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पश्चिम बंगालः दीदी का मुस्लिम प्लान

मुसलमानों के प्रतिनिधि समूहों के उभार ने ममता के पुख्ता वोटबैंक पर खतरा पैदा कर दिया है. बंगाल की मुख्यमंत्री इसे कैसे वापस अपने पाले मंठ लाएंगी?

अस्थिर वोटबैंक पश्चिम बंगाल में मुस्लिमों की एक सभा को संबोधित करतीं ममता बनजी अस्थिर वोटबैंक पश्चिम बंगाल में मुस्लिमों की एक सभा को संबोधित करतीं ममता बनजी

मई 2019 के आखिरी दिनों की बात है. ममता बनर्जी की तुष्टीकरण की राजनीति के खिलाफ भाजपा के आक्रामक चुनाव अभियान का नतीजा लोकसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की सीटों की संख्या में 12 सीटों की कमी के रूप में निकला था, जिसमें पार्टी ने सूबे की 42 में से 22 सीटें जीती थीं. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री, भाजपा के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरने की नई वास्तविकता से तालमेल बिठा भी नहीं पाई थीं जिसकी ताकत उनकी पार्टी से महज चार सीटें कम रह गई थी.

यह इतना गहरी टीस थी कि वे एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक इफ्तार पार्टी में शामिल होने को लेकर किए गए सीधे-सादे सवाल पर तिलमिला गई थीं. उन्होंने कहा, ''मैं मुस्लिमों का तुष्टिकरण करती हूं ना? मैं वहां सौ बार जाऊंगी. जे गोरू दूध देई तार लाते-ओ खेते होय (जो गाय दूध देती है उसकी लात भी खानी होती है.'' उन्होंने साफ कर दिया था कि कोई भी चीज उन्हें ऐसे समुदाय को लेकर उनका नजरिया बदलने पर मजबूर नहीं कर सकता जिसने उन्हें सियासत में बड़ा फायदा पहुंचाया था. 2019 में हासिल टीएमसी के 43.3 फीसद वोट शेयर में से मुस्लिमों का हिस्सा 23.3 फीसद रहा था. बंगाल की आबादी में अल्पसंख्यकों का हिस्सा करीब 30 फीसद (कोई 3 करोड़) है.

बहरहाल, एक साल बाद, जब मार्च-अप्रैल में राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं, ममता अब अपने भरोसेमंद वोटबैंक की सलामती को लेकर आश्वस्त नहीं हैं. मुस्लिम मतदाता इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि वह किसे वोट करेगा—इस वोटबैंक में हिस्सा बंटाने के लिए कई खिलाड़ी मैदान में उतर गए हैं.

उनमें से एक हैं पीरजादा अब्बास सिद्दीकी, जो मशहूर दरगाह फुरफुरा शरीफ के सूफी संत हजरत अबू बकर सिद्दीकी की चौथी पीढ़ी के वंशज हैं. इस धर्मगुरु ने आदिवासियों, दलितों और पिछड़े वर्गों के आठ संगठनों के साथ एक सामाजिक-राजनैतिक मंच बनाने की इच्छा जाहिर की है, साथ ही वे आगामी चुनाव में भी हिस्सा लेंगे. वे कहते हैं कि उनका संगठन उस वर्ग के उत्थान और सशक्तिकरण की दिशा में काम करेगा जिसे वह 'कमजोर तबका' कहते हैं और मुस्लिमों की इसमें बड़ी भागीदारी है.

ममता की चिंता

लेकिन ममता को चिंता क्यों होनी चाहिए? हुगली में स्थित फुरफुरा शरीफ का करीब 3,000 मस्जिदों पर नियंत्रण है. यह कई धर्मार्थ, शैक्षिक संस्थान, अनाथालय, मदरसे और स्वास्थ्य केंद्र चलाता है. पास के हावड़ा, दक्षिण और उत्तरी 24 परगना जिलों में इसके अलिखित फतवों का असर भी होता है. दक्षिणी बंगाल के इन चार जिलों में राज्य की मुस्लिम आबादी का कोई 25 फीसद हिस्सा रहता है और सूबे की 33 फीसद यानी कुल 294 में से 98 विधानसभी सीटें इसी इलाके में हैं. 2019 में टीएमसी ने क्षेत्र की 14 में 11 लोकसभा सीटें जीती थीं और तब अल्पसंख्यकों ने ममता के लिए एकमुश्त वोट डाले थे.

हाल तक, सीनियर पीरजादा तोहा सिद्दीकी, जो अब्बास के चाचा हैं और इस तरह फुरफुरा शरीफ का चेहरा भी, ने सत्ता का साथ वफादारी से निभाया था. ममता के नजदीकी माने जाने वाले इस धर्मगुरु को झटका लगा जब उन्हें पता चला कि न सिर्फ उनका भतीजा उनके नियंत्रण से बाहर निकल गया है बल्कि वह उनकी जमीन को भी कमजोर कर रहा है.

