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भाजपाः पार्टी की सूरत बदलने के नए सूत्र

भाजपा युवा नेतृत्व की एक नई पंक्ति के साथ अपनी 'ब्राह्मण-बनिया’ पार्टी की छवि को बदलने की कोशिश कर रही है, जहां महिलाएं और पिछड़ा वर्ग भविष्य में पार्टी के विकास की धुरी हो सकते हैं.

नया प्लान भाजपा संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री मोदी के साथ अमित शाह और जे.पी. नड्डा नया प्लान भाजपा संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री मोदी के साथ अमित शाह और जे.पी. नड्डा

तीस जुलाई को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने स्नातक और स्नातकोत्तर चिकित्सा/दंत चिकित्सा पाठ्यक्रमों के अखिल भारतीय कोटे में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के विद्यार्थियों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण को मंजूरी दी. यह राजनैतिक रूप से मौके को भांपकर किया गया फैसला लगता है क्योंकि कुछ महीनों बाद पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं. 

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जाहिर तौर पर इसमें चुनावी फायदे का हिसाब-किताब लगा रही है. वैसे तो यह चुनाव से पहले वोटरों के एक वर्ग को लुभाने का बढ़िया एकतरफा प्रयास लगता है, लेकिन पार्टी सूत्रों का कहना है कि यह पार्टी की छवि बदलने की भाजपा और संघ परिवार की बड़ी योजना का हिस्सा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा समेत भाजपा का शीर्ष नेतृत्व, पार्टी का पुनर्निर्माण कर रहा है जिसमें जातियों के एक नए अंकगणित पर ध्यान केंद्रित किया गया है. महिलाओं और युवा नेताओं की नई पंक्ति तैयार करते हुए पार्टी मुख्य रूप से ओबीसी और दलितों के साथ जीत का एक नया फार्मूला ईजाद कर रही है.

नई भाजपा न केवल वोट के लिए ओबीसी जातियों को साधने की कोशिश कर रही है, बल्कि अपने काडर और नेतृत्व के पदों के लिए भी उनके युवाओं को आगे बढ़ा रही है. इसके लिए, महाराष्ट्र में पार्टी स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण की रक्षा के लिए आंदोलन चला रही है.

राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को पत्र लिखकर स्थानीय निकाय चुनाव स्थगित करने के लिए कहा है क्योंकि कोटे पर फैसला लंबित है (लड़ाई सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गई है). पंजाब में, अकाली दल का साथ छूटने के बाद भाजपा ओबीसी (31.3 प्रतिशत मतदाता) और दलितों (31.9 प्रतिशत) के बीच अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रही है.

इस भारी-भरकम वोट बैंक को रिझाने के लिए पार्टी ने इन समुदायों को व्यापक राजनैतिक प्रतिनिधित्व देने और शिक्षा के साथ सरकारी सेवाओं में समान आरक्षण देने की प्रतिबद्धता जताई है. चुनावी राज्य उत्तर प्रदेश में पार्टी ने ओबीसी (गैर-यादव) और दलित (गैर-जाटव) जातियों का गठबंधन तैयार किया है और उन्हें मजबूत करने की कोशिश कर रही है.

केंद्र 127वें संविधान संशोधन विधेयक पर भी काम कर रहा है जो राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपनी ओबीसी सूची तैयार करने की शन्न्तियां बहाल करेगा. 5 मई को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में, यह कहते हुए राज्य सरकारों से यह शन्न्ति छीन ली थी कि 2018 के कानून में ऐसी शन्न्तियां सिर्फ केंद्र तक सीमित हैं.

पिछले सात वर्षों में संघ परिवार और भाजपा ने राष्ट्रवाद-लोकलुभावनवाद का एक ऐसा हिंदूवादी संस्करण पेश किया था, जो दलितों, ओबीसी और एसटी के बीच कई समुदायों को बड़ा भा रहा है. इसका संबंध उस वोटर केमिस्ट्री से भी था जिसे मोदी ने तैयार किया है. मोदी के रूप में पहली बार भाजपा के पास एक ऐसा नेता था जो आरएसएस प्रोडक्ट था और ओबीसी जाति से आता था.

