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यह आदमी अब तक आजाद कैसे ?

पूर्व मंत्री और लगातार तीसरी बार विधायक बाबूलाल नागर पर बलात्कार के संगीन आरोप के बाद भी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार नहीं किया, उलटे पीड़िता ही कठघरे में

जयपुर में पिछले महीने 13 सितंबर को 35 वर्षीया एक बीमा एजेंट ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि डेयरी, खादी और ग्रामोद्योग राज्यमंत्री बाबूलाल नागर ने जयपुर में 18-ए, सिविल लाइंस के अपने सरकारी निवास पर दो दिन पहले उसके साथ छेड़छाड़ की और बलात्कार करने की कोशिश की. इस तरह की शिकायत पर प्रथम दृष्ट्या सबूत मिलने पर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया जाता है, लेकिन 18 सितंबर को पीड़िता की ओर से अपराध की जगह का सत्यापन करने और घटना का क्रमवार ब्यौरा देने के बाद भी नागर खुले घूम रहे हैं. हालांकि 19 सितंबर को उन्हें मंत्री पद से हटा दिया गया. माना जा रहा है कि राजस्थान कांग्रेस के महासचिव गुरुदास कामत नहीं चाहते थे कि 21 और 22 सितंबर को जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी वहां आएं तो यह मामला सुर्खियों में बना रहे. नागर की सदस्यता रद्द करने में पार्टी को 10 दिन और लग गए.
बहरहाल, मंत्री पद गंवाने से नागर की ताकत और उनके रुतबे में कोई कमी नहीं आई है. वे इस वक्त दूदू से तीसरी बार विधायक हैं. पीड़िता को पूछताछ के लिए न सिर्फ नागर की मौजूदगी में उनके घर ले जाया गया, बल्कि 28 सितंबर को उनकी मेडिकल जांच के दौरान जयपुर के एसएमएस अस्पताल के प्रोटोकॉल अधिकारी ने गर्मजोशी से पूर्व मंत्री का स्वागत भी किया. यह मेडिकल जांच कोर्ट के आदेश पर एफआइआर दर्ज होने के 11 दिन बाद की गई थी. 8 अक्तूबर को नागर को तीन दिन की तीर्थयात्रा और पुष्कर की यात्रा करने की भी खुली छूट दे दी गई. कहा जाता है कि मामले की जांच करने वाले अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक वी.के. गौड़ नागर के कहने पर नियुक्त किए गए हैं. पुलिस जांच में शिकायत करने वाली महिला के पहले के चाल-चलन और उसके दावे की सचाई पर जोर दिया जा रहा है. 'कानून अपना काम करेगा’ की रट लगाने वाले राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 21 सितंबर को मामला सीबीआइ को सौंप दिया और अंतत: 8 अक्तूबर को सीबीआइ ने मामले को अपने हाथ में ले लिया.
जयपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने अपनी शिकायत दर्ज कराते हुए पीड़िता ने कहा कि वह अपने पति को एक डेयरी बूथ दिलाने के लिए सबसे पहले 2010 में नागर से मिली थी और उसके बाद तीन महीने पहले अपने एक रिश्तेदार के बच्चे को जयपुर के एक स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए उनसे मिली थी. पीडि़ता मूल रूप से उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले की रहने वाली है, लेकिन पिछले दस साल से जयपुर में रह रही है. उधर, नागर का कहना है कि वह पहली बार पंचायत चुनाव में टिकट मांगने के लिए उनसे मिली थी. पीड़िता ने बताया कि नागर ने 11 सितंबर को उसे रिश्तेदार के बच्चे के दाखिले के बारे में सूचना देने के बहाने अपने घर बुलाया. फिर उन्होंने अपने शयनकक्ष में उसके साथ बलात्कार करने की कोशिश की. नागर इससे इनकार करते हैं. उनका कहना है कि उस समय उनके निवास पर करीब सौ लोग मौजूद थे, जिनमें उनका बेटा, बहू और बेटी भी शामिल थे. विधायक का यह भी दावा है कि शिकायत करने वाली महिला के साथ उनका अंतरंग रिश्ता था. वे कहते हैं, ''हम अपने घर की बजाए एक दूसरी जगह पर मिलते रहते थे.” दशक भर पहले सार्वजनिक रूप से उन पर व्यभिचार और प्रताडऩा का आरोप लगाने वालीं और फिर नागर की दूसरी पत्नी बनी सुनीता अब उनके साथ हैं. शिकायत करने वाली महिला पर वे ब्लैकमेल करने का आरोप लगा रही हैं.

