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तमिलनाडुः कांटे का मुकाबला

ग्रामीण निकायों के चुनाव परिणामों को संकेत मानें तो दोनों द्रविड़ पार्टियों के बीच 2021 में होगी कांटे की टक्कर

जैसन जी. जैसन जी.

अगर दिसंबर 2019 के ग्रामीण निकायों के चुनाव कोई संकेत हैं, तो 2021 में होने वाला विधानसभा चुनाव सत्ताधारी अन्नाद्रमुक और उसके मुख्य प्रतिद्वंद्वी द्रमुक, दोनों में से किसी के पक्ष में पूरी तरह से झुका हुआ नहीं दिखता. 2019 में तमिलनाडु की 39 लोकसभा सीटों में से 38 पर जीत हासिल करने वाले द्रमुक के नेतृत्व वाले मोर्चे ने पंचायत संघों और जिला पंचायतों में ज्यादा वार्डों की जीत के साथ बढ़त तो बनाए रखी, लेकिन यह बढ़त अधिक नहीं रही.

 अन्नाद्रमुक और द्रमुक, दोनों ही दलों की क्रमश: पहचान रहे जे. जयललिता और एम. करुणानिधि की मृत्यु के बाद ये पहले स्थानीय निकाय चुनाव हैं. द्रमुक और उसके सहयोगियों ने 513 जिला पंचायत वार्डों में से 243 पर और पंचायत संघ के वार्डों में 2,099 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि अन्नाद्रमुक ने 214 जिला पंचायत वार्ड और पंचायत संघ की 1,781 सीटें जीतीं. भाजपा ने सात जिला पंचायत वार्ड और 85 पंचायत संघ वार्ड जीते.

तमिलनाडु के 36 जिलों में से 27 प्रतिशत मतदाताओं (लगभग 2 करोड़ लोगों) ने ग्राम पंचायतों, पंचायत संघों और जिला पंचायतों के प्रतिनिधियों का चुनाव करने के लिए मतदान किया. फैसला बहुत नजदीक का रहा जिसमें द्रमुक और अन्नाद्रमुक, दोनों को 13-13 जिलों में बहुमत मिला और शिवगंगा जिले में दोनों की सीटें बराबर रहीं. सुप्रीम कोर्ट ने पांच नए जिलों में वार्डों के परिसीमन के लिए कहा है और अदालत अगले तीन महीनों में शेष सभी नौ जिलों में चुनाव चाहती है.

अन्नाद्रमुक ने संसदीय चुनावों के दौरान हुए नुक्सान की काफी हद तक भरपाई कर ली है. पार्टी ने अपने अधिकांश पारंपरिक गढ़ों पर कब्जा कर लिया और नीलगिरि और कृष्णगिरि क्षेत्रों को छोड़कर पश्चिमी क्षेत्र पर अपनी बढ़त बनाए रखी. संभवत: नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के विरोध के कारण मतदाता अन्नाद्रमुक के खिलाफ गए. द्रमुक ने मध्य क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है. उसने अन्नाद्रमुक के गढ़ सलेम जिले में अपनी पैठ मजबूत की है जबकि तिरुचिरापल्ली, तिरुवूरुर और तिरुवन्नामलई जैसे अपने गढ़ों को बरकरार रखा है.

द्रमुक अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने राज्य के कानून मंत्री डी. जयकुमार के द्रमुक की तुलना क्षीण होते चंद्रमा से किए जाने के जवाब में कहा, ''विधानसभा में हमारी ताकत 89 से बढ़कर 100 हो गई है. 2011 में हमारे पास सिर्फ 30 जिला पंचायत पार्षद थे; अब हमारे पास 243 हैं. मैं यह लोगों को तय करने को छोड़ देता हूं कि हम क्षीण हो रहे हैं या बढ़ रहे हैं.''

मद्रास विश्वविद्यालय के राजनीति और सार्वजनिक प्रशासन विभाग के प्रमुख रामू मणिवन्नन कहते हैं, ''यह अन्नाद्रमुक के घटते ग्रामीण जनाधार के साथ-साथ लोगों के असंतोष को अपने पक्ष में भुनाने में द्रमुक की असमर्थता को उजागर करता है.'' दोनों दलों को अपनी रणनीतियों में बदलाव करने और रजनीकांत तथा कमल हासन जैसे छुपे रुस्तमों से सावधान रहने की जरूरत है. विशेष रूप से युवा मतदाताओं का दोनों बड़ी द्रविड़ पार्टियों से मोहभंग हो रहा है और फिल्म स्टार से राजनेता बने ये दोनों लोग इस स्थिति को आसानी से भुना सकते हैं.

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