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सोशल मीडिया-बेकाबू इंटरनेट चुनावी मोर्चा

पार्टियों ने मतदाताओं का मन बदलने के लिए सोशल मीडिया मंचों को बनाया बड़ा औजार पर इसके खर्च और फेक न्यूज पर काबू पाने में चुनाव आयोग नाकाम.

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करीब ढाई-तीन बजे के बाद फोन करना, अभी बात नहीं कर पाऊंगा. संकल्प पत्र जारी होने वाला है, सब उसी में व्यस्त हैं," दिल्ली में बैठी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सोशल मीडिया टीम के एक वरिष्ठ सदस्य ने 8 अप्रैल को यह कहकर फोन तपाक से काट दिया. इससे समझा जा सकता है कि भाजपा की आइटी सेल घोषणापत्र जारी होते ही उससे जुड़े कंटेंट (वीडियो, टेक्स्ट, ग्राफिक्स) सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म्स (व्हाट्सऐप, ट्विटर, फेसबुक) पर डालने के लिए पूरी तरह अलर्ट थी.

उधर, कांग्रेस की सोशल मीडिया टीम को 7 अप्रैल की शाम को ही अलर्ट कर दिया गया था कि अगले दिन भाजपा के घोषणापत्र की खामियों और अपनी पार्टी के घोषणापत्र से उसकी तुलना से जुड़े कंटेंट को सोशल प्लेटफॉर्स्म पर शेयर और प्रमोट करना है. दिल्ली में सोशल मीडिया टीम की बैठक में ट्विटर पर ट्रेंड कराया जाने वाला हैशटैग भी तय कर लिया गया, पर लीक होने के डर से ज्यादा लोगों को बताया नहीं गया था.

घोषणापत्र जारी होने से पहले दोनों ओर हैशटैग तय थे, टीमें और बूथ स्तर तक कार्यकर्ता तैनात थे. 2019 लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा का संकल्प पत्र जारी होने के कुछ ही मिनटों में #BJPSankalpPatr2019 और #BJPJumlaManifesto जैसे हैशटैग के साथ हजारों ट्वीट चहचहाने लगे. फेसबुक और व्हाट्सऐप पर भी पोस्ट शेयर की जाने लगीं. जाहिर है, इस बार लोकसभा चुनाव में एक बड़ा मोर्चा सोशल मीडिया बन गया है.

यह मोर्चा कितना बड़ा है, इसका अंदाजा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म में हो रहे खर्च से ही लग जाता है. मोगे मीडिया के चेयरमैन संदीप गोयल का आकलन है, ''2019 में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कंटेंट को वायरल करने या ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए करीब 1,000 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है.'' इसमें राज्य सरकारों और केंद्र सरकार की ओर से सरकारी खर्च पर किया गया विज्ञापन शामिल नहीं है.

यह सारा खर्च राजनैतिक दलों और उम्मीदवारों का है. सोशल मीडिया के बाजार में अभी भी फेसबुक के पास सबसे बड़ी हिस्सेदारी है. संदीप कहते हैं, ''80 फीसद खर्च फेसबुक, 10 फीसद गूगल और बाकी 10 फीसद में अन्य प्लेटफॉर्म शामिल होंगे. सभी पार्टियों की ओर से चुनाव प्रचार पर कुल 5,000 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है.'' उनके मुताबिक, इसमें सोशल मीडिया पर करीब 20 फीसद खर्च होने जा रहा है. विज्ञापन के मामले में फेसबुक अन्य कंपनियों की तुलना में काफी आगे है.  

हालांकि 2014 की सूरत इससे अलग थी. उस समय देश में केवल भाजपा ऐसी पार्टी थी, जिसने देशभर में चुनाव के प्रचार के लिए सोशल मीडिया का प्रमुखता से इस्तेमाल किया था. लेकिन 2019 आते-आते न केवल अन्य राष्ट्रीय बल्कि क्षेत्रीय पार्टियां भी सोशल मीडिया के महत्व को समझकर अपनी रणनीति और संसाधनों के साथ मैदान में हैं.

2019 में क्या अलग?  

2014 में इंटरनेट तक कुल 25 करोड़ लोगों की ही पहुंच थी, जबकि इस समय इसके यूजर्स की संक्चया करीब 56 करोड़ है. डिजिटल मीडिया एक्सपर्ट तन्मय शंकर कहते हैं, ''देश के हर गांव में बिजली, सड़क, अस्पताल या स्कूल भले न पहुंचा हो पर इंटरनेट व स्मार्टफोन जरूर पहुंच गया है. व्हाट्सऐप लगभग हर फोन में इंस्टॉल है.'' इस बार 8.4 करोड़ नए वोटर जुड़े हैं, जिनमें करीब 1.5 करोड़ 18-19 साल के हैं. सोशल मीडिया का सबसे ज्यादा इस्तेमाल यूथ ही करते हैं. इस बार चुनाव में सोशल मीडिया की भूमिका पिछली बार के मुकाबले कहीं ज्यादा है. पर साथ-साथ सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल मसलन, फेक न्यूज, भड़काऊ सामग्री और इससे चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश जैसी चिंताएं भी उभरी हैं.  

