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पैसा जुटाने की जुगत

विकास वित्त संस्थाओं को भी दीर्घकालिक परियोजनाओं के लिए पैसा जुटाने में मुश्किल आएगी, ऐसे में धन देने या कर्ज के बदले गारंटी देने का जिम्मा सरकार पर ही आएगा

इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस

खास तौर पर दीर्घकालिक बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर)परियोजनाओं में पैसा लगाने के लिए एक विकास वित्त संस्था (डीएफआइ) जल्द ही हकीकत बन सकती है. जुलाई के आखिर में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को यह कहते उद्धृत किया गया था कि ''विकास वित्त संस्थान (की स्थापना) पर काम चल रहा है. यह किस शक्ल में उभरकर आता है, जल्दी ही हमें पता चल जाएगा.'' सूत्रों का कहना है कि दीर्घकालिक वित्तपोषण का अध्ययन करने के लिए केंद्र ने विशेषज्ञों की जो समिति बनाई थी और जिसको ऐसी संस्थाओं के ढांचे और उनके जरिए धन के जरूरी प्रवाह पर भी सिफारिशें देनी थीं, उसने अपने सुझाव सरकार को दे दिए हैं. समिति की सिफारिशों पर वित्त मंत्रालय विचार कर रहा है. डीएफआइ के लिए 10 लाख करोड़ रुपए की बैलेंस शीट भी सिफारिशों में शामिल है.


डीएफआइ बनाने की योजना उस वक्त आई है जब सरकार ने बुनियादी ढांचे की बहुत-सी विशाल परियोजनाओं का मंसूबा बांधा हुआ है लेकिन कोविड-19 की महामारी और फिर लॉकडाउन के नतीजतन इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में इकट्ठा राजस्व को देखते हुए इन परियोजनाओं के लिए धन जुटाना उसके लिए बेहद मुश्किल होगा. इस तिमाही में राजस्व वसूली में 41.7 फीसद की गिरावट आई जबकि खर्च 11.3 फीसद बढ़ गया. पिछले साल दिसंबर में वित्त मंत्री ने 111 लाख करोड़ रुपए की बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं का ऐलान किया था, जिन्हें अगले पांच साल में जमीन पर उतारना है. यह बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाने के सरकार के मंसूबे का हिस्सा है.

ये परियोजनाएं केंद्र और राज्यों के पिछले छह साल में खर्च कर 51 लाख करोड़ रुपयों के अलावा हैं. नई परियोजनाओं पर केंद्र और राज्य दोनों 39-39 फीसद रकम लगाएंगे. बाकी 22 फीसद का जिम्मा निजी क्षेत्र उठाएगा. ये परियोजनाएं बिजली, रेलवे, शहरी सिंचाई, यातायात, शिक्षा और स्वास्थ्य समेत कई क्षेत्रों में फैली हैं. अप्रैल में सरकार ने अगले दो साल में 15 लाख करोड़ रु. की सड़कें बनाने का लक्ष्य भी तय किया है.


अपना नाम उजागर न करने के इच्छुक एक विशेषज्ञ कहते हैं, ''बुनियादी ढांचे के लिए डीएफआइ अकेला संभावित और व्यावहारिक उपाय है जो मौजूदा हालात में किया जा सकता है. जब घरेलू और विदेशी दोनों निजी निवेशक ग्रीनफील्ड परियोजनाओं में निवेश के कतई इच्छुक नहीं हैं और जहां नकदी के मामले में केंद्र और राज्य सरकारों के हाथ तंग हैं, ऐसे में अकेला व्यावहारिक समाधान यही है कि संसद के कानून के जरिए डीएफआइ की स्थापना की जाए.''


