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बिहारः आरंभ में ही अपशकुन

जातीय समीकरणों के आधार पर तरजीह पा गए भाजपा के नए नेताओं से पार्टी के विस्तार की उम्मीदें थीं लेकिन इन्होंने अब तक जो कुछ भी किया है उससे पार्टी की स्थिति असहज ही हुई है

कुछ रौशनी और आए बिहार के उपमुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल और भाजपा सांसद सुशील मोदी पटना में 5 मार्च को एक कार्यक्रम के दौरान कुछ रौशनी और आए बिहार के उपमुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल और भाजपा सांसद सुशील मोदी पटना में 5 मार्च को एक कार्यक्रम के दौरान

अमिताभ श्रीवास्तव

बिहार विधानसभा की 243 सीटों के लिए नवंबर 2020 में हुए चुनावों में जब भारतीय जनता पार्टी ने 110 सीटों पर लड़कर 74 सीटें जीतीं जो कि राष्ट्रीय जनता दल के 75 (144 सीटों पर लड़कर) से एक कम और गठबंधन सहयोगी जनता दल (यूनाइटेड) की 43 (115 सीटों पर लड़कर) से कहीं आगे रही, तो इसने दो चीजें हासिल कीं: बिहार में राजद की प्रमुख विरोधी पार्टी बनी और जद (यू) के साथ गठबंधन में प्रमुख भागीदार भी बन गई.

सीटों का अंकगणित देखते हुए जद (यू) प्रमुख नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी से पीछे हट गए और भाजपा को अपना मुख्यमंत्री बनाने की पेशकश की. हालांकि, भाजपा नेतृत्व ने उन्हें आगे भी मुख्यमंत्री का दायित्व संभालने के लिए राजी कर लिया और अपना लक्ष्य इस चुनावी लाभ को बेहतर भुनाने का निर्धारित किया था.

भाजपा ने बिहार में अपनी नई पारी की शुरुआत सबसे पहले प्रदेश के अपने शीर्ष नेता सुशील कुमार मोदी को बदलने के साथ की जो पिछली सरकार में उपमुख्यमंत्री थे. मोदी को राज्यसभा भेज दिया गया. दो अन्य दिग्गजों, नंद किशोर यादव और प्रेम कुमार जो क्रमश: सातवीं और आठवीं बार विधायक बने, को विधानसभा समितियों का चेयरमैन बनाकर उनके मंत्रिमंडल में आने की संभावना भी खत्म कर दी गई. संयोग से प्रेम कुमार भाजपा के सबसे बड़े ईबीसी (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) नेता और 2015 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के कुछ अघोषित मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में थे, हालांकि भाजपा वह चुनाव हार गई थी.

भाजपा की इस चाल को आखिर कैसे देखा जाए? शुरुआत में ऐसा लगा कि पार्टी अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को पीछे छोड़कर ज्यादा कट्टर रुख अपनाने का प्रयास कर रही है. पिछले कुछ वर्षों में यादव और प्रेम कुमार दोनों बिहार में भाजपा का उदार चेहरा बनकर उभरे. हालांकि पार्टी का एक धड़ा मानता है कि इन दोनों को इनके नीतीश से अच्छे संबंधों की वजह से ज्यादा तरजीह नहीं दी गई. एक भाजपा नेता का कहना है, ''शायद नेतृत्व एक लाइन पर चलने वाले नेताओं को आगे बढ़ाना चाहता है, ऐसे लोगों को नहीं जो कि गठबंधन के सहयोगी को चोट न पहुंचा सकें.''

भगवा पार्टी का गेमप्लान स्पष्ट है: बिहार में आत्मनिर्भर बनना. इसलिए, मोदी की जगह कलवार बनिया जाति से आने वाले तारकिशोर प्रसाद ने ले ली. रेणु देवी, जो प्रभावशाली नोनिया ईबीसी का प्रतिनिधित्व करती हैं, को दूसरा उप मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया. एक भूमिहार ब्राह्मण विजय कुमार सिन्हा, जिन्हें स्पीकर नियुक्त किया गया था, ने तीसरी महत्वपूर्ण धुरी बनाई. एक साथ, तीनों 18-20 प्रतिशत जातीय वोटों का प्रतिनिधित्व करते हैं. इसके अलावा भी कई नए नेताओं को उनकी जाति के आधार पर मंत्री बनाया गया.

नए नेताओं की नियुक्ति के पीछे पार्टी की मंशा अपना आधार बढ़ाना और राज्य में भगवा पार्टी का भविष्य गढ़ना था. लेकिन यह कहना आसान और करना कठिन है क्योंकि बिहार में 1990 से समाजवादी सरकारें चुनी जा रही थीं और भाजपा के नए नेता न केवल संषर्ष करते दिख रहे हैं बल्कि वे एक दूसरे के खिलाफ भी काम कर रहे हैं. मिसाल के तौर पर, 15 मार्च को जब तेजस्वी यादव ने गन्ना मंत्री प्रमोद कुमार से कहा, ''कैसे मंत्री आपको बना दिया, जवाब आता नहीं है!'' तारकिशोर प्रसाद ने इस मुद्दे पर न केवल राजद नेता से आपत्ति दर्ज कराई बल्कि स्पीकर सिन्हा पर भी नेता प्रतिपक्ष की तरफदारी का आरोप लगाया. प्रसाद के तेवर पूर्ववर्ती सुशील मोदी की तर्कशीलता और संयम के एकदम विपरीत थे.

सिन्हा के लिए 17 मार्च को फिर से, पार्टी के एक अन्य सदस्य के कारण असहज स्थिति पैदा हो गई. बिहार के पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी ने उन्हें शांत रहने को कह दिया, ''बहुत व्याकुल नहीं होना है.'' सम्राट की प्रतिक्रिया बिहार विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान आई जब सिन्हा ने उन्हें विधानसभा में सवालों के ऑनलाइन उत्तर प्रस्तुत करने में अपने विभाग की विफलता के लिए बहुत नम्रता के साथ झिड़का था. इससे सिन्हा स्पष्ट रूप से खफा दिख रहे थे और उन्होंने सम्राट से अपने शब्द को वापस लेने के लिए कहा, लेकिन सम्राट ने न केवल अपने शब्द दोहराए बल्कि पलटकर सिन्हा को ही जवाब दे दिया, ''इस तरह नहीं चलेगा. आप ऐसे निर्देश नहीं दे सकते.''

राबड़ी देवी कैबिनेट में मंत्री रहे शकुनि चौधरी के पुत्र, सम्राट को कोइरी जाति के उभरते नेता के रूप में देखा जाता है. परंपरागत रूप से नीतीश का समर्थन करने वाली राज्य की छह प्रतिशत कुशवाहा जाति के साथ संतुलन बनाने के लिए भाजपा के लिए कोइरी वोटों को साधना बहुत जरूरी है.

बाद में सत्र दोबारा शुरू होने पर सम्राट ने माफी मांगी लेकिन तब तक काफी किरकिरी हो चुकी थी. माफी मांगने के कुछ समय पहले, जद (यू) के वरिष्ठ नेता और संसदीय मामलों के मंत्री विजय कुमार चौधरी ने इस प्रकरण पर सरकार की तरफ से खेद व्यक्त किया. कुछ लोगों का आरोप है कि सम्राट ने एक अन्य शक्तिशाली भाजपा नेता के उकसाने पर अध्यक्ष को अपमानित किया था.

भाजपा के एक अन्य नेता, राजस्व और भूमि सुधार मंत्री राम सूरत राय, राज्य में पार्टी के लिए अलग मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं. नीतीश ने पिछले कार्यकाल में ही शराबबंदी की नीति लागू की थी लेकिन नवंबर 2020 में, पुलिस ने मुजफ्फरपुर के एक स्कूल से शराब जब्त की थी जो राय के भाई की जमीन पर चल रहा था. हालांकि राय ने कहा कि वे भाई से अलग हो चुके हैं और स्कूल को किसी व्यक्ति को पट्टे पर दिया गया था जिसे पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है. लेकिन तेजस्वी ने दबाव बनाकर सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा की. यादव जाति के राय ने कहा कि अगर उन पर दोष सिद्ध होता है तो वे इस्तीफा देकर राजनीति ही छोड़ देंगे लेकिन तेजस्वी को उनकी धमकी ''गांधी मैदान में फरिया लेंगे'' ने पार्टी की छवि को नुक्सान पहुंचाया है.

पटना विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष नवल किशोर चौधरी कहते हैं, ''लगता है कि भाजपा बिहार में अपनी रणनीति में पूरी तरह मात खा गई है और बिहार ने इसे जो अवसर दिया है, उसे गंभीरता से नहीं ले रही है. दायित्वों के लिए व्यक्तियों का भाजपा का चयन भी बहुत अच्छा नहीं रहा. मैं इनमें से किसी भी नेता में बहुत अधिक संभावना नहीं देखता. लोगों को सिर्फ इस वजह से चुनना कि वे अमुक जाति के हैं और वे पिछले कुछ चुनाव जीते हैं, कोई अच्छी रणनीति नहीं कही जा सकती है.''

पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष रघुनंदन शर्मा कहते हैं, ''भाजपा ने सुशील मोदी को हटाकर भारी जोखिम उठाया है. वे प्रशासन में दक्ष और सक्षम उप मुख्यमंत्री थे. लेकिन मोदी को नीतीश का काफी करीबी माना जाता था, लिहाजा वे पार्टी की विस्तार की योजनाओं के नेतृत्व लायक नहीं समझे गए. दुर्भाग्य से पार्टी के नए नेता भी निराश कर रहे हैं.''

प्रोफेसर चौधरी सहमति जताते हुए कहते हैं, ''नए डिप्टी सीएम तारकिशोर और राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री राम सूरत राय बहुत आक्रामक हो सकते हैं, लेकिन उन्हें अभी भी खुद को संगठन और सत्ता के कुशल व्यक्ति के रूप में साबित करना बाकी है.'' भाजपा का नया नेतृत्व प्रतिभाशाली कम और कामचलाऊ अधिक है.

शिक्षाविदों को लगता है कि पार्टी को बिहार में अपनी जमीन मजबूत करने के लिए नित्यानंद राय जैसे नेताओं को आगे बढ़ाना चाहिए. राय केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के भरोसेमंद आदमी और बिहार में भाजपा का भविष्य हैं. बिहार में भाजपा के शानदार लोकसभा प्रदर्शन का श्रेय उन्हें दिया जाता है. 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा वे सभी 17 सीटें जीती जिस पर उसने चुनाव लड़ा और राय ही तब प्रदेश अध्यक्ष थे. वे प्रमुख यादव नेता हैं और उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनके ही समाज के लोगों ने तेजस्वी यादव को अपना नेता मान लिया है.

बहरहाल, भाजपा को लंबे समय के लिहाज से राज्य में प्रमोट किए गए नेताओं के प्रदर्शन पर लगातार नजर रखते हुए आवश्यक बदलाव करने होंगे. सरकार की छवि के साथ भाजपा की छवि ज्यादा गहराई से जुड़ी जुड़ी हुई है क्योंकि वह गठबंधन की वरिष्ठ साझीदार है.

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