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जम्मू-कश्मीर डीडीसी चुनावः कौन जीता, किसकी हार

यह जरूरी नहीं कि जनता ने गुपकार गठबंधन के लिए वोट किया है. अगर कोई अन्य पार्टी होती तो भी लोग पिछले साल के फैसले पर अपना विरोध जताने के लिए, उन्हें वोट कर देते.'

जश्न श्रीनगर के बलहमा क्षेत्र से डीडीसी चुनाव में भाजपा के एजाज हुसैन की जीत के बाद 22 दिसंबर को जश्न मनाते भाजपा समर्थक जश्न श्रीनगर के बलहमा क्षेत्र से डीडीसी चुनाव में भाजपा के एजाज हुसैन की जीत के बाद 22 दिसंबर को जश्न मनाते भाजपा समर्थक

मोअज्जम मोहम्मद

वर्ष 2019 में 19 अगस्त को अनुच्छेद 370 के हटाए जाने और जम्मू और कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजन के बाद, जिला विकास परिषद (डीडीसी) चुनाव यहां पहला बड़ा चुनावी अभ्यास था. 280 डीडीसी निर्वाचन क्षेत्रों में आठ चरणों में हुए मतदान में कड़ाके की सर्दी के बीच लोगों की अच्छी भागीदारी देखी गई. राज्य चुनाव आयोग के नतीजों में पीपल्स एलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन (पीएजीडी) जिसे गुपकार गठबंधन भी कहा जाता है, 110 सीटें जीतकर अव्वल रहा. वहीं, 75 सीटें (25 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर के साथ से) जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) मतदान प्रतिशत और सीटें, दोनों लिहाज से सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है.

निर्दलीय उम्मीदवारों ने 50 सीटें हासिल की हैं. गुपकार गठबंधन में शामिल नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) को 67 सीटें, पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) को 27, पीपल्स कॉन्फ्रेंस (पीसी) को 8, जम्मू और कश्मीर पीपल्स मूवमेंट (जेकेपीएम) को 3 और सीपीएम को 5 सीटें मिलीं. कांग्रेस को 26 सीटें मिली हैं और अगर इसे गुपकार को मिली सीटों के साथ जोड़ लें तो इनकी कुल संख्या 136 हो जाती है.

कश्मीर घाटी में तीन सीटें जीतकर भाजपा ने पहली बार घाटी में अपना चुनावी खाता खोला है. इनमें श्रीनगर, पुलवामा और बांदीपोरा डीडीसी निर्वाचन क्षेत्र की एक-एक सीटें शामिल हैं. परिणामों पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह, जो जम्मू से ताल्लुक रखते हैं, ने कहा, ''यह पहली बार हुआ जब घाटी के लोग अपने बीच से अपना नेता चुन सके हैं. जहां तक भाजपा की बात है, उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उसने पूरे जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में अपनी स्वीकार्यता बनाई है.''

बेशक भाजपा ने कश्मीर में खाता खोल लिया है लेकिन इससे पार्टी को इस क्षेत्र में डीडीसी पर नियंत्रण का कोई मौका नहीं मिलेगा. जम्मू में भी, केवल छह डीडीसी पर ही भाजपा का कब्जा हो सकेगा. प्रत्येक डीडीसी में 14 निर्वाचित सदस्य शामिल हैं जिनका नेतृत्व एक अध्यक्ष (राज्यमंत्री के दर्जे वाला) करेगा. जाहिर है, डीडीसी में गुपकार गठबंधन का दबदबा होगा क्योंकि नौ डीडीसी में इसे बहुमत हासिल है. बाकी डीडीसी में किसी एक दल या गठबंधन को बहुमत नहीं हासिल है और यहां निर्दलीय उम्मीदवार निर्णायक होंगे.