पीड़िता से पूछताछ करती पुलिस

पुलिस ने 53 वर्षीय नागर से एक बार भी पूछताछ नहीं की है, जबकि उस महिला, उसके किशोर उम्र के बेटे और दो भाइयों से पुलिस मुख्यालय और जयपुर के उनके घर में कम-से-कम 24 बार पूछताछ की जा चुकी है. धारा 164 के तहत बयान दर्ज कराने के बाद बार-बार पूछताछ की जरूरत नहीं होती है. क्राइम ब्रांच उसके बयान में अंतर्विरोध का पता लगाने और उसके अतीत की छानबीन करने में लगी थी. मार्च 2006 में महिला को अपनी दोस्त सोनू तंवर गोयल की हत्या के आरोप में भाई संजय और प्रेमी श्याम लाल के साथ गिरफ्तार किया गया था. आरोप है कि सोनू ने संजय के साथ अपनी बहन की शादी का विरोध किया था. जनवरी 2012 में इसी महिला ने अर्जुन यादव नाम के एक आदमी पर उसे नशीली दवा खिलाकर कई बार बलात्कार करने का आरोप लगाया था. उसकी शिकायत थी कि यादव ने उसके साथ बलात्कार इसलिए किया क्योंकि उसने उसके कहने पर एक मंत्री को ब्लैकमेल करने से मना कर दिया था. सितंबर 2012 में वह अपनी शिकायत से पलट गई, लेकिन एक महीने बाद उसने यादव के खिलाफ बलात्कार की कोशिश का आरोप लगाया. नागर और पुलिस इस घटना और उसके बार-बार बयान बदलने की आदत को अपना आधार बना रहे हैं. वे कहते हैं कि उनके राजनैतिक विरोधियों के संरक्षण में स्थानीय माफिया के इशारे पर ही उनके खिलाफ यह आरोप लगाया गया है. इस माफिया को वे कोबरा गैंग कहते हैं. उनके मुताबिक, ''इस मामले में आ रहे एक मंत्री के जिक्र की पड़ताल की जानी चाहिए, ताकि यह साबित किया जा सके कि मुझे साजिश के तहत फंसाया गया था.”
वे अनुसूचित जाति के ताकतवर नेता हैं, जो नीचे से उठकर कांग्रेस में ऊंचे दर्जे तक पहुंचे हैं. पहले वे नेशनल स्टुडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआइ) के कार्यकर्ता थे और बाद में सेवा दल के राज्य प्रमुख बने. अपने क्षेत्र में पोपस्या (वाइपर सांप का स्थानीय नाम)के नाम से मशहूर नागर को फरवरी 2009 में गहलोत ने मंत्री बनाया और उन्हें खाद्य और नागरिक आपूर्ति का महत्वपूर्ण मंत्रालय दिया गया. उस कार्यकाल में उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे, जिसके लिए उन्होंने अपने राजनैतिक विरोधियों को जिम्मेदार ठहराया. पार्टी आलाकमान उन्हें हटाना चाहता था, लेकिन गहलोत ने सिर्फ उनका मंत्रालय बदलकर उन्हें खादी, डेयरी और ग्रामोद्योग मंत्री बना दिया. गहलोत कई वर्षों से उन पर मेहरबान थे. माना जा रहा है कि पुलिस उनकी गिरफ्तारी में देरी इसलिए कर रही थी ताकि उन्हें अपने बचाव के लिए पर्याप्त समय मिल सके.
उन्हें गिरफ्तार न करने के पुलिस के कदम का बचाव करते हुए नागर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हैं. इस फैसले में जस्टिस बी.एस. चौहान और दीपक मिश्र की दो सदस्यीय पीठ ने 28 मई, 2013 को करण सिंह बनाम हरियाणा सरकार के एक मामले में अहम फैसला सुनाया था, ''जांच अधिकारी को आरोपी के साथ न्याय करते हुए उसे झूठे आरोप में फंसाना या परेशान नहीं करना चाहिए.” पर उन्होंने फैसले के उस हिस्से का जिक्र नहीं किया, जिसमें यही पैमाना शिकायत करने वाले पर भी लागू करने की बात कही गई है.
