख्य सवाल यह है—सांगठनिक सुधारों के मामले में क्या पार्टी के दूसरे दिग्गज स्वेच्छा से कथनी को करनी में बदलेंगे?

यह बात खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने स्वीकार की कि अगर कांग्रेस में नई जान फूंकने की राह खोजनी है तो पार्टी संगठन के ढांचे में अहम बदलाव करने की तत्काल जरूरत है. उन्होंने अपने समापन भाषण में कहा कि 'सर्वाधिक तत्काल प्रासंगिक' संकल्प सांगठनिक सुधारों से संबंधित हैं. मगर पार्टी के कई विभागों के प्रमुख पांच से ज्यादा साल से पदों पर काबिज हैं—कम्युनिकेशन, लॉ, रिसर्च और प्रोफेशनल कांग्रेस को ही लीजिए. मुकुल वासनिक, खुद उन्हीं के शब्दों में, दो दशकों से ज्यादा वक्त से महासचिव हैं. क्या हम हरेक को प्रतापन के हाव-भाव के अनुरूप कदम उठाते देखेंगे?

उदयपुर में पार्टी ने कुछ और बुनियादी फैसले लिए. संगठन में एक नया स्तर बनाया गया है—मंडल समितियां, जो बूथ और ब्लॉक स्तरों के बीच होंगी. बूथ से लेकर सर्वोच्च निर्णयकारी निकाय कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) तक हरेक पदाधिकारी के काम का मूल्यांकन किया जाएगा. उदयपुर संकल्प के दो दिन बाद अजय माकन ने कहा, ''महासचिवों को निश्चित कार्य सौंपे जाएंगे और महासचिव (संगठन) काम के आधार पर उनका मूल्यांकन करेंगे.''

बूथ से लेकर ऊपर सीडब्ल्यूसी तक कांग्रेस की हरेक समिति में 50 फीसद सदस्य 50 साल से कम उम्र के होंगे. परिवार के केवल एक व्यक्ति को टिकट मिल सकता है. दूसरे व्यक्ति को टिकट का अधिकार तभी हासिल होगा जब उसने संगठन का काम करते हुए कम से कम पांच साल बिताए होंगे. आंतरिक सुधार की प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने के लिए पार्टी एक ठोस कार्य बल का गठन करेगी.

ये बदलाव उदयपुर में तय पार्टी के राजनैतिक एजेंडे को कामयाबी के साथ लागू करने के लिए बेहद अहम होंगे. ग्रैंड ओल्ड पार्टी ने 'भारत जोड़ो' नारे के साथ एक नया नैरेटिव या अफसाना पेश करते हुए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी से लड़ने का संकल्प लिया. संकल्प में कहा गया है कि भाजपा की विभाजन की राजनीति, अर्थव्यवस्था की खराब साज-संभाल और सामाजिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़ों, महिलाओं, किसानों और युवाओं के प्रति उदासीनता से लड़ने के लिए पार्टी देश भर में पदयात्रा निकालेगी.

मगर कार्य बल को अपने नैरेटिव को लोगों तक ले जाने के लिए सुधारों को अंजाम देना होगा. संगठन के चुनाव चल रहे हैं इसलिए सितंबर तक समय लेने का बहाना पार्टी के पास पहले ही मौजूद है. कुछ प्रस्तावित कदम बिल्कुल नए-नवेले भी नहीं हैं; बात बस यह है कि उन्हें लागू करने का पिछला रिकॉर्ड बहुत खराब रहा है. मसलन, भारत के लोगों का 'लगातार, वैज्ञानिक फीडबैक' लेने के लिए पार्टी एक पब्लिक इनसाइट या जन परख विभाग बनाएगी. फीडबैक का तंत्र पार्टी में पहले से मौजूद है, पर पहले नेतृत्व ने अक्सर, फर्ज कीजिए, अपने डेटा एनालिटिक्स विभाग या स्वतंत्र एजेंसियों की तरफ से दिए गए फीडबैक के खिलाफ काम किया.

मसलन, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ भारी सत्ता विरोधी भावना के बारे में एक रिपोर्ट पार्टी हाइकमान को राज्य में चुनाव होने से तकरीबन एक साल पहले दी गई थी. फिर भी पूर्व मुख्यमंत्री को हटाने या सुधार के उपाय करने में पार्टी को करीब छह महीनों का वक्त लग गया. 2021 में पार्टी को असम में एआइयूडीएफ (ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) के साथ गठबंधन कायम करने के खिलाफ सलाह दी गई थी, जबकि एक और आंतरिक रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने के बारे में पक्के तौर पर बात की गई थी. दोनों ही मामलों में पार्टी ने दी गई सलाह के एकदम उलटा काम किया.

पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए राष्ट्रीय प्रशिक्षण संस्थान बनाने का फैसला भी किया गया है और चुनाव प्रबंधन विभाग भी. पार्टी में चुनाव समन्वय समिति पहले से है, जिसके सदस्य राहुल गांधी, सी.पी. जोशी, दिग्विजय सिंह, जनार्दन द्विवेदी, गुलाम नबी आजाद, जयराम रमेश और रणदीप सिंह सुरजेवाला हैं. प्रशिक्षण विभाग भी है जिसकी कमान राहुल के करीबी सहयोगी सचिन राव के हाथ में है. यह अलग बात है कि कोई नहीं जानता कि कांग्रेस के इन विभिन्न विभागों की बैठकें अगर होती भी हैं तो कब होती हैं. इन समितियों के कामकाज की निगरानी और मूल्यांकन करने का भी कोई तंत्र नहीं है.

