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पश्चिम बंगालः क्यों इतना अहम है देवचा पचमी कोल ब्लॉक?

ममता सरकार की सबसे बड़ी चिंता कुछ स्थानीय मुद्दों के उठ खड़े होने की है, और भाजपा या वामपंथी इस परियोजना के विरोध की सवारी करने की कोशिशों में जुटे हैं

गहरी खुदाई बीरभूम जिले में देवचा पचमी ब्लॉक में एक कोल पिट की फाइल फोटो गहरी खुदाई बीरभूम जिले में देवचा पचमी ब्लॉक में एक कोल पिट की फाइल फोटो

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए देवचा पचमी कोयला खनन परियोजना अब तक की सबसे बड़ी चुनौती होगी. इस परियोजना में काफी वन इलाकों और 12 आदिवासी गांवों सहित हजारों एकड़ भूमि का अधिग्रहण शामिल है. बंगाल में कोई भी यह बात नहीं भूला है कि 14 साल पहले, ममता सिंगूर में वाम मोर्चा सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति के खिलाफ आंदोलन की अगुवाई कर रही थीं, जिसके कारण टाटा समूह को अपनी कार परियोजना के लिए बंगाल छोड़ना पड़ा और राज्य पर उद्योगों के लिए 'गैर-दोस्ताना' सूबे का टैग चस्पां हो गया जो अभी तक जारी है. उस आंदोलन की वजह से ही माकपा सरकार 2011 में विधानसभा चुनाव हार गई और ममता के हाथ में सत्ता आई थी.

एक दशक के बाद, तृणमूल कांग्रेस की मुखिया खुद अब हॉट सीट पर हैं और वह इसके लिए कटबिद्ध हैं कि सिंगूर सरीखा प्रकरण इस बार न हो. किसी भी बड़े निवेश के लिए अधिक भूमि की जरूरत होती है और उसके साथ समस्याएं भी जुड़ी होती हैं. लेकिन वक्त को देखते हुए—परियोजना की घोषणा के दो साल बाद—मुख्यमंत्री ने आम सहमति बनाने तथा भूमि और आजीविका खोने वालों के लिए मुआवजा देने पर जोर दिया है. ऐसे में लग रहा है कि यह खनन परियोजना हकीकत बन सकती है. ममता ने यह भी सुनिश्चित किया है कि देवचा पचमी पर सरकारी अधिसूचना में कहीं भी 'अधिग्रहण' शब्द का उल्लेख नहीं हो. वे जोर देकर कहती हैं कि सरकार मालिकों से और उनकी सहमति से जमीन की सीधी खरीद के लिए जा रही है.

माना जा रहा है कि देवचा पचमी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कोयला ब्लॉक है जिसमें 900 से 2,500 मीटर की गहराई तक करीब 2.1 अरब टन कोयला भंडार मौजूद है. इसको पहले संयुक्त रूप से पश्चिम बंगाल, पांच अन्य राज्यों और सतलज जल विद्युत निगम लिमिटेड को ऑफर किया गया था. भूगर्भीय चुनौतियों और लागत को देखते हुए बाकी हितधारकों ने इससे हाथ खींच लिए. राज्य की ऊर्जा एजेंसी, पश्चिम बंगाल पावर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (डब्ल्यूबीपीडीसीएल) को इसका एकाधिकार 2019 में मिल गया.

विशेषज्ञों के एक सर्वे का अनुमान है कि खनन शुरू होने के बाद सीम (कोयले के स्तर) तक पहुंचने में कम से कम तीन साल लगेंगे. यहां तक कि खनन के लिए केंद्र के एकाधिकार वाली कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड (सीआइएल), जिसके पास पहले यह ब्लॉक था, को भी इस खदान की क्षमता को लेकर संदेह है. सीआइएल के पूर्व चेयरमैन पार्थ एस. भट्टाचार्य ने 2019 में ध्यान दिलाया था कि भारत के पास अभी वह तकनीक नहीं है कि वह बैसाल्ट चट्टानों की मोटी परत के नीचे मौजूद भंडार का खनन कर सके और इस खनन के मलबे को हटाने की लागत बढ़ती जाएगी अगर इस परियोजना को टुकड़ो में लागू किया गया, जैसा कि सरकार ने अपने पास के 550 एकड़ की जमीन पर करने का प्रस्ताव रखा था. लेकिन ममता को भरोसा है कि देवचा पचमी राज्य की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाई देगा, खासतौर पर तब जब इस संभावित भंडार का खनन अगली एक सदी तक किया जा सकता है और इससे 1,50,000 स्थानीय रोजगार सृजित किए जा सकेंगे.

पश्चिम बंगालः क्यों इतना अहम है देवचा पचमी कोल ब्लॉक?
पश्चिम बंगालः क्यों इतना अहम है देवचा पचमी कोल ब्लॉक?

जमीनी काम

हालांकि कोयला ब्लॉक बीरभूम जिले में 11,000 एकड़ में फैला हुआ है, पर सरकार 3,500 एकड़ पर ध्यान केंद्रित कर रही है, जिसमें पांच ग्राम पंचायतें और देवांगुनजे-हरिसिंघा, देवचा पचमी और चंदा मौजा ब्लॉक में 12 आदिवासी गांव शामिल हैं. यहां करीब 21,000 लोगों के पास कृषि भूमि और घर हैं. फिर पत्थर की खानें हैं जिन पर कई स्थानीय लोग आजीविका के लिए निर्भर हैं.

प्रभावित लोगों में अधिकतर आदिवासी हैं और उनके बीच विरोध न भड़के, सरकार इसको लेकर सतर्क रही है. उन्हें मनाने के लिए प्रशासनिक, राजनैतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर कई रणनीतियां अपनाई गई हैं. जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) बिधान रे की अगुआई में स्थानीय मोहम्मद बाजार जिला प्रशासन ने परियोजना के बारे में लोगों की बात सुनने के लिए गांवों का दौरा किया. अधिकारियों का कहना है कि एसडीओ (अनुमंडल पदाधिकारी) और बीडीओ (प्रखंड विकास पदाधिकारी) ने भी लोगों की चिंताओं को दूर करने के लिए नियमित बातचीत की है.

परियोजना के केंद्र मोहम्मद बाजार के बीडीओ अर्घ्य गुहा कहते हैं, ''मुझे याद है कि कैसे स्थानीय लोग अपने भूखंड के आकार जैसी बुनियादी चीजों के बारे में जानकारी साझा करने से डरते थे, चाहे वे मालिक हों या बटाईदार, वे सामाजिक प्रभाव आकलन पर सर्वेक्षण के लिए मुर्गी या बकरी आदि रखते थे. आखिरकार, हम उनके डर को दूर करने के लिए घर-घर गए. लोगों को यह समझाने के लिए सर्वेक्षण प्रारूप को सरल बनाया गया था कि यह उनके अपने भले के लिए था.'' सर्वेक्षण को आखिरकार 2020 के अंत में तीन महीने में पूरा किया गया.

मुआवजे के योग्य लोगों के लिए 10,000 करोड़ रुपए का मुआवजा पैकेज है जिसमें पुलिस में उनकी कॉन्स्टेबल की नौकरी, एक कॉलोनी में 600 वर्ग फुट का भूखंड, मकान शिफ्ट करने की लागत और इस दौरान बेरोजगार हुए लोगों को नई नौकरी मिलने तक भत्ता देने का भी प्रावधान है. इसके अलावा, उनको जमीन के लिए बाजार मूल्य से दोगुनी कीमत दी जाएगी (एक बीघे, जो एक एकड़ से थोड़ा कम होता है, के लिए 10 से 13 लाख रुपए). मुआवजे के पैकेज के बाबत अलचिकी (संथाली) लिपि में पर्चे भी बांटे जा रहे हैं. नाम न छापने की शर्त पर एक अधिकारी कहते हैं, ''हमने किसी राजनैतिक दल को इससे खेलने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी है.''

ब्यौरों को सार्वजनिक करने से पहले, प्रशासन ने भूमि अभिलेखों को अपडेट करने के लिए शिविरों का आयोजन किया. गुहा कहते हैं, ''यह असली मालिकों की पहचान करने के लिए था; कई मामलों में मृतक के नाम अभी भी फाइल में थे. मुआवजे की राशि और पैकेज की योजना दीर्घकालिक प्रभाव के लिए बनाई गई है.''

आसान नहीं राह

सरकार ने किसी भी भ्रम को दूर करने के लिए व्यक्तियों तक पहुंचने से पहले, आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने वाले मंच बीरभूम आदिवासी गांओंता (बीएजी) के आदिवासी नेताओं से संपर्क किया. इसके लिए दो प्रमुख स्थानीय नेताओं और पूर्व नक्सलियों, सुनील और रबिन सोरेन को शामिल किया गया था. रबिन अब टीएमसी समर्थक है और उसने कथित तौर पर इस सौदे से पैसा भी कमाया है, जबकि सुनील एक आपराधिक मामले में गिरफ्तार होने के बाद कम दिखने लगा है.

इस बीच, आदिवासी अपनी चिंताओं को जाहिर करने के लिए एक नेता की तलाश में हैं. कोयला ब्लॉक के एक हिस्से हरिसिंघा के स्थानीय निवासी सुनील मुर्मू कहते हैं, ''आदिवासी युवाओं को लुभाने के लिए भारी रकम खर्च की जा रही है, इसलिए सौदे से नाखुश होने पर भी लोगों के विरोध की संभावना नहीं है.'' वहीं, सुनील सोरेन कहते हैं कि आदिवासी ''खनन के खिलाफ नहीं हैं. यह स्थानीय लोगों को रोजगार देगा और उनकी आजीविका सुनिश्चित करेगा, पर प्रशासन को लोगों की प्रतिक्रिया जानने के लिए उनके साथ बैठने की जरूरत है.'' राज्य ने पैकेज पर किसी भी मतभेद को दूर करने के लिए स्थानीय आदिवासियों, मशहूर हस्तियों, गैर-सरकारी संगठनों के सदस्यों और जनप्रतिनिधियों को मिलाकर नौ सदस्यीय समिति गठित की है.

ममता सरकार की सबसे बड़ी चिंता कुछ स्थानीय मुद्दों के उठ खड़े होने की है, और भाजपा या वामपंथी इस परियोजना के विरोध की सवारी करने की कोशिशों में जुटे हैं. हरिसिंघा के करीब 2,000 लोग जिनमें 80 फीसद जनजातीय समुदाय के हैं, पहले ही इस इलाके में विकास की कमी को लेकर शिकायतें कर रहे हैं. एक स्थानीय कालिंदी हांसदा कहती हैं, ''यहां से आठ किमी तक कोई स्कूल या 3-4 किमी तक गाड़ी चलने लायक सड़कें नहीं हैं. पास में कोई स्वास्थ्य केंद्र भी नहीं है. अब जबकि हमारे गांवों में कोयला भंडार है, प्रशासन हमारे दरवाजे पर आ रहा है. कुछ काम कराने के लिए यह हमारा आखिरी मौका है.''

राज्य की नौ सदस्यीय समिति के सदस्य सुनील मुर्मू का कहना है कि पुनर्वास पैकेज के बारे में विवरण अभी भी अस्पष्ट है. आदिवासी अधिकार मंच के सुशील धांगरे पूछते हैं, ''सरकारी पैकेज में जमीन खोने वाले किसी परिवार के एक सदस्य के लिए नौकरी का वादा है. लेकिन परिवार में अगर तीन बेटे हों तो क्या होगा?'' सरकार ने स्टोन क्रशिंग इकाइयों में 3,000 मजदूरों को एक साल के लिए 10,000 रुपए और 160 खेत मजदूरों को 50,000 रुपए का एकमुश्त अनुदान देने का वादा किया है. यह ऐसे लोग हैं जिनका रोजगार चला जाएगा (स्थानीय लोगों का कहना है कि इस इलाके में लगभग 2,00,000 असंगठित कामगार हैं.) यहां भी भेदभाव साफ है: स्टोन क्रशिंग इकाइयों के मालिकों को एकमुश्त 50,000 रुपए का अनुदान, पास के औद्योगिक पार्क में जगह और छह महीने के लिए कच्चे माल की मुफ्त आपूर्ति मिलेगी. परियोजना स्थल के भीतर 300 से अधिक एकड़ में फैले जंगलों से उपज पर निर्भर 1,000 लोगों के भविष्य के बारे में भी कोई स्पष्टता नहीं है.

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