लॉकडाउन के बाद से ही फुरफुरा शरीफ के इस 33 साल के वारिस अब्बास ने दक्षिणी और उत्तरी 24 परगना में 60 से अधिक रैलियां की हैं, जहां दक्षिण बंगाल की 66 सीटें हैं. इन सभी रैलियों में काफी भीड़ जुटी थी. इन रैलियों में बातचीत भले ही धर्म से लेकर सियासत तक रही हो, लेकिन उन सबको एक जोडऩे वाला धागा था कि मुस्लिम समुदाय किस तरह वंचित है और सेकुलर पार्टियों के शासन में भी उनका ढांचागत पिछड़ापन दूर नहीं हो पाया, जिन्होंने तुष्टिकरण तो किया लेकिन वोट बिखरने के डर से विकास नहीं किया. 

वह अपने श्रोताओं को संबोधित करते हुए जब, ''ईमानदार मुसलमान भाई'' कह कर शुरुआत करते हैं और वंचना के एक अध्याय से दूसरे अध्याय पर जाते हैं तो भीड़ उन्मत्त होकर तालियां बजाती है. वे कहते हैं, ''डानकुनी और फुरफुरा के बीच सीधी रेल लाइन अभी भी नहीं बनी, फुरफुरा का एकमात्र अस्पताल खंडहर बन चुका है और स्वीकृत आइटीआइ कॉलेज अभी भी खेल का मैदान ही है...'' अब्बस नजरअंदाज किए जाने की पूरी फेहरिस्त गिनाते हैं और भीड़ को बताते हैं कि वे वहां मुख्यमंत्री बनने के लिए नहीं आए हैं जैसा कि उनके विरोधी दावा करते हैं बल्कि सूबे में आला कुरसी पर बैठे शख्स को जिम्मेदार बनाने के लिए आए है.

अब्बास-ओवैसी का रिश्ता

अब्बास की भीड़ खींचने की क्षमता और सीधी बात करने के तरीके ने हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी का ध्यान खींच लिया, जिनकी एआइएमआइएम (ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन) बंगाल चुनाव में दांव आजमाना चाहती है. एक ऐसा राज्य में जहां 80 फीसद मुस्लिम बांग्ला बोलते हैं, अब्बास ओवैसी के लिए बढिय़ा दांव बन गए हैं. एआइएमआइएम के मुखिया पहले ही अब्बास के साथ बात कर चुके हैं और उनके नेतृत्व में चुनाव लडऩे पर सहमत हैं.

राज्य में मोटे तौर पर 102 सीटें ऐसी हैं जहां अल्पसंख्यक वोट असरदार हैं जिनमें से 60 फीसद या 61 सीटें दक्षिण बंगाल में हैं. ममता इन विधानसभा क्षेत्रों का अधिकतर हिस्सा 2019 के लोकसभा चुनाव में अपने पास रखने में कामयाब रही थीं. कांग्रेस-लेफ्ट गठजोड़ के अलावा कई खिलाड़ी हैं जो अल्पसंख्यक वोटबैंक में हिस्सा बंटाने आगे आए हैं. ऐसे में ममता का दवाब महसूस करना स्वाभाविक है.

बहरहाल, अल्पसंख्यक वोटों में विभाजन से अधिक, अब्बास के टीएमसी सरकार के खिलाफ टेक ने ममता को हताश कर दिया है. विकास के सूचकों को लेकर वह ठोस आंकड़े पेश करते हैं, मसलन 2009 की सच्चर कमेटी की रिपोर्ट, ताकि मुस्लिमों को इस बारे में जागरूक किया जा सके. वामपंथी शासन के दौरान बंगाल के मुस्लिमों की स्थिति पर सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में दर्ज बातों को अल्पसंख्यक वोटों के ममता के पक्ष में जाने के लिहाज से काफी अहम माना जाता है. तब ममता उभरता सितारा थीं और वामपंथियों को तगड़ी चुनौती दे रही थीं.

प्रेसिडेंसी कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर और समाज विज्ञानी अमल कुमार मुखोपाध्याय कहते हैं, ''ममता की हताशा समझी जा सकती है. उन्हें डर है कि अब्बास ठोस आंकड़ों के जरिए उनकी गाड़ी रोक देंगे, जिसके बारे में उन्हें शायद लगता था कि वह उस दबा-छिपा देंगी और अपनी तुष्टिकरण की सियासत को किस्से-कहानियों के जरिए पेश कर देंगी.''

