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गुजरात में राहुल की राह नहीं आसान

कांग्रेस अगर ऊपर गिनाए गए मुद्दों में से कुछ का समाधान कर भी लेती है, तब भी शहरी और उपनगरीय क्षेत्रों की सौ सीटों पर भाजपा का दबदबा कैसे खत्म करेगी? उसके लिए चिंता का विषय है.

मकसद एक  राहुल गांधी के साथ अशोक गहलोत और अल्पेश ठाकोर (उनके बाएं ) तथा भरत सिंह सोलंकी (दाएं) 23 अक्तू मकसद एक राहुल गांधी के साथ अशोक गहलोत और अल्पेश ठाकोर (उनके बाएं ) तथा भरत सिंह सोलंकी (दाएं) 23 अक्तू

अहमदाबाद के संपन्न पालडी इलाके में पार्टी कार्यकर्ता और स्वयंसेवक गुजरात प्रदेश कांग्रेस के दफ्तर की तरफ जमा हैं. पिछले तीन साल में पहली बार कांग्रेस मान रही है कि 9 दिसंबर को जब मतदान की शुरुआत होगी, तब भाजपा को हराने का एक बेहतरीन मौका उसके सामने है. राहुल गांधी की सभाओं में भारी भीड़ उमड़ रही है. उसके आत्मविश्वास की एक और वजह उथलपुथल मचाने वाले तीन युवा नेताओं—हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी—का चुनावों पर पडऩे वाला संभावित असर है. इन तीनों युवाओं का अपनी-अपनी जातियों में अच्छा-खासा असर है और तीनों ही भाजपा के खिलाफ हैं.

क्या भाजपा उस राज्य में मुश्किल में है जिस पर बीच का एक छोटा-सा दौर छोड़ दें तो 1995 से ही उसका कब्जा रहा है? इंडिया टुडे समूह के कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई दलील देते हैं कि ''केवल नाराजगी ही गुजरात में भाजपा को सत्ता से बेदखल कर सकती है और फिलहाल नाराजगी की बजाएं वहां नाखुशी ज्यादा है." बीते 35 साल से राज्य के चुनावों को देखते आ रहे दिग्गज गुजराती पत्रकार कांति पटेल इस बात को और भी ज्यादा मजबूती से खारिज कर देते हैं. वे कहते हैं, ''भाजपा के खिलाफ सत्ता-विरोधी भावना हो सकती है, पर जब नरेंद्र मोदी पार्टी का चेहरा हैं तो वह आसानी से जीत जाएगी. पार्टी को केवल एक ही चीज से अपने को बचाना है और वह है उसका दंभ जो साफ जाहिर है." कांग्रेस की जीत में अड़चनें अच्छी-खासी हैं.

टिकटों का खराब बंटवारा

गुजरात विधानसभा के पिछले तीन चुनावों में कांग्रेस टिकट वितरण इतनी खामियों से भरा था कि वह उन लोगों को भी अपने साथ नहीं रख पाई जिन्हें टिकट नहीं दिया था. 2007 और 2012 के दोनों चुनावों में जिन लोगों को टिकट नहीं मिले, उन्होंने इसका जवाब पार्टी मुख्यालय पर हंगामे और हिंसा से दिया था. भीतरी जानकारों का अनुमान है कि पिछले चुनावों में टिकट बंटवारे में की गई गलतियों का खमियाजा कांग्रेस को कम से कम 40 सीटों से चुकाना पड़ा था.

राष्ट्रीय महासचिव अशोक गहलोत और उनके दो सहायकों—भरत सिंह सोलंकी और शक्ति सिंह गोहिल—के रहते इस बार टिकट बंटवारे में ज्यादा पारदर्शिता की उम्मीद की जा रही है. मगर पार्टी के हाथ बंधे हुए हैं. पूर्व कांग्रेस नेता शंकर सिंह वाघेला की अगुआई में हुए विद्रोह में उसने अपने 13 विधायक भाजपा के हाथों गंवा दिए थे. ऐसे में उसे अपने 44 मौजूदा विधायकों को टिकट देने ही होंगे.