तिस पर भी समितियों से समितियां बनाने का यह तमाशा जारी है. सोनिया गांधी ने कहा कि वे सीडब्ल्यूसी के कुछ सदस्यों को लेकर एक सलाहकार समूह बनाएंगी, जो नियमित बैठकें करके पार्टी के सामने आने वाले राजनैतिक मुद्दों और चुनौतियों पर विचार-विमर्श करेगा. कम से कम कहा जाए तो यह फैसला दिमाग चकराने वाला है. सितंबर तक पार्टी नया अध्यक्ष चुनेगी. पार्टी संविधान के मुताबिक, नए अध्यक्ष के आने के बाद नई सीडब्ल्यूसी बनानी होगी और उसके 25 में से 12 सदस्यों का चुनाव करना होगा. बाकी सदस्य अध्यक्ष की ओर से मनोनीत किए जाएंगे. नया अध्यक्ष चाहे जो बने, नई सीडब्ल्यूसी का गठन करना ही होगा. उस स्थिति में मौजूदा सीडब्ल्यूसी से काटकर बनाए गए इस सलाहकार समूह का कार्यकाल बहुत छोटा होगा.

ज्यादा बड़ी विडंबना यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष ने संगठन और संचालन से जुड़े मसलों पर अपनी सहायता के लिए सितंबर 2020 में छह सदस्यों की एक समिति बनाई थी, जिसके सदस्य ए.के. एंटनी, स्वर्गीय अहमद पटेल, मुकुल वासनिक, अंबिका सोनी, के.सी. वेणुगोपाल और सुरजेवाला थे. यह भी तब बनाई गई थी जब कांग्रेस में एक कोर कमेटी पहले से थी, जिसमें फिर वही एंटनी, वेणुगोपाल और सुरजेवाला के अलावा गुलाम नबी आजाद, पी. चिदंबरम, अशोक गहलोत और जयराम रमेश थे. कांग्रेस के निराश-हताश अंतरंग साथी पूछ रहे हैं कि यह नई समिति भला कौन-सा बुनियादी नयापन ला पाएगी.

दरअसल कार्य बल के सामने चुनौती ठीक-ठीक यह पक्का करना है कि वह पार्टी की सुस्ती और काहिली के इतिहास को उलट दे. कइयों को शक है कि नई समिति और कार्य बल के गठन का ऐलान तेवर ठंडे करने की एक चेष्टा भर है—महज इसलिए कि जी-23 के कुछ प्रमुख विद्रोही सदस्यों को जगह दी जा सके. कई दिग्गज सदस्यों के भी बैरी बन जाने की संभावना है क्योंकि जून और जुलाई में वे अपनी राज्यसभा सीटों से हाथ धो बैठेंगे. लिहाजा, उन नेताओं के मिजाज को दुरुस्त रखना बेहद जरूरी है. कयास तो यह भी है कि यह समिति और कुछ नहीं बल्कि 'कांग्रेस का मार्गदर्शक मंडल'—यानी बड़े-बूढ़ों का रियायरमेंट होम—है.

मगर इस पर आम राय है कि कांग्रेस को अपना 'मार्ग' अब खोजना ही होगा. यही कारण है कि नेतृत्व का सवाल सबसे अहम है क्योंकि निर्णायक नेतृत्व ही विभिन्न तरह के सुधारों को अंजाम दे सकेगा. भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ राजनैतिक लड़ाई के लिए भी वह अहम होगा. सोनिया-राहुल-प्रियंका की तिकड़ी का सामूहिक नेतृत्व अब तक नतीजे देने में नाकाम रहा है. कांग्रेस के ज्यादातर अंदरूनी लोगों का कहना है कि तीनों को अपने निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेजी और मजबूती लानी होगी और इससे ज्यादा अहम यह कि अध्यक्षता को लेकर तदर्थवाद खत्म करना होगा. 

शिविर में सोनिया के अलावा राहुल अकेले नेता थे जिन्होंने प्रतिनिधियों को संबोधित किया. पार्टी की नियमावली के मुताबिक सीडब्ल्यूसी के सदस्य होने के अलावा वे किसी पद पर नहीं हैं. राहुल गांधी ने हालांकि एक बार फिर शीर्ष पद स्वीकार करने की कोई खुली इच्छा जाहिर नहीं की, लेकिन शिविर से कुछ संकेत जरूर उभरे कि सितंबर में होने वाले अध्यक्ष पद के चुनाव में वे उम्मीदवार हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में यह 'निर्विवाद' चुनाव होगा, उसी तरह जैसा 2017 में हुआ था. पूरी प्रक्रिया सुधार की तरह भले कतई न दिखाई देती हो, पर कम से कम यह उस दिशाहीन ढलान के मुकाबले निर्णायक बदलाव होगा जो बीते दो-तीन साल में पार्टी की पहचान बन गया है. अलबत्ता इस समूचे मुद्दे की जड़ में जो विरोधाभास है, वह जस का तस रहेगा. बहरहाल, अब सबकी नजरें पार्टी में सितंबर में होने वाले अध्यक्ष पद के चुनाव पर टिकी हैं क्योंकि नए अध्यक्ष से पार्टी को संजीवनी मिलने की उम्मीद है और कांग्रेस के लिए इस वक्त चुनावी जीत से बड़ी कोई संजीवनी नहीं है.

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