केंद्र शासित प्रदेश की पंचायती राज व्यवस्था में डीडीसी एक नई तृतीय श्रेणी है. इन नए जिला परिषदों के सदस्यों को प्रशासन का एक नया स्तर बनाने के लिए मतदाताओं की ओर से सीधे चुना गया था. 20 डीडीसी, प्रत्येक में 14 क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र होते हैं, का कार्यकाल पांच साल का होगा. डीडीसी का अध्यक्ष, परिषद के निर्वाचित सदस्यों में से चुना जाएगा. ब्लॉक विकास परिषदों (बीडीसी), 2019 के अंत में अस्तित्व में आया पंचायती राज व्यवस्था का एक और स्तर जिनके अधिकार क्षेत्र डीडीसी के साथ आपस में अंतरविरोधी नहीं होते, के सदस्य और अध्यक्ष भी, डीडीसी के सदस्य होंगे. सभी डीडीसी सदस्यों, चाहे वे 14 निर्वाचन क्षेत्रों से सीधे चुनकर आए हों या नहीं, को डीडीसी की बैठकों में वोट देने का अधिकार होगा. हालांकि, केवल सीधे निर्वाचित सदस्य ही डीडीसी अध्यक्ष/उपाध्यक्ष को चुनने या हटाने के लिए वोट कर सकते हैं. वास्तव में, यह (भविष्य के) विधायकों और बीडीसी अध्यक्षों को इसमें हस्तक्षेप से वंचित करेगा.

कुल मिलाकर देखा जाए तो इन परिणामों में भाजपा के बजाए गुपकार गठबंधन विजेता नजर आता है. क्यों? चुनाव में 1,200 से अधिक निर्दलीय उम्मीदवारों सहित कुल 2,100 उम्मीदवार मैदान में थे. फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाले गुपकार गठबंधन ने सीटों के बंटवारे पर काफी माथापच्ची के बाद अपने उम्मीदवार खड़े किए थे. एनसी ने 169 उम्मीदवार, पीडीपी ने 68, पीसी ने 11, सीपीएम ने 8, जेकेपीएम ने 11 और अवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस (एएनसी) ने एक उम्मीदवार उतारा था. जम्मू और कश्मीर अपनी पार्टी ने 166 और कांग्रेस ने 157 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था. भाजपा ने जम्मू और कश्मीर के 235 डीडीसी क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार उतारे थे. लेकिन उसने कश्मीर में तीन सीटों सहित केवल 75 सीटों पर जीत हासिल की.

चुनाव में अनुच्छेद 370 और राज्य के दर्जे की बहाली की मांग करती जम्मू और कश्मीर की मुख्यधारा की सात सियासी पार्टियों के गुपकार गठबंधन और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला था. दोनों पक्ष इन नतीजों की अपनी-अपनी व्याख्या कर रहे हैं. गुपकार गठबंधन का मानना है उसकी जीत, जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म करने के केंद्र के फैसले के खिलाफ एक जनमत है और इससे उनकी मांग के भविष्य में और तेज होने की उम्मीद है. 23 दिसंबर को श्रीनगर में एनसी मुख्यालय नवा-ए-सुबह में अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उमर अब्दुल्ला ने कहा, ''अगर आप वास्तव में मानते हैं कि यह लोकतंत्र की जीत है तो आपको लोगों की आवाज सुननी होगी.

जम्मू-कश्मीर के लोगों ने भारी बहुमत से कहा है कि वे 5 अगस्त 2019 के फैसले को स्वीकार नहीं करते हैं. हम यह भी यह स्वीकार करते हैं कि लोकतंत्र जीता है. हमने कब कहा कि हमें लोकतंत्र पर भरोसा नहीं है? यह और बात है कि आपको हम पर भरोसा नहीं है. हम पहले दिन से यह कहते रहे हैं कि हम अपने अधिकारों के लिए लड़ेंगे लेकिन गैर-कानूनी या असंवैधानिक रूप से नहीं. हम इस राज्य में माहौल को बिगाड़ने के लिए नहीं बल्कि इसे और बेहतर बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.''

कश्मीर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के पूर्व प्रोफेसर और सियासी विश्लेषक नूर अहमद बाबा इसे 5 अगस्त के बाद से जम्मू-कश्मीर में भाजपा की शुरू की गई नए तरह की राजनीति के खिलाफ लोगों की प्रतिक्रिया के रूप में देखते हैं. वे कहते हैं, ''भाजपा ने पिछले साल से जो राजनीति शुरू की है, इन चुनाव परिणामों के जरिए जनता ने उसे खारिज किया है. लोगों ने वोटों के माध्यम से अपना इरादा जता दिया है.''

बाबा के अनुसार, गुपकार गठबंधन को वोट देकर लोगों ने यह बताया कि वे क्या चाहते हैं. वे कहते हैं, ''यह जरूरी नहीं कि जनता ने गुपकार गठबंधन के लिए वोट किया है. अगर कोई अन्य पार्टी होती तो भी लोग पिछले साल के फैसले पर अपना विरोध जताने के लिए, उन्हें वोट कर देते.''

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