इससे भाजपा और संघ को ब्राह्मïणों और बनियों का संगठन होने की अपनी छवि बदलने का अवसर मिला. ’90 के दशक भाजपा का नेतृत्व दो ब्राह्मïणों (अटल बिहारी वाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी) और एक बनिया (एल.के. आडवाणी) के हाथ में रहा जिससे भाजपा को ब्राह्मïण-बनियों की पार्टी कहा जाने लगा. यहां तक कि प्रमोद महाजन, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और अनंत कुमार के रूप में, नेतृत्व के दूसरे पायदान पर भी ब्राह्मïणों का एकाधिकार था. आरएसएस नेतृत्व में भी इन दोनों समुदायों के प्रचारकों का ही बोलबाला था.

आज, पार्टी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा और केंद्रीय संगठन मंत्री बी.एल. संतोष ब्राह्मण हैं लेकिन अन्य आठ महासचिव विभिन्न जातियों से हैं. 62 वर्ष की डी. पुरंदेश्वरी को छोड़कर अन्य सभी महासचिव अपनी उम्र के पचासवें दशक के मध्य में हैं. भाजपा मंडल दौर की राजनीति, जहां उसने आरक्षण विरोधी आंदोलन चलाकर उच्च जातियों के बीच अपना आधार पक्का किया और सफलता की सीढिय़ां चढ़ती गई, को बहुत पीछे छोड़ चुकी है.

मोदी ने इसमें भी एक बड़ी भूमिका निभाई है. उन्होंने खुद को चायवाला, संघर्ष से पैदा हुए एक स्वनिर्मित व्यन्न्ति के रूप में पेश करके क्षेत्रीय दलों की मंडल राजनीति के लिए ऐसी आदर्श काट तैयार की जो अगड़ी जातियों के मध्यवर्ग को भी लुभाती थी. अगड़ी जातियों के मध्यवर्ग को खुश करने के लिए कैबिनेट ने मेडिकल कॉलेजों में आर्थिक रूप से कमजोर अगड़ों के लिए 10 प्रतिशत सीटें आरक्षित रखी हैं.

मंत्रिमंडल में हाल में हुए फेरबदल के बाद मोदी सरकार में अब 27 ओबीसी और 12 दलित मंत्री हैं (कुल 78 में से) और स्वतंत्र भारत में पिछड़ी जातियों को दिया गया आज तक का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व है. पिछले दो दशकों में जनता दल के पतन और समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस जैसी पार्टियों से नेताओं के बड़े पैमाने पर पलायन से भाजपा को व्यापक लाभ हुआ.

राज्य स्तर पर भाजपा और संघ परिवार उन जाति समूहों का मुकाबला करने के लिए जातियों के एक नए गठबंधन पर काम कर रहे हैं, जो परंपरागत रूप से पार्टी के खिलाफ लामबंद होते रहे हैं. वे महसूस करते हैं कि आरक्षण का सारा लाभ कुछ वर्गों ने हथिया लिया और यह एक बड़ा गतिरोध बिंदु है.

इसलिए उत्तर प्रदेश में, भाजपा यादवों (सपा के कट्टर समर्थकों) और जाटवों (बसपा के मुख्य वोट-बैंक) के खिलाफ गुस्से को भुना रही है क्योंकि उन्होंने अपनी-अपनी श्रेणी के अधिकांश संसाधनों और आरक्षण के लाभों पर कब्जा कर लिया है.

अगला बड़ा काम इन जाति समूहों को भाजपा की विचारधारा के साथ ढालना है. संघ नेताओं का कहना है कि भर्ती किए गए दलबदलू चुनाव के समय तो मददगार हो सकते हैं, लेकिन संगठन निर्माण में ज्यादा योगदान नहीं देते. दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर श्री प्रकाश का तर्क है, ''ओबीसी और दलित मतदाताओं को मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सिर्फ मोदी के पिछड़ी जाति से होने और हिंदुत्व की राजनीति के कारण आकर्षित नहीं करती बल्कि इसलिए भी लुभाती है क्योंकि उनके नेतृत्व वाली सरकार ने विकास और वर्ग के नाम पर जातीय राजनीति से तालमेल भी बिठाया है.’’