अब्बास पर सार्वजनिक रूप से सीधे हमला न करने की सावधानी बरतते हुए ममता ने कथित तौर पर सीनियर पीरजादा तोहा से कहा है कि वे या तो अपने भतीजे पर लगाम लगाएं या फिर अब्बास और ओवैसी के बीच के नए गठजोड़ में दरार पैदा करें. इस पर तोहा ने साफ किया, ''किसी धर्मगुरु के लिए सियासत में कोई जगह नहीं है. अगर आप सियासत में है तो आपको नियम-कायदों से चलना होगा. हमले, खराब भाषा. गलत तरीके यह सब इस खेल का हिस्सा हैं और ऐसे मामले में फुरफुरा शरीफ को ढाल बनाना गलत होगा.''

अब्बास ने इसका विरोध यह कहते हुए कहा कि धर्मगुरु और मौलवी दुनिया को सिर्फ सही दिशा दिखा सकते हैं. वे पूछते हैं, ''गरीबों और कमजोर तबके की भलाई के लिए बड़ा मंच होने में क्या बुराई है? हमलोग सियासत में नहीं जा रहे. उन लोगों (कथित सेकुलर पार्टियां) ने ही इन दोनों को अपने हितों के लिए मिलाया है.''

जादवपुर विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंध के प्रोफेसर इमान कल्याण लाहिड़ी के मुताबिक, किसी स्थानीय धार्मिक मंच को विस्तार देने का विचार, जैसा अब्बास-ओवैसी कर रहे हैं, दिलचस्प है. लाहिड़ी पूछते हैं, ''मुख्यधारा की राजनैतिक पार्टियों में आने वाले आदिवासियों और दलितों को जानबूझ कर आगे बढऩे से रोका जाता है, जिन्होंने उनका वोटबैंक की तरह इस्तेमाल किया है. क्या आपको लगता है कि बड़ी राजनैतिक पार्टियों के बड़े नेताओं को खबरों में लाने के लिए उनका मेजबान बनना दलितों को अच्छा लगता है? हो सकता है एक पल के लिए लगे भी, क्या होता है जब चमक उतर जाती है और वे फिर से गरीब और उपेक्षित हो जाते हैं?''

पीरजादा अब्बास को ध्यान में रखते हुए ममता बनर्जी ने मुसलमानों को वापस अपने पाले में लाने के लिए ऑल बंगाल इमाम एसोसिएशन को काम पर लगा दिया है. इस एसोसिएशन के नियंत्रण में 40,000 मस्जिद आते हैं और इसके सदस्य करीब 23,000 मस्जिदों में फैले हुए हैं. एसोसिएशन के प्रमुख मोहम्मद यहिया पहले ही कह चुके हैं कि मजहब और सियासत साथ-साथ नहीं चल सकते हैं. उन्होंने कहा, ''बंगाल में परंपरागत रूप से हिंदू और मुसलमान भाइयों की तरह मिलजुलकर रहते आए हैं. बंगाल में हिंदू और मुस्लिमों की बस एक ही पहचान है—वे सबसे पहले बंगाली हैं.'' उनका कहना है कि ओवैसी के एआइएमआइएम जैसे हैदराबाद के उर्दू-भाषी मुस्लिम संगठन बंगाल में अपनी जमीन कभी नहीं बना सकते हैं.

ममता का भी कहना है कि ओवैसी बंगाल में उर्दू-भाषी केवल छह प्रतिशत बंगाली मुसलमानों का ही प्रतिनिधित्व करते हैं, बाकी के 24 प्रतिशत पर उनका कोई असर नहीं होगा. लेकिन अब्बास के खिलाफ उनके बयान बहुत नपे-तुले ही होते हैं. उन्होंने एक बार भी उनके खिलाफ मुंह नहीं खोला है. भाजपा की 'बी' टीम का आरोप झेलने के आदी हो चुके ओवैसी ने एक ट्वीट के जरिए पलटवार किया, ''अभी तक आपका पाला मीर जाफरों और सादिकों जैसे हुक्म बजाने वालों से पड़ता रहा है, आप ऐसे मुसलमानों को पसंद नहीं करती हैं जो अपने बारे में सोचना और अपने लिए आवाज उठाना जानते हैं. मुस्लिम वोटर आपकी जागीर नहीं हैं.'' ओवैसी एक साल से बंगाल में मेहनत करते आ रहे हैं और उन्होंने मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तरी बंगाल के उत्तरी व दक्षिणी दीनाजपुर जिलों में अपना अच्छा जनाधार बना लिया है. भाजपा ने इन जिलों में सात लोकसभा सीटों में से तीन सीटें जीत ली थीं.

