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उत्तर प्रदेशः जाट लैंड में बनी जोरदार जोड़ी

एक दशक तक उपेक्षित रहने के बाद राष्ट्रीय लोक दल और उसके नए मुखिया जयंत चौधरी को किसान आंदोलन ने संजीवनी दी, विरासत वापसी को लेकर जयंत के लिए ये चुनाव करो या मरो जैसे

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गदा उठाया, गदर काटेंगे! सपा प्रमुख अखिलेश यादव (बाएं) रालोद के जयंत चौधरी के साथ 7 दिसंबर को मेरठ की परिवर्तन रैली में गदा उठाया, गदर काटेंगे! सपा प्रमुख अखिलेश यादव (बाएं) रालोद के जयंत चौधरी के साथ 7 दिसंबर को मेरठ की परिवर्तन रैली में

प्रशांत श्रीवास्तव

पिछले साल 28 जनवरी को राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के पूर्व प्रमुख और जाट नेता दिवंगत अजित सिंह ने किसान नेता राकेश टिकैत को फोन किया था और कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन को अपना समर्थन दिया था. अजित सिंह ने वह कॉल अपने बेटे जयंत चौधरी के फोन से किया था. कॉल माकूल मौके पर किया गया था. किसान आंदोलन खत्म होने के कगार पर था, लेकिन राष्ट्रीय टीवी पर टिकैत के रो पड़ने और भावनात्मक अपील के बाद उसमें नई जान आ गई. टिकैत को समर्थन देने और पश्चिम यूपी से अपने समर्थकों को राष्ट्रीय राजधानी के गाजीपुर बॉर्डर भेजने के जयंत के फैसले ने आंदोलन को निर्णायक गति दे दी.

अगले दिन जयंत खुद टिकैत से मिलने गाजीपुर बॉर्डर पहुंचे. जयंत के इस कदम ने 2014 से ही अवसान की ओर अग्रसर रालोद की राजनीति को नया मोड़ दे दिया. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई. अजित और जयंत को भी अपने गढ़ बागपत जिले में हार का सामना करना पड़ा. 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को महज एक सीट पर जीत मिली; छपरौली से उनके विधायक सहेंद्र सिंह रमाला बाद में भाजपा में शामिल हो गए थे.

किसानों का कामयाब आंदोलन ही वह मुद्दा है जो जाटों को अपने पक्ष में करने और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस समुदाय का पहला विकल्प बनने के लिए रालोद का जरिया बन सकता है. मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ गठजोड़ से रालोद की ताकत में इजाफा हुआ है. सपा पश्चिमी यूपी में रालोद को 35-40 सीटें देने को राजी हो गई है.

पिछले साल अजित सिंह के निधन के बाद जयंत को 'बड़े चौधरी' की उपाधि मिली. यह उत्तर भारत के खापों में उनकी हैसियत का प्रतीक है. 42 वर्षीय जयंत चौधरी लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एलएसई) से फाइनेंस में पोस्टग्रेजुएट हैं. वे पहली बार 2009 में चुनाव में उतरे और मथुरा से सांसद बने थे. नाम न जाहिर करने की शर्त पर रालोद के एक वरिष्ठ पदाधिकारी कहते हैं, ''अगर जयंत को चौधरी साहब (उनके दादा और पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह) की राजनैतिक विरासत को आगे बढ़ाना है तो ये चुनाव उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. पिछले कई चुनावों के मुकाबले इस बार हालात ज्यादा अनुकूल हैं.''

विश्लेषकों का कहना है कि बागपत, मुजफ्फरनगर, शामली, मथुरा और मेरठ समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों की 70-75 विधानसभा सीटों पर सपा-रालोद के गठबंधन का असर पड़ सकता है. पश्चिमी यूपी के 14 जिलों की 71 विधानसभा सीटों पर जाट महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और 2017 में भाजपा ने इनमें से 51 सीटों पर जीत हासिल की थी. वहीं सपा को इनमें से 16 सीटों पर जीत मिली थी. इस बार सपा-रालोद गठबंधन को जाटों के इस गढ़ में क्लीन स्वीप की उम्मीद है. रैलियों पर रोक से पहले इस क्षेत्र में कम से कम आधा दर्जन संयुक्त रैली और रोडशो की योजना थी. रालोद प्रमुख जयंत कहते हैं, ''पश्चिमी यूपी में लोग भाजपा सरकार से आजिज आ चुके हैं, इसलिए हमारा गठबंधन लोगों के लिए एक भरोसेमंद राजनैतिक विकल्प है. हमें यकीन है कि नतीजे सकारात्मक होंगे.''

उत्तर प्रदेशः जाट लैंड में बनी जोरदार जोड़ी
उत्तर प्रदेशः जाट लैंड में बनी जोरदार जोड़ी

सपा के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि आखिर गठबंधन किस तरह दोनों पार्टियों के लिए फायदे का सौदा है. वे कहते हैं, ''इस क्षेत्र में ब्लॉक स्तर पर रालोद की मजबूत उपस्थिति है, खासकर जाटों के बीच. पश्चिम यूपी में किसान आंदोलन के दौरान उनकी बहुत बड़ी भूमिका थी. रालोद के साथ हमारे गठजोड़ की एक अन्य वजह यह है कि युवाओं के बीच अखिलेश यादव और जयंत चौधरी, दोनों की बहुत ज्यादा लोकप्रियता है. इस गठजोड़ से निश्चित तौर पर हमें फायदा होगा.''

जाट-मुस्लिम एकता

अगस्त-सितंबर 2013 के मुजफ्फरनगर हिंदू-मुस्लिम दंगों के बाद रालोद का पतन शुरू हो गया था. उन दंगों में 62 लोग मारे गए थे. उन दंगों के बाद जाटों का एक बहुत बड़ा हिस्सा भाजपा के पक्ष में चला गया था. पिछले साल, रालोद ने पश्चिमी यूपी में जाट समुदाय को अन्य वर्गों खासकर मुसलमान और दलितों के साथ फिर से जोड़ने के लिए 'भाईचारा जिंदाबाद' नामक जन अभियान शुरू किया था. अक्तूबर में इस अभियान का आगाज दंगों का केंद्र रहे मुजफ्फरनगर से हुआ था और कविता पाठ, थिएटर और विभिन्न विषयों पर चर्चा शुरू करने का एक सामाजिक-सांस्कृतिक मंच बन गया. इसका प्राथमिक मकसद जाटों और मुसलमानों के बीच एकता को बहाल करना था. पश्चिमी यूपी में 15 फीसद जाट और मुस्लिम आबादी 22 फीसद है.

रालोद के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, ''अगर हम जाटों और मुसलमानों को एकजुट करने में कामयाब रहे तो हम अजेय साबित होंगे क्योंकि जाटों और मुसलमानों के साथ-साथ यादवों और कुछ अन्य ओबीसी जातियों का गठजोड़ हमारी वोट हिस्सेदारी को 40 फीसद से भी ज्यादा कर देगा और वह भाजपा को हराने के लिए इतना काफी होगा.'' विशेषज्ञ कहते हैं कि कृषि कानूनों को वापस लिया जा चुका है, लेकिन एमएसपी, गन्ना उत्पादकों के बकाया भुगतान और कई अन्य मुद्दों को लेकर किसान अभी भी नाराज हैं. ऐसे में भाजपा के खिलाफ रालोद-सपा गठबंधन किसानों का पहली पसंद बन सकता है.

हाल ही में, रालोद ने नोमान मसूद (पूर्व कांग्रेसी विधायक इमरान मसूद के भाई), वरिष्ठ बसपा नेता हाजी युनूस और वरिष्ठ पत्रकार शाहिद सिद्दीकी समेत कई मुस्लिम नेताओं को पार्टी में शामिल किया है. दलितों की जरूरतों पर गौर करने के लिए पार्टी का एक दलित विंग भी है. पश्चिमी यूपी में 20 फीसद मतदाता दलित समुदाय के हैं. पार्टी के प्रवक्ता अनुपम मिश्र कहते हैं, ''यह हमारे लिए 'करो या मरो' सरीखा चुनाव है. जयंत के नेतृत्व में यह पहला चुनाव है. हमारी रैलियों में भारी भीड़ उमड़ रही है और बसपा, भाजपा और कांग्रेस समेत विभिन्न पार्टियों के नेता हमारे साथ जुड़ रहे हैं. पार्टी में पेशेवरों को शामिल करने के लिए एक अलग 'टीम रालोद' का गठन किया गया है. ऐसे में यह जाहिर है कि आगामी चुनावों में पश्चिमी यूपी में हम लोगों की पहली पसंद हैं.''

रालोद के नेता इतने उत्साहित हैं कि अगर पार्टी सपा के साथ सत्ता में आती है तो वे जयंत के लिए उपमुख्यमंत्री के पद की उम्मीद कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश की राजनैतिक विश्लेषक डॉ. शिल्प शिखा सिंह का कहना है, ''इस गठबंधन से भाजपा मुश्किल में है. किसान आंदोलन ने न केवल रालोद की किस्मत को फिर से जगा दिया है, बल्कि उसने जयंत के नेतृत्व को भी एक नया आयाम दिया है.'' पर जयंत की यह नई शख्सियत क्या वोटों में भी तब्दील होगी? इसका अब मार्च में ही पता चलेगा.

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