न दशकों से अधिक समय तक इसका विरोध करने के बाद, भाजपा-संघ परिवार में एक बड़ी लॉबी उनकी भी है जो यह मानते हैं कि देश को जाति-आधारित जनगणना की आवश्यकता है. मूल रूप से जनता परिवार ने इसकी मांग की थी. बिहार विधानसभा ने दो बार जाति आधारित जनगणना के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया है, जिसे भाजपा ने भी समर्थन दिया था.

जनगणना में फिलहाल एससी और एसटी वर्ग के आंकड़े जुटाए जाते हैं, लेकिन पिछड़े वर्गों के नहीं. 2018 में, मोदी सरकार ने जाति-आधारित आंकड़ों पर प्रारंभिक कार्य शुरू किया था, लेकिन बाद में आंतरिक दबावों के कारण इसे छोड़ दिया गया. भले ही सरकार ने जुलाई में संसद में जाति आधारित जनगणना का सार्वजनिक रूप से विरोध किया था, लेकिन भाजपा के शीर्ष सूत्रों का कहना है कि पार्टी इस विषय पर अब विचार कर रही है.

आरएसएस के एक शीर्ष नेता कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश में, भाजपा का ध्यान समुदायों के तीन समूहों—सवर्णों और ओबीसी तथा दलितों के एक वर्ग पर है, लेकिन हमारे पास ओबीसी और दलितों के उस खास वर्ग के बीच पर्याप्त काडर आधार नहीं है. इस संबंध में प्रयास जारी हैं.’’ इसमें स्थानीय निकाय चुनावों में लक्षित समुदाय के नेताओं को टिकट देना, उनके सामाजिक प्रतीकों का निर्माण और वे जिस पंथ या मत संप्रदायों को मानते हैं उनके धार्मिक नेताओं के साथ जुड़ना आदि शामिल हैं.

ओबीसी और दलित युवाओं को आरएसएस में पद देने की संघ की योजना को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के साथ बढ़ावा मिला है और इन समुदायों के स्वयंसेवक आगे आए हैं. आरएसएस नेता कहते हैं कि इसके लिए ''न केवल राजनैतिक इच्छाशक्ति बल्कि सामाजिक परिवर्तन की भी जरूरत होगी.’’ 

पार्टी को युवा रखना है
नए रूप वाली भाजपा भी राजनीति में महिलाओं और युवाओं की अधिक भागीदारी चाहती है. इसलिए शाह, नड्डा, संतोष और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को शिक्षित, योग्य पेशेवर, विशेष रूप से महिलाओं, ओबीसी, दलितों और आदिवासियों में से युवा प्रतिभाओं की पहचान करने का काम सौंपा गया है, जिन्हें भविष्य के नेताओं के रूप में तैयार किया जा सकता है.

भाजपा के एक शीर्ष नेता का तर्क है कि जाति-आधारित संगठन 1990 के दशक में अपने उदय के बाद ढह गए, क्योंकि उनके पास आरक्षण के अलावा देने के लिए बहुत कुछ नहीं था. वे कहते हैं, ‘‘युवा पीढ़ी और महिला नेताओं को तैयार करना पार्टी की भावी विस्तार रणनीति का हिस्सा है.’’

हाल ही में हुए कैबिनेट फेरबदल में 35 वर्षीय निसिथ प्रमाणिक सबसे कम उम्र के मंत्री बने. मंत्रिपरिषद की औसत आयु घटकर 58 हो गई, जिसमें 72 वर्षीय राज्य मंत्री सोम प्रकाश सबसे बड़े थे. केंद्र के फैसले का असर भाजपा शासित राज्यों में भी दिख रहा है.

कर्नाटक में 78 वर्षीय बी.एस. येदियुरप्पा की जगह उनके शिष्य 61 वर्षीय बी. बोम्मई; और उत्तराखंड में 56 वर्षीय तीरथ सिंह ठाकुर की जगह 43 वर्षीय पुष्कर सिंह धामी ने ली. इसी तरह, 69 वर्षीय सुशील मोदी ने बिहार में युवा नेताओं तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी के लिए जगह बनाई. संयोग से, पूर्व आरएसएस प्रमुख के.एस. सुदर्शन ने वाजपेयी और आडवाणी को बाहर निकालने के लिए 75 साल की सीमा का सुझाव दिया था.