टीएमसी इस बात से निश्चित तौर पर चिंतित है. 30 प्रतिशत अल्पसंख्यक वोटों में प्रतियोगियों आ जाने से पार्टी के वोटों की हिस्सेदारी पर निश्चित रूप से असर पड़ेगा जबकि एक दशक से इन वोटों पर पार्टी का एकमुश्त कब्जा था. अल्पसंख्यक वोटों में हिस्सेदारी को लेकर कड़ा मुकाबला होने वाला है, जाहिर है इससे भाजपा को फायदा होगा.

बताया जाता है कि ममता ने अपनी यह आशंका करीबी लोगों के बीच जाहिर भी की है. उन्हें पता है कि जोशीला भाषण देने में माहिर ओवैसी के आने से जो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होने वाला है, उसे वे रोक नहीं पाएंगी. वे यह भी जानती हैं कि चाहे वे पूजा व पूजा समितियों के लिए कितना भी आर्थिक सहायता की घोषणा कर दें या हिंदू तीर्थस्थलों को चमकाने के लिए कितना भी काम कर लें और पुजारियों को कितना भी आर्थिक लाभ पहुंचा दें, इससे कोई फायदा नहीं होने वाला है.

फिर भी टीएमसी बाहरी तौर पर इन बातों को सिरे से खारिज कर देती है कि ये संगठन ममता बनर्जी के लिए किसी तरह का खतरा हैं.

भाजपा के लिए फायदा ही फायदा 

इस सबके बीच भाजपा के दोनों हाथों में लड्डू है. नूर-उर-रहमान बरकती को टीपू सुल्तान मस्जिद के इमाम के पद से बर्खास्त कर दिया गया है लेकिन कोलकाता और आसपास की जगहों में उनका अब भी काफी प्रभाव है. उन्होंने अल्पसंख्यक वोटों में विभाजन करके भाजपा को खुलेआम फायदा पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. यहां तक कि एआइएमआइएम के अनवर पाशा, जो टीएमसी में शामिल हो गए थे, साफ तौर पर कहते हैं कि उनकी पुरानी पार्टी बंगाल की राजनीति में भाजपा को उसी तरह फायदा पहुंचाने के लिए आई है जैसा कि उसने बिहार में फायदा पहुंचाया था. नाम गुप्त रखने की शर्त पर भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''अल्पसंख्यक वोटों को लुभाने के लिए चूंकि अब कई प्रतियोगी आ गए हैं, इसलिए हमारा काम आसान हो गया है.''

भाजपा ने ओवैसी के खिलाफ अभी तक एक भी शब्द नहीं कहा है. इतना ही नहीं, ऐसा लगता है कि भगवा पार्टी खुद भी अल्पसंख्यक वोटों को रिझाने की कोशिश कर रही है. 2019 के चुनाव में उसे 4 प्रतिशत अल्पसंख्यक वोट मिले थे. वह अब नागरिकता संशोधन कानून को लेकर अपनी हठधर्मिता में कुछ नरमी दिखा रही है क्योंकि इससे धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण तेज हो सकता है.

भाजपा नेता और उत्तर बंगाल में पार्टी के प्रवक्ता दीप्तिमान सेनगुप्ता के मुताबिक, ''हम कानून-व्यवस्था के चौपट होने, अपराध की दर बढऩे, कानून की धज्जियां उड़ाने और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को उठाएंगे. आपराधिक रिकॉर्डों और कानून के उल्लंघन के मामलों को देखने से खुलासा हो जाएगा कि अपराधी कौन हैं, हमें कुछ कहने की जरूरत ही नहीं होगी. हमने 2019 में ध्रुवीकरण के लिए जमीन पर काम किया. लोगों का ध्रुवीकरण हो चुका है, हमें तो अब चुपचाप बैठकर देखना है.

हिंदू और मुस्लिम की खुलेआम बात करके हम 2019 में अपने 20 प्रतिशत वामपंथी वोटों को गंवाने का खतरा मोल नहीं ले सकते हैं.'' भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुकुल रॉय कहते हैं, ''हमारे पक्ष में कुछ प्रतिशत वोटों के खिसकने से हमारे लिए हर हाल में जीत पक्की हो जाएगी. भाजपा ने वास्तव में कुछ अच्छा काम किया है, खासकर तीन तलाक को लेकर और लॉकडाउन के दौरान कुछ केंद्रीय कार्यक्रमों के मामले में. इस बार हमें मुसलमानों के भी वोट मिलेंगे क्योंकि दक्षिण बंगाल में मुसलमानों के बीच सत्ता-विरोधी भावनाएं व्याप्त हैं. मुस्लिम वोटों को लुभाने के लिए क्या इतना पर्याप्त होगा, इसका पता अगले कुछ महीनों में लग जाएगा.

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