राजस्थान बीजेपी प्रमुख वसुंधरा राजे आरोपी नागर और भंवरी देवी हत्या के मामले में गहलोत की कार्रवाई को लेकर विरोधाभास का जिक्र करती हैं. भंवरी देवी की हत्या के मामले में पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री के विरोधी शामिल थे. पेशे से नर्स भंवरी देवी के संबंध विधायक मलखान सिंह विश्नोई और तत्कालीन कैबिनेट मंत्री महिपाल सिंह मदेरणा से बताए जाते थे. उसकी हत्या 1 सितंबर, 2011 को हो गई थी. सीबीआइ जांच के बाद विश्नोई और मदेरणा को जेल हो गई. राजे पूछती हैं, ''नागर क्यों बाहर हैं? उन्हें जेल क्यों नहीं हुई?”
जयपुर के अतिरिक्त चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) ने 3 अक्तूबर को आश्चर्य जताया कि पुलिस जांच के इस चरण में शिकायत करने वाली महिला के बयान की छानबीन में क्यों लगी है? महिला संगठन, सामाजिक कार्यकर्ता और रिटायर्ड पुलिसकर्मी नागर की गिरफ्तारी में देरी किए जाने को लेकर चिंता जाहिर कर रहे हैं. उनका मानना है कि इस देरी से आरोपी पीड़ित महिला पर अपने बयान से पलटने का दबाव डाल सकता है. राजस्थान के पूर्व डीजीपी पी.के. तिवारी कहते हैं, ''इस मामले में कुछ पुलिस अधिकारियों और डॉक्टरों के खिलाफ मामला दर्ज किया जाना चाहिए.” राजस्थान राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष लाड कुमारी जैन कहती हैं, ''मजिस्ट्रेट के सामने पीड़िता के बयान के बाद पुलिस को अदालत की भूमिका निभाने की बजाए आरोपी को गिरफ्तार करना चाहिए.”
शिकायतकर्ता महिला ने जयपुर के एसीजेएम कोर्ट और राजस्थान हाइकोर्ट की ओर से जांच की न्यायिक निगरानी किए जाने की याचिका दी है. उसका आरोप है कि पुलिस अपनी जांच में पक्षपात कर सकती है. इस याचिका पर अक्तूबर के मध्य में सुनवाई होगी. ठीक चुनाव से पहले इस मामले के सामने आने से यह एक महिला के साथ अत्याचार या सत्ता के दुरुपयोग से ज्यादा चुनाव की हार-जीत का मुद्दा बन गया है. गहलोत लंबे-चौड़े प्रचार अभियान से अपनी छवि को चमकाने और पहले जैसा बनाए रखने के लिए छटपटा रहे हैं, ऐसे में उनके प्रियपात्रों पर इस तरह के गंभीर आरोप उनकी कोशिशों को गहरा धक्का पहुंचा सकते हैं. यह ऐसा सियासी नाजुक मौका है जहां उनके दागी मंत्री महिला के चरित्र की आड़ में या फिर उससे अपने पुराने रिश्तों का हवाला देकर कानून से बचने की कोशिश कर सकते हैं, क्योंकि कानून से कहीं पहले जनता की कचहरी में उन्हें और उनके सारे आकाओं को जाना है. जो भी हो, नागर पर वक्त भारी है और सलाखें उनका इंतजार कर रही हैं.    

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