दक्षिण में मिशन कमल को जारी रखने के लिए भाजपा नए जाति समीकरणों और युवा नेताओं पर बहुत अधिक भरोसा कर रही है, जो उन्हें लगता है कि लंबी दौड़ में हैं. जुलाई में, 36 वर्षीय के. अन्नामलाई को तमिलनाडु इकाई का प्रमुख बनाया गया था; तेलंगाना इकाई के प्रमुख बंदीसंजय कुमार 50 वर्ष के हैं, जबकि कर्नाटक में नलिन कटील 55 वर्ष के हैं.

राज्य इकाई के प्रमुखों में गुजरात के 66 वर्षीय सी.आर. पाटिल सबसे उम्रदराज हैं. इसी तरह नड्डा की टीम में सभी महासचिवों की उम्र 56 साल से कम है; नड्डा खुद 60 साल के हैं.

संगठन को नए सिरे से खड़ा करने के अलावा, युवा पीढ़ी के नेता मोदी-शाह की जोड़ी के लिए वफादारों का एक नया समूह भी लाते हैं. इस साल मार्च में आरएसएस में भी पीढ़ीगत बदलाव आया. 73 वर्षीय सुरेश भैयाजी जोशी ने 66 वर्षीय दत्तात्रेय होसबाले के लिए महासचिव या सरकार्यवाह की जगह बनाई; 57 वर्षीय अरुण कुमार और 58 वर्षीय रामदत्त चक्रधर पांच सह-सरकार्यवाहों की टीम में शामिल हुए. अरुण कुमार ने 66 वर्षीय कृष्ण गोपाल से सरकार के साथ संपर्क कार्य की जिम्मेदारी भी ली.

इस बीच, भाजपा महिला मोर्चा की प्रमुख वनती श्रीनिवासन बताती हैं कि कैसे महिलाएं पार्टी में अधिक जिक्वमेदारी ले रही हैं. 75 सदस्यीय भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में अब 12 महिलाएं हैं; 12 में से 5 महिलाएं उपाध्यक्ष भी हैं. हाल के कैबिनेट फेरबदल में महिला मंत्रियों की संख्या बढ़ाकर 11 हो गई—मनमोहन सिंह के समय की तुलना में एक अधिक—और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को छोड़कर, सभी लोकसभा से हैं. कुल मिलाकर, यह भाजपा संगठन में आमूल-चूल परिवर्तन का समय है, पार्टी को उम्मीद है कि यह इसे और अधिक ऊंचाइयों पर ले जाएगी.

ताकि भगवा दल और चमके

 नारी शक्ति
पार्टी संगठन में, 12 उपाध्यक्षों में से 5 महिलाएं हैं, 75 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी में 10 महिलाएं भी हैं. केंद्रीय मंत्रिमंडल में अब 11 महिला मंत्री हैं

 अगली पीढ़ी के नेता
गृह राज्य मंत्री 35 वर्षीय निसिथ प्रमाणिक सबसे कम उम्र के कैबिनेट सदस्य हैं; 36 वर्षीय के. अन्नामलाई तमिलनाडु इकाई के प्रमुख हैं. राज्य इकाई प्रमुखों की औसत आयु 55 वर्ष है; राष्ट्रीय परिषद के सदस्यों की औसत आयु 58 वर्ष है

 ओबीसी एवं दलितों को बढ़ावा
कैबिनेट में अब 27 ओबीसी मंत्री हैं, जिनमें से 12 दलित हैं. पार्टी पिछड़े नेताओं को जिला/राज्य स्तर पर भी अधिक जिक्वमेदारी दे रही है

 अब ब्राह्मण/बनिया की पार्टी नहीं
भाजपा धीरे-धीरे इस जातीय गठबंधन से बाहर निकल रही है, जिसका जनसंघ के जमाने से पार्टी औरसंघ परिवार पर दबदबा रहा है

2018 में मोदी सरकार ने जाति आधारित जनगणना पर प्रारंभिक कार्य शुरू किया लेकिन आंतरिक दबाव के कारण इसे छोड़ दिया गया. अब फिर इस पर विचार हो रहा है
 

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