गुजरात कांग्रेस के महासचिव निशीथ व्यास स्वीकार करते हैं कि ''एहतियात बरतना होगा कि टिकट से वंचित नाराज लोग नकारात्मक प्रतिक्रिया न करें." अगर यह सच भी हो तो कहना जितना आसान है उतना करना नहीं, क्योंकि जैसा कि कांग्रेस के एक नेता मानते हैं कि ''इस चुनाव में ग्रामीण इलाकों की तकरीबन हरेक सीट के लिए 15 से 20 दावेदार हैं."

ठाकोर, पटेल और मेवाणी के साथ पेश आना भी आसान नहीं होगा. खासकर तब जब तीनों ही टिकटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस नेतृत्व के साथ सौदेबाजी कर रहे हैं. इनमें ठाकोर खास तौर पर अडिय़ल बताए जाते हैं. भीतरी जानकारों का दावा है कि पटेल ने 15-20 टिकटों की मांग की है. जहां मेवाणी सबसे ज्यादा नरम और सीधे हैं, वहीं यह तिकड़ी कुल मिलाकर कम से कम 40 सीटें अपने लिए चाहती है.

हार्दिक और अल्पेश का सवाल

कागजों पर तो पटेल, ठाकोर और मेवाणी का कांग्रेस के खेमे में होना लुभावना नजर आता है, पर वहीं हकीकत में तीनों के हितों मे टकराव है. मिसाल के लिए, उत्तर और दक्षिण गुजरात में, और सौराष्ट्र के कुछ अहम जिलों में भी ठाकोर और कांग्रेस का ओबीसी क्षत्रिय समुदाय में तगड़ा असर है. मगर गांवों में पटेलों का पारंपरिक तौर पर ओबीसी क्षत्रियों के साथ टकराव है. पहले ये दो समुदाय एक साथ आए भी हैं, तो केवल तभी जब भाजपा ने उन्हें मना लिया था कि उनके हित हिंदू एकजुटता के जरिए ही सबसे अच्छे तरीके से पूरे हो सकते हैं.

उनकी एक दूसरे से होड़ करती मांगों को कांग्रेस कैसे संभालेगी? ग्रामीण गुजरात के बड़े हिस्सों में तमाम ओबीसी जातियां न केवल ओबीसी क्षत्रियों बल्कि पटेलों के भी खिलाफ हैं. पार्टी के कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिन इलाकों में हार्दिक की मर्जी से चुने गए कांग्रेस के पटेल उम्मीदवारों को तगड़ा समर्थन हासिल है, वहां भाजपा पहले ही मतदाताओं को जाति के आधार पर बांटने का मंसूबा बना रही है.

पार्टी के गुजरात प्रभारी गहलोत, जिनकी अगुआई ने कांग्रेस के जाहिरा उभार में बेहद अहम भूमिका अदा की है, जोर देकर कहते हैं कि ''जाति और सांप्रदायिक आधारों पर ध्रुवीकरण की भाजपा की कोशिशें कामयाब नहीं होंगी क्योंकि तमाम मुद्दों पर भाजपा के खिलाफ नाराजगी ने लोगों को आपस में एकजुट कर दिया है." कांग्रेस में कई लोग दावा करते हैं कि सत्ता-विरोधी रुझान इस कदर मजबूत है कि वह जाति की दरारों को ढक सकता है. इसके बाद भी छोटे-बड़े 38 पटेल संगठन, हार्दिक के खिलाफ सामने आए हैं और उसे सियासी महत्वाकांक्षा से ग्रस्त खुदगर्ज नेता करार देते हैं. इनका आरोप है कि हार्दिक पटेल समाज को गुमराह कर रहे हैं तब जबकि भाजपा की राज्य सरकार ने उसकी ज्यादातर मांगें मान ली हैं.