हालांकि ऐसी एक संस्था के स्वामित्व के ढांचे को लेकर राय बंटी हुई है. कुछ का कहना है कि डीएफआइ की कम से कम 51 फीसद मिल्कियत निजी हाथों में होनी चाहिए ताकि यह नियंत्रक और लेखा महापरीक्षक के नियम-कायदों के दायरे में न आए. इस एजेंसी के लेखा परीक्षणों के नतीजतन धन मिलने में देरी हो सकती है जिससे परियोजनाएं लटक सकती हैं. दूसरे इससे बिल्कुल उलटी बात कहते हैं कि इस पर शत-प्रतिशत स्वामित्व सरकार का ही होना चाहिए. ऊपर जिस विशेषज्ञ का जिक्र है, वे कहते हैं, ''डीएफआइ के कंधों पर बेहद अहम काम है, वह राष्ट्र निर्माण की गतिविधि के लिए जिम्मेदार है और इसका नजरिया रिटर्न की किफायती दर पर आधारित होना चाहिए. जबकि अगर इसका स्वामित्व निजी क्षेत्र के हाथों में होगा, तो यह रिटर्न की वित्तीय दर पर ध्यान देगा.''


बुनियादी ढांचे के विकास में भारत को अभी लंबी दूरी तय करनी है, चाहे वह बिजली, पुल, बांध, सड़क या शहरी बुनियादी ढांचा हो. विश्व बैंक के लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस सूचकांक 2018 में भारत 164 देशों की फेहरिस्त में 44वें पायदान पर रहा है. एक बड़ी दिक्कत ऐसी परियोजनाओं के लिए धन की कमी है. मगर बैंक और गैर-बैंकिंग संस्थाएं बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं के लिए कर्ज देने को अनिच्छुक हैं क्योंकि उन्हें परिसंपत्ति देनदारी प्रबंधन (एएलएम) में असंतुलन सरीखे मुद्दों से जूझना पड़ता है. लब्बोलुबाब यह कि दिक्कत इसलिए पैदा होती है क्योंकि कर्जदाता खुद रकम उधार लेते हैं और फिर उसे कर्ज पर चढ़ाते हैं; हालांकि उनकी उधारियां आम तौर पर छोटे यानी पांच साल से कम वक्त के लिए होती हैं. अगर वे किसी ऐसी परियोजना को कर्ज देते हैं जो 15-20 साल में परवान चढ़ती है, तो उनकी परिसंपत्तियों (वह कर्ज जो उन्होंने दिया है) की परिपक्वता अवधि और उनकी देनदारियों (वह रकम जो उन्होंने कर्ज देने के लिए उधार ली है) के बीच असंतुलन पैदा हो जाता है.


मुंबई के एसपी जैन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट ऐंड रिसर्च के एसोसिएट प्रोफेसर हेमंत मनुज ने एक लेख में कहा है, ''एक आम कर्जदाता के लिए औसत परिपवक्तता (उधारियों की) करीब दो साल होगी. वजह मुख्य तौर पर यह है कि डीप बॉन्ड मार्केट मौजूद नहीं है जहां से उधार लिया जा सके. बीमा कंपनियों और पेंशन फंड के अलावा दूसरी वित्तीय संस्थाओं (भारत में) को लंबे वक्त के फंड हासिल नहीं हैं. सो, वे दो साल की परिपक्वता वाले फंड से, फर्ज कीजिए, 20 साल की परिपक्वता वाली परियोजनाओं को कर्ज देते हैं...दो साल बाद जब मौजूदा देनदारी परिपक्वता हो जाती है, तब उन्हें नए सिरे से धन जुटाना होता है क्योंकि परिसंपत्ति अभी परिपक्व नहीं हुई है. लिहाजा कर्जदाता ऐसे एक मामले में अपनी देनदारियों पर फिर से पैसा लगाने का जोखिम उठाता है.'' वे लिखते हैं कि भारत में डीएफआइ को भी लंबी तैयारी वाली परियोजनाओं के लिए धन जुटाने में मुश्किलें पेश आएंगी क्योंकि भारत में लंबे वक्त का बॉन्ड मार्केट मौजूद नहीं है.


भारत में पहला डीएफआइ भारतीय औद्योगिक वित्त निगम था, जिसकी स्थापना 1948 में हुई थी. बाद के सालों में स्थापित कुछ दूसरों का नाम लें, तो उनमें भारतीय औद्योगिक विकास बैंक, यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया, राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक, एक्जिम बैंक, भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक और राष्ट्रीय आवास बैंक शामिल हैं. लेकिन इनमें से कुछ वक्त के साथ बैंक में बदल गए.

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