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उत्तराखंड आपदा के नाम पर इस तरह मची लूट

उत्तराखंड की आपदा के दो साल बाद राहत के नाम पर मची लूट के खुलासे ने सियासी पारा चढ़ाया तो बचाव की मुद्रा में आई कांग्रेस राज्य स्तरीय जांच को ही काफी बता सीबीआइ जांच से हिचक रही.

उत्तराखंड के केदारनाथ में 16 जून, 2013 में आई त्रासदी को दो साल होने वाले हैं. इस दौरान इस आपदा को लेकर एक बार फिर राज्य की राजनीति गरम हो गई है. सूचना के अधिकार के तहत पांच आपदाग्रस्त जिलों में पैसों का बंदरबाट मामला सामने आने से विपक्षी दल बीजेपी इसे राज्य सरकार के खिलाफ  हथियार बनाने का मंसूबा बना लिया है. बीजेपी ने सीबीआइ से जांच की मांग की है.

नेशनल ऐक्शन फोरम फॉर सिविल जस्टिस की ओर से लगाई गई आरटीआइ से इसका खुलासा हुआ है. इस फोरम के भूपेंद्र कुमार पिछले डेढ़ साल से इन पांच आपदाग्रस्त जिलों में राहत में किए गए कार्यों का ब्यौरे की मांग की थी. अब जो तथ्य मिले हैं वे चौंकाने वाले हैं. भूपेंद्र कुमार के अनुसार, आपदाग्रस्त क्षेत्रों में फंसे लोग जब अपनी जान बचाने की गुहार के लिए संघर्ष कर रहे थे और दूरदराज से उन्हें ढूंढने आए उनके रिश्तेदार उनकी तलाश के लिए दर-दर भटक कर उनकी सलामती की दुआ कर रहे थे, उस वक्त उन्हें बचाने के नाम पर जिलों के अधिकारियों ने सरकारी खजाने को जिस तरह अपनी मौज-मस्ती के लिए इस्तेमाल किया वह मानवीय संवेदना को झकझोर देने वाला है.

उत्तराखंड आपदा पर मची लूटहोटलों के बिल हों या गाड़ियों में ईंधन भरवाने का मामला या फिर आपदा राहत के नाम पर बांटी गई राशि, सूचना के अधिकार कानून से मिली जानकारी चौंकाने वाली है. इस प्रकरण से राज्य के सूचना आयुक्त अनिल शर्मा हैरान हैं. शर्मा ही इन अनियमितताओं को मुख्यमंत्री हरीश रावत, मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव के संज्ञान में लाने वाले शख्स हैं. इसकी वजह से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने शर्मा पर बीजेपी को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया है. लेकिन इस मामले को उजागर करने के लिए सूचना आयुक्त को धमकियां भी मिल रही हैं, जिसकी शिकायत उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से करते हुए सुरक्षा की गुहार लगाई है.

जांच पर ही ठनी रार
आपदा राहत के नाम पर हुए इस घोटाले को लेकर विपक्ष भले ही सीबीआइ जांच कराने की मांग कर रहा है लेकिन मुख्यमंत्री का कहना है कि इसकी जांच मुख्य सचिव करेंगे. उनका कहना है कि मुख्य सचिव की जांच रिपोर्ट के आधार पर दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. इसके लिए मुख्यमंत्री ने एक महीने के भीतर मुख्य सचिव से अपनी रिपोर्ट देने को भी कहा है. लेकिन विपक्ष के नेता अजय भट्ट के अनुसार, इसमें संदेह है कि राज्य की मशीनरी सत्तारूढ़ दल के इशारे पर इस जांच के किसी निष्कर्ष पर पहुंचेगी. यह मामला पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्रित्व काल का है, इस मामले की जांच के लिए मुख्य सचिव को सीबीआइ से ज्यादा कारगर मान रहे हैं. बहुगुणा का कहना है कि आपदा के दौरान थोड़ी बहुत चूक हुई भी होगी तो इसे तूल देने की बजाए उसमें दोषी अधिकारियों को चिन्हित कर उनके खिलाफ  कार्रवाई की जानी चाहिए. इसके लिए मुख्य सचिव जो रिपोर्ट देंगे वह सीबीआइ से अधिक तथ्यात्मक होगी. बहुगुणा कहते हैं, “मैं जज रह चुका हूं और जानता हूं कि प्रशासन की जांच सीबीआइ से ज्यादा प्रभावी होती है.”

राज्य के मुख्य सचिव ने 10 जून तक पांचों आपदाग्रस्त जिलों रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, चमोली, बागेश्वर, पिथौरागढ़ के डीएम से बिंदुवार रिपोर्ट तलब कर ली है. मुख्य सचिव एन. रविशंकर के अनुसार, मुख्यमंत्री ने चार हफ्ते में रिपोर्ट मांगी है और वे तय सीमा में रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप देंगे. लेकिन सवाल है कि क्या नौकरशाहों को दोषी ठहराकर उन्हें दंडित किया जाएगा?

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