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जुर्म बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की

एनसीआरबी की ताजातरीन रिपोर्ट इस हकीकत को उघाड़कर रख देती है कि भारत का सामाजिक-आर्थिक विकास सही रास्ते पर है.

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साल 2021 के लिए जारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) का सालाना सांख्यिकी लेखा-जोखा इस बात की याद दिलाता है कि भारत के कई सामाजिक-आर्थिक घटनाक्रम गलत पटरी पर बढ़ चले हैं. यह पहला साल था जब महामारी और लॉकडाउन के सिलसिलों के बाद देश सामान्य अवस्था की ओर लौटने लगा था.

कोरोना से पैदा जबरदस्त आर्थिक दुश्वारियों के बावजूद अपराध दर यानी प्रति 1,00,000 की आबादी पर दर्ज अपराधों में 2020 के मुकाबले गनीमत है कि थोड़ी कमी आई. मगर 2017 के मुकाबले बढ़ोतरी अच्छी-खासी है—389 के मुकाबले 2021 में 446. पुलिस की तरफ से आरोपपत्र दाखिल करने और अदालत में जुर्म साबित होने की दर निराशाजनक रूप से कम बनी हुई है, जो एक बार फिर पुलिस और न्यायिक सुधारों की जरूरत सामने लाती है.

जब यौन अपराधों समेत महिलाओं के खिलाफ अपराधों की बात आती है, तो जुर्म साबित होने की दर अपराधों के औसत से कम है. यह स्थिति उस ज्यादा कठोर कानून के बावजूद है जो 2012 में राष्ट्रीय राजधानी की चलती बस में 23 बरस की लड़की के साथ जघन्य सामूहिक बलात्कार-हत्या के बाद बना.

 

डिजिटल ईको-सिस्टम के फैलाव के साथ साइबर अपराधों की संख्या पांच साल में अंदेशे के अनुरूप ही दोगुनी हो गई, हालांकि जुर्म साबित होने की दर अब भी 50 फीसद से कम है. मगर रिपोर्ट का सबसे हैरतअंगेज आंकड़ा पुलिसकर्मियों के खिलाफ दर्ज मामलों और उनके दोष सिद्ध होने के बीच का फासला है.

2021 में 1,163 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामले दर्ज हुए, जो 2017 में दर्ज 549 मामलों से काफी ज्यादा थे. मगर केवल 15 के खिलाफ जुर्म साबित हुआ, जो 2017 के 128 से काफी कम था. अपराधों का चुस्त और असरदार ढंग से मुकाबला करने के लिए खाकी वर्दीधारी पुरुषों और महिलाओं को यह पक्का करना चाहिए कि ये दोनों आंकड़े जल्द से जल्द उलटें.

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