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छटपटाती गंगा

गंगा नदी राष्ट्रीय नदी घोषित होने के नौ साल बाद भी उपेक्षा की शिकार

मनीष अग्निनत्री मनीष अग्निनत्री

राष्ट्रीय नदी घोषित होने के नौ साल बाद भी सबका उद्धार करने वाली गंगा नदी की हालत सुधरने की बजाए बदतर होती जा रही है और इसकी तस्दीक करती है भारत के नियंत्रक व महालेखापरीक्षक (सीएजी) की ताजा रिपोर्ट. शुरुआत गंगोत्री से करते हैं. गंगोत्री धाम में सीवरेज सिस्टम और सीवेरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की 9.87 करोड़ रु. की योजना मार्च 2011 में बनी जिसे अप्रैल 2014 में पूरा हो जाना था लेकिन सीएजी ने पाया कि 5.51 करोड़ रु. खर्च हो जाने के बाद भी यह पूरी न हो सकी. नतीजा यह है कि इसी जगह से 0.75 एमएलडी सीवेज भागीरथी (गंगा) में समाने लगता है. प्रोजेक्ट मैनेजर की दलील है कि धाम के बंद होने और 2013 की आपदा के चलते रास्ता बंद होने के कारण देर हुई लेकिन सीएजी के मुताबिक, परियोजना स्वीकृति को छह साल और आपदा को चार साल हो चुके हैं इसलिए यह दलील गले नहीं उतरती. गंगोत्री के आगे गंगा और भी बदहाल होती जाती है.

गंगा बेसिन देश की 26 फीसदी जमीन पर फैला है और देश की 43 फीसदी आबादी इसके प्रभाव क्षेत्र में है. केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना नमामि गंगे की शुरुआत 2015 में हुई ताकि एकीकृत तरीके से गंगा को निर्मल बनाने का काम किया जा सके. लेकिन काम में रफ्तार फिर भी नहीं आई. सीएजी की रिपोर्ट में बताया गया कि अकेले मार्च 2017 में नमामि गंगे के तहत विभिन्न एजेंसियों के पास 2,600 करोड़ रु. से यादा की रकम बिना खर्च के पड़ी रही (देखें सूची). यह रकम साल दर साल बढ़ती गई और जब सीएजी ने पूछा तो नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी) ने अगस्त 2017 में जवाब दिया कि बची रकम का इस्तेमाल आने वाले सालों में किया गया और इसकी जानकारी उस साल धन की मांग करते वक्त जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय को भी दी गई.

लेकिन सीएजी ने इस जवाब को तर्कसंगत नहीं पाया और कहा कि हर साल खर्च न की गई रकम बढ़ती गई. सीएजी ने यह भी कहा कि एनएमसीजी को फंड रिलीज करते वक्त मंत्रालय ने पिछले साल की रकम पर कोई विचार ही नहीं किया. बची राशि खर्च न करने में राज्यों की सुस्ती भी जिम्मेदार रही. सीएजी ने साफ कहा कि इस लचर रवैए की वजह से नमामि गंगे प्रोग्राम के तहत तमाम कार्य नहीं हो सके.

सीएजी के मुताबिक, एनएमजीसी ने प्रिंट मीडिया को विज्ञापन देने के मामले में भी सरकारी नीति के विपरीत जाकर एक विज्ञापन एजेंसी की सेवाए ले लीं. 

गंगा का प्रदूषण घटाने, जीर्णोद्धार और संरक्षण के लिए सरकार ने गंगा रिवर बेसिन के तहत 11 राज्यों को अधिसूचित किया जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल शमिल हैं. इसमें वे राज्य भी शामिल हैं जिनसे निकलने वाली नदियां गंगा में मिलती हैं.

सीएजी ने पाया कि 2014-15 से 2016-17 तक 154 डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट्स (डीपीआर) में से 71 को ही मंजूरी मिली और इनमें से भी 70 डीपीआर को एक महीने से लेकर साढ़े तीन साल की देरी के बाद मंजूरी मिली. बाकी बची 83 डीपीआर में से 54 तो एनएमसीजी के स्तर पर ही चार महीने से लेकर दो साल से ज्यादा की अवधि से लंबित पड़ी हैं. गंगा का पानी खतरनाक तरीके से प्रदूषित हुआ है. शुरू से अंत तक गंगा में गंदा पानी मिलता जाता है. सीएजी के मुताबिक, गंगा का पानी उत्तराखंड में ऋषिकेश से हरिद्वार तक ही नहाने लायक है. कानपुर, इलाहाबाद, बनारस और पटना जैसे शहरों में ये नहाने लायक भी नहीं है. इन शहरों में नालों और उद्योगों का जहरीला पानी लगातार गंगा में मिल रहा है. सीएजी की रिपोर्ट में गंगा को साफ करने के नाम पर हो रही हीलाहवाली पर करारा प्रहार किया गया है.

देखना है, सरकार इस पर कितनी तत्परता दिखाती है और कौन भगीरथ इस गंगा को साफ करने का बीड़ा उठाता है.

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