हार्दिक की तरह ही ठाकोरों की बड़ी तादाद ने भी अल्पेश के समुदाय का नेता होने पर सवाल खड़े किए हैं. उनकी गुजरात ठाकोर सेना के पूर्व समर्थकों ने शिकायत की है कि अल्पेश ने कसम खाई थी कि वे सामाजिक कार्यकर्ता हैं और कभी सियासत में कदम नहीं रखेंगे. भाजपा उनकी विश्वासघात की भावना को तूल देने पर आमादा है. गुजरात भाजपा के प्रवक्ता भरत पांड्या जाहिरा तौर पर हार्दिक और अल्पेश के संदर्भ में कहते हैं, ''विशाल समुदायों पर पकड़ बनाए रखना उतना आसान नहीं होता जितना सियासी पंडितों को लगता है." भाजपा के ओबीसी क्षत्रिय चेहरे नातुजी ठाकोर ज्यादा दोटूक हैं. वे दावा करते हैं, ''अल्पेश की राजनैतिक ताकत को बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर आंका जा रहा है."

कांग्रेस का शहरी दुःस्वप्न

कांग्रेस अगर ऊपर गिनाए गए मुद्दों में से कुछ का समाधान कर भी लेती है, तब भी शहरी और उपनगरीय क्षेत्रों की सौ सीटों पर भाजपा का दबदबा कैसे खत्म करेगी? उसके लिए चिंता का विषय है. पिछले चुनाव में भाजपा ने यह दबदबा साबित किया था जब अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत और राजकोट सरीखे शहरों में तकरीबन हर सीट उसने जीती थी. बावजूद इसके उसे ग्रामीण उत्तर और मध्य गुजरात में भारी नुक्सान उठाना पड़ा था.

नगर निकायों के 2015 में हुए चुनावों में, हार्दिक पटेल के उभरने के बाद भी, भाजपा ने 31 जिला पंचायतों में से महज सात और 203 तालुका पंचायतों में से 56 जीती थीं, पर सातों नगर निगम जीतकर उसने शहरी इलाकों में अपना दबदबा बनाए रखा था. राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उसका एक ट्रैक रिकॉर्ड रहा है. मिसाल के लिए, नर्मदा बांध को इसकी पूरी ऊंचाई 138 मीटर तक बढ़ाने का प्रस्ताव मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले केंद्र में यूपीए की सरकार के मातहत एक दशक तक धूल खाता रहा था.

2012 में गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी ने सौराष्ट्र के कोई 5,000 गांवों को सूखे सरीखे हालात से निजात दिलाने के लिए सरदार सरोवर बांध में जमा किए नर्मदा के अतिरिक्त पानी को 115 बांधों में ले जाने की एक परियोजना का ऐलान किया था. बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने इस पर आगे काम किया और 2016 में सौराष्ट्र नर्मदा अवतरण सिंचाई (सौनी) योजना के पहले चरण का उद्घाटन किया. भाजपा मानती है कि परियोजना  ग्रामीण सौराष्ट्र में कांग्रेस का मुकाबला करने में मदद करेगी.

मोदी और हिंदुत्व

आखिर में, कांग्रेस सत्ता-विरोधी भावना का चाहे जितना ढिंढोरा पीटे, वह जानती है कि मोदी ने अपने गृह राज्य में तकरीबन मिथकीय दर्जा हासिल कर लिया है. इसे कुछ लोग ''गुजराती गौरव्य कहते हैं, उसका खासा हिस्सा नेता के तौर पर मोदी की छवि में निहित है. कांग्रेस के एक नेता ने माना कि तीन महीने में पार्टी ने जो बढ़त बनाई है वह मोदी की अपील के सामने ताश के पत्तों की तरह धराशायी हो जाएगी. इसी बात का हमें सबसे ज्यादा डर है.

हिंदुत्व की प्रयोगशाला के तौर पर जाने जाने वाले सूबे में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को हिंदुत्व कार्ड खेलने में कोई झिझक नहीं है. इसकी एक बेढंगी कोशिश पