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नागाओं के रहस्यलोक में

नागा बाबा शक्ति गिरि (54 वर्ष, खड़े हुए) और राज पुरी अपने पालतू जंतुओं—चार चूहों और हरि पुरी नाम के कबूतर के साथ. गिरि 1.25 लाख रुद्राक्ष के दानों से बना चोला पहने हुए हैं. पुरी 21 किलो के रुद्राक्ष से बना शिवलिंग धारण किए हुए हैं.

सभी फोटो और आलेख बंदीप सिंह सभी फोटो और आलेख बंदीप सिंह

हर तीन साल पर भारत के पूरे भूगोल और उसकी सांस्कृतिक धुरी को मथने एक कुंभ आ जाता है. उमड़ती-घुमड़ती एक विशाल मानवता संगम के घाटों पर परंपरा में डुबकी लगाती है और नई ताजगी के साथ बाहर निकलकर सर्राटा दौड़ती जिंदगी की उसी राह पर फिर निकल पड़ती है. संगम के इस उत्सव में हम मिलते हैं अपनी अंतरात्मा से...और नागा साधुओं से. रूखे, राख पोते, नंग-धड़ंग, गालियां बकते ये संन्यासी कुंभ की जीवंत आत्मा के प्रतीक बन गए हैं.

ये नागा (पर्वतवासियों का संस्कृत नाम) शस्त्र-शास्त्र दोनों में दक्ष थे. कुंभ में लाखों कैमरों की जिज्ञासा का विषय होने के बावजूद ये नागा एकांतपसंद हैं और लोगों से रुखाई से पेश आते हैं. कुंभ में नागाओं के सबसे बड़े जूना अखाड़े में इस महीने के शुरू में ग्रुप फोटो एडिटर को न सिर्फ प्रवेश मिला बल्कि उनके साथ रुकने का मौका भी.

नागा साधु सुरेश्वर गिरि (60),

वे किसान से संन्यासी बने. अतिरिक्त राख झाडऩे के लिए वे जटा झटक रहे हैं. अमूमन शैव मत वाले ये नागा वेदों में वर्णित शिव सरीखा भेस बनाकर रखते हैं

गंगासागर (पश्चिम बंगाल)

के युवा नागा बाबा कमल पुरी चाबी चढ़ाना नाम के एक अनुष्ठान के माध्यम से अपनी ताकत और मजबूती का प्रदर्शन कर रहे हैं. इसके तहत अपने लिंग को लाठी के साथ लपेटकर फिर किसी को उस लाठी पर खड़े होने को कहा जाता है. कुछ साधु तो लाठी की बजाए तलवार का उपयोग करते हैं. जननांगों के जरिए इस तरह के आत्मसंयम का प्रदर्शन दरअसल उस नागा मान्यता का प्रतीक है कि कामवासना को नियंत्रित करने से अपार शारीरिक शक्ति हासिल की जा सकती है.

चिलम के धुएं से लाल हुई

आंखों के साथ नागा बाबा राजू पुरी (49). मानो क्रोध की आभा दिखाने के लिए वे झूठे गुस्से में कैमरे की ओर घूरते हैं. नागा साधुओं की शक्ति प्रदर्शन की यह प्रकृति योद्धा संन्यासी होने की उनकी पारंपरिक पहचान को ही दिखाती है

नागा बाबा शक्ति गिरि (54 वर्ष, खड़े हुए) और राज पुरी अपने पालतू जंतुओं—चार चूहों और हरि पुरी नाम के कबूतर के साथ. गिरि 1.25 लाख रुद्राक्ष के दानों से बना चोला पहने हुए हैं. पुरी 21 किलो के रुद्राक्ष से बना शिवलिंग धारण किए हुए हैं. उनका कबूतर अक्सर उसी पर बैठता है. तमाम नागा साधु अपनी तरफ ध्यान खींचने के लिए इस तरह का वेश धारण करते हैं. इंस्टाग्राम वालों में ये खासे लोकप्रिय हैं.

राधे पुरी (52) उज्जैन के नागा साधु हैं. वे उध्र्वबाहु हठयोगी हैं यानी ऐसे योगी जो वर्षों तक हाथ ऊपर रखने की साधना का संकल्प लेते हैं. पिछले 12 वर्ष से उन्होंने दायां हाथ नीचे नहीं किया है. ऐसे कठिन संकल्पों का अभ्यास और प्रदर्शन नागा इसलिए करते हैं, जिससे शरीर पर मन की जीत को स्थापित कर सकें.

गहरे धुएं की भंवर कुछ यूं उठती है, जब एक नागा संन्यासी चिलम का गहरा कश खींचता है. मारिजुआना और चरस का सेवन नागा लोग इस तर्क के साथ करते हैं कि इससे ध्यान केंद्रित करने और साधना के दौरान सजग रहने में मदद मिलती है.

ऊर्जा के आगोश में.

एक नागा साधु विभूति स्नान करते हुए. इसे भभूत भी कहते हैं. यह पवित्र भभूत नागाओं की खास पहचान होती है. वे इसे अपना आवरण भी बनाते हैं और शृंगार भी. पारंपरिक रूप से नागा श्मशान की चिताओं से बटोरी गई भस्म ही लपेटते थे. उसका प्रतीकात्मक महत्व यह था कि उन्होंने अपनी सब भौतिक आकांक्षाओं को जला डाला है.

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