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महाराष्ट्रः एनसीपी की आखिरी जंग?

महाराष्ट्र में 9 जुलाई को हुए द्विवार्षिक राज्य विधान परिषद चुनावों में उन्होंने कांग्रेस को एक अतिरिक्त सीट 'उपहार' के रूप में दी थी. इससे महाराष्ट्र की राजनीति में प्रासंगिक रहने की पवार की बेचैनी झलकती है.

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मुश्किल राह पुणे में एनसीपी की रैली में शरद पवार मुश्किल राह पुणे में एनसीपी की रैली में शरद पवार

नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के अध्यक्ष शरद पवार ने मार्च से लेकर अब तक राहुल गांधी से तीन बार मुलाकात की है. 15 वर्षों में किसी कांग्रेस अध्यक्ष के साथ पहली बार वे आमने-सामने बैठकर अकेले में बातचीत कर रहे हैं. महाराष्ट्र में 9 जुलाई को हुए द्विवार्षिक राज्य विधान परिषद चुनावों में उन्होंने कांग्रेस को एक अतिरिक्त सीट 'उपहार' के रूप में दी थी.

इससे महाराष्ट्र की राजनीति में प्रासंगिक रहने की पवार की बेचैनी झलकती है. वे संभवतः आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लेना चाहते हैं.

हाल के प्रमुख चुनावों में से एक को छोड़कर बाकी सभी में मात खाने के बाद एनसीपी की किस्मत कुछ वक्त से ढलान पर है. विधान परिषद चुनावों में भी एनसीपी समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार संदीप बेडसे नासिक में शिवसेना के अशोक दराडे से हार गए क्योंकि पार्टी के ही पुराने कद्दावर नेता छगन भुजबल ने दरादे को समर्थन दिया था.

देवेंद्र फडऩवीस सरकार के खिलाफ किसानों-दलितों को प्रोत्साहित करने से लेकर जातीय राजनीति का कार्ड खेलने तक, पवार ने अपनी पार्टी को पुनर्जीवित करने के लिए हर चाल चली. पर फिलहाल उनका कोई भी दांव-पेच काम नहीं कर रहा. पिछले दिसंबर में, उन्होंने किसानों से आह्वान किया था कि जब तक सरकार कर्जमाफी और फसलों का खरीद मूल्य बढ़ाने के अपने वादे को पूरा नहीं करती, वे अपना कर भुगतान बंद कर दें.

26 जनवरी को, एनसीपी के इस कद्दावर नेता ने और नीचे झुकते हुए अन्य दलों के दूसरे और तीसरे स्तर के नेताओं के साथ मुंबई में एक रैली को संबोधित किया. वहीं मार्च में राज ठाकरे के साथ टीवी पर एक वार्तालाप में पवार ने मनसे अध्यक्ष की उस बात का समर्थन कर दिया कि मुंबई में मराठियों पर गुजराती हावी हो रहे थे. पिछले महीने ही उन्होंने पुणे के ब्राह्मणों को, उनकी पहचान परंपरागत पगड़ी पहनने से इंकार करके नाराज कर दिया.

सियासी पर्यवेक्षकों का तो ऐसा भी मानना है कि पवार अपनी ही पार्टी के नेताओं को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर रहे हैं. उन्होंने भुजबल के प्रभाव को कम करने के लिए राज्य विधान परिषद में विपक्ष के नेता के रूप में मराठवाड़ा के एक युवा ओबीसी नेता धनंजय मुंडे का समर्थन किया.

लेकिन बाद में उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि दूसरे मराठा नेता स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव से अलग रहें (एक निर्वाचन क्षेत्र जिसमें स्थानीय निगमों के प्रतिनिधि विधान परिषद के उम्मीदवार का चुनाव करते हैं) और इस हार का ठीकरा मुंडे के सिर फोड़ दिया.

एनसीपी के सामने अपना कुनबा बचाए रखने की भी चुनौती है. जून में, ठाणे के युवा विधायक और पवार के करीबी वसंत डावखरे के पुत्र निरंजन डावखरे पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए. डावखरे का दावा था कि कई अन्य नेता भी पार्टी छोडऩे को तैयार बैठे हैं.

ऐसे में पवार को लगता है कि एनसीपी को बचाने का एकमात्र तरीका कांग्रेस से हाथ मिलाना है. लेकिन महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष अशोक चव्हाण गठबंधन के पक्ष में तो दिखते हैं, पर राज्य के नवनियुक्त कांग्रेस प्रभारी मल्लिकार्जुन खडग़े चव्हाण की राय से इत्तेफाक नहीं रखते. मुंबई के विश्लेषक हेमंत देसाई कहते हैं कि पवार घुटने टेकने से पहले अपने सारे घोड़े खोलकर देख लेना चाहते हैं.

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