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जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराने का पीएम का वादा पूर करने में बाधा ही बाधा

जून में पीडीपी-भाजपा सरकार के पतन के बाद लगे राज्यपाल शासन के तहत केंद्र ने राज्य में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों का हवाला देते हुए अदालत से इस मामले की सुनवाई को टालने का अनुरोध किया है.

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 लंबी कतार 2014 में श्रीनगर में मतदान केंद्र के बाहर खड़े लोग
लंबी कतार 2014 में श्रीनगर में मतदान केंद्र के बाहर खड़े लोग

जम्मू-कश्मीर में पंचायत चुनाव कराने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वतंत्रता दिवस पर किया वादा निभाना मुश्किल हो सकता है. घाटी के दो प्रमुख राजनैतिक दलों—नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने खुद को इस प्रक्रिया से बाहर रखने का फैसला किया है. ऐसे में दिल्ली में हुए फैसले को अमली जामा पहनाने में नए राज्यपाल सत्यपाल मलिक के रास्ते में बड़ी मुश्किल खड़ी होगी.

एनसी अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती, दोनों ने कहा है कि जब तक केंद्र अनुच्छेद 35-ए पर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करता, तब तक वे चुनाव का बहिष्कार करेंगे. अनुच्छेद 35-ए जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को विशेषाधिकार प्रदान करता है और बाहरी लोगों को राज्य में संपत्ति खरीदने या सरकारी नौकरी पाने से रोकता है.

उसे फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है और केंद्र ने इसकी संवैधानिक वैधता पर चुप्पी की नीति अपनाई है. लेकिन जून में पीडीपी-भाजपा सरकार के पतन के बाद लगे राज्यपाल शासन के तहत केंद्र ने राज्य में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों का हवाला देते हुए अदालत से इस मामले की सुनवाई को टालने का अनुरोध किया है.

हालांकि 35-ए और उससे जुड़े संवैधानिक प्रावधानों, जिसमें अनुच्छेद 370 भी शामिल है, को लेकर मौजूदा अनिश्चितता चिंता का विषय है. इससे घाटी में फिर से आतंकवाद के पांव पसारने का खतरा है. हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर रियाज नायकू ने उम्मीदवारों को "तेजाब'' से जलाने की धमकी दी है. हुर्रियत अलगाववादियों को डर है कि दिल्ली की सरकार इसे कश्मीरियों की भारत के प्रति वोट के रूप में सहमति की तरह प्रचारित करेगी. इसलिए उन्होंने भी बहिष्कार का ही फैसला किया है.

शोपियां जिले की वाची सीट के पीडीपी विधायक एजाज अहमद मीर ने बताया कि 31 अगस्त को मतदान कार्यक्रम की घोषणा के साथ ही कार्यकर्ता घबराहट में अपने गांवों से पलायन कर गए. खुद कभी सरपंच रहे मीर कहते हैं, "मौजूदा हालत में चुनाव कराना नामुमकिन है...इसमें कोई शिरकत नहीं करेगा.''

आतंकवादी खतरे के अलावा, बडगाम के जूओगु गांव के मौलवी मकबूल मीर जैसे पूर्व पंचायत सदस्य इसे "विश्वासघात'' भी करार देते हैं. वे कहते हैं कि 2011 के पंचायत चुनावों को देखते हुए अब कोई भी चुनाव लडऩा नहीं चाहेगा.

40 वर्षीय मकबूल का कहना है कि पंचायतों को काम के लिए फंड ही नहीं दिया जाता. विभिन्न सरकारों ने, यहां तक कि पहले दो वर्षों के लिए पंचायत सदस्यों का वेतन तक देने से इनकार कर दिया था. पूर्ववर्ती नगर निगम के सदस्यों में भी इस बात को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है. श्रीनगर के पूर्व महापौर सलमान सागर का कहना है कि काउंसलर को अपने संबंधित वार्डों में काम कराने के लिए सालाना महज 5 लाख रुपए आवंटित किए गए थे.

पिछले महीने, राज्यपाल ने पूरे आत्मविश्वास के साथ जम्मू-कश्मीर के 79 नगरपालिका निकायों और 4,450 पंचायतों के चुनाव के लिए कार्यक्रम की घोषणा की थी. चुनाव 1 अक्तूबर और 4 दिसंबर के बीच कई चरणों में निर्धारित किए गए थे.

चुनावों की तैयारी शुरू हो चुकी है. पंचायत चुनावों के लिए करीब 25,000 मतदान पेटियां हरियाणा से जम्मू और श्रीनगर पहुंचाई गई हैं और नगर निगम चुनावों के लिए सभी जिला मुख्यालयों को ईवीएम भेज दिए गए हैं. अधिसूचना भी जल्द ही जारी की जाएगी.

सुरक्षा बलों ने भी तैयारियां शुरू कर दी हैं और वे राज्य में शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करने के लिए काम पर जुट गए हैं. घाटी में पहले से ही मौजूद सुरक्षा बलों के अलावा, अमरनाथ यात्रा के लिए जो 235 सीएपीएफ (केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल) कंपनी आई थी, उसे भी चुनाव सुरक्षित संपन्न कराने के लिए राज्य में ही बने रहने के आदेश दिए गए हैं. सेना भी "शांति बहाल रखने के सारे प्रयास'' करेगी.

लेकिन श्रीनगर लोकसभा उपचुनाव में पिछले साल बड़े पैमाने पर हुई हिंसा और ऐतिहासिक रूप से कम मतदान (7.14 प्रतिशत) को देखते हुए ज्यादा उम्मीद नहीं लगाई जा सकती?

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