सिलिकॉन वैली की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनी एम्प्लीफाइ डॉट एआइ (Amplify.ai) के इंडिया हेड कार्तिक वालिया बताते हैं फेक न्यूज और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के गलत इस्तेमाल की शिकायतों के चलते कंपनियों ने अपने नियमों में बदलाव किया है.'' मसलन, फेसबुक फर्जी पेजों की पहचान कर उन्हें डिलीट कर रहा है और उसने कंटेंट की रीच (यूजर्स तक पहुंच) को घटा दिया है. व्हाट्सऐप ने एक बार में मैसेज फॉरवर्ड करने की संख्या को अधिकतम 5 कर दिया है. कार्तिक कहते हैं, ''ऐसे में हालात 2014 से बहुत अलग हैं. उस वक्त किसी पार्टी या नेता का मैसेज बड़ी संख्या तक पहुंच जाता था.

अब 'वन टू ऑल की जगह वन टू वन्य की रणनीति ज्यादा कारगर है और सभी का फोकस इसी पर है.'' ज्यादातर पार्टियां अब ई-मेल, व्हाट्सऐप ग्रुप, मोबाइल ऐप्लिकेशन, फेसबुक मैसेंजर के जरिए अपने फॉलोअर्स से सीधे संपर्क स्थापित करने जैसे प्रयास कर रही हैं, ताकि सीधे मतदाता से जुड़ा जा सके. इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अहम भूमिका निभा रही है. इसकी मदद से लाखों यूजर्स तक कोई मैसेज भेजकर संपर्क स्थापित किया जा सकता है.

भाजपा अब भी सबसे आगे

सोशल मीडिया के किसी भी प्लेटफॉर्म पर भाजपा की पहुंच अन्य राजनैतिक पार्टियों से ज्यादा है. भाजपा के आइटी सेल से जुड़े एक वरिष्ठ पदाधिकारी कहते हैं, ''सोशल मीडिया पर पहुंच के मामले में भाजपा की तुलना किसी भी अन्य सियासी दल से नहीं की जा सकती. प्रधानमंत्री की लोकप्रियता भी सोशल मीडिया पर अन्य नेताओं की तुलना में कहीं ज्यादा है. यह भाजपा की सबसे बड़ी ताकत है.'' फिलहाल, ट्विटर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फॉलोअर्स 4 करोड़ 60 लाख से ज्यादा हैं, जबकि मई 2015 में ट्विटर पर आए राहुल गांधी के फॉलोअर्स 91 लाख ही हैं.

भाजपा की दूसरी बड़ी ताकत कैडर आधारित पार्टी होना है, जो किसी डिजिटल अभियान को सफल बनाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं. भाजपा का कोई भी संदेश व्यवस्थित तरीके से 10-15 मिनट में बूथ स्तर से जुड़े कैडर के पास पहुंच जाता है. लोकसभा चुनाव के लिए बनाई गई भाजपा की आइटी और सोशल मीडिया कैंपेन कमेटी के सदस्य खेमचंद शर्मा कहते हैं, ''सोशल मीडिया पर भाजपा की पहुंच का ही असर है कि 'मैं भी चौकीदार' अभियान को दुनियाभर में 60 करोड़ से ज्यादा इंप्रेशन मिले.'' इस अभियान के तहत प्रधानमंत्री की देखादेखी 20 लाख से ज्यादा भारतीयों ने अपने ट्विटर हैंडल पर नाम के आगे चौकीदार शब्द जोड़ लिया.

इस थीम के पोस्टर, गाने और विज्ञापन बनने लगे. दो दिन तक श्मैं भी चौकीदार्य हैशटैग ट्विटर पर ग्लोबली ट्रेंड करता रहा. खेमचंद कहते हैं, ''सोशल मीडिया के सभी प्लेटफॉर्म पर कई तरह के अंकुश लगाए जा रहे हैं. ऐसे में भाजपा का नमो ऐप्लिकेशन कारगर साबित होगा. यह सीधे मतदाता से वन टू वन जुडऩे में कारगर है. अब तक यह मोबाइल ऐप्लिकेशन 1 करोड़ से ज्यादा डाउनलोड हो चुका है.'' इस ऐप के जरिए यूजर्स भाजपा के 2019 के चुनाव अभियान से जुड़ी हर जानकारी पा सकते हैं. प्रधानमंत्री की रैलियों, मन की बात, नमो टीवी सरकार की उपलब्धियों पर तैयार हुए कंटेंट आदि यूजर की पहुंच से महज एक क्लिक दूर होंगे. भाजपा ने हर जिले में नमो ऐप इंचार्ज बनाए हैं, जिनका लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं को इससे जोडऩा है.

कांग्रेस की भी मजबूत धमक

2014 में सोशल मीडिया पर कहीं नहीं दिख रही कांग्रेस ने पिछले चार वर्षों में अपनी पहुंच बढ़ाई है. इंडियन यूथ कांग्रेस के नेशनल सोशल मीडिया इंचार्ज वैभव वालिया बताते हैं, ''पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस एक बड़े अवसर से चूक गई थी. पर पिछले चार वर्षों में कांग्रेस, यूथ कांग्रेस, महिला कांग्रेस समेत सभी इकाइयों ने न केवल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है बल्कि पहुंच भी बढ़ाई है.'' इसके अलावा कांग्रेस के सभी नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जोड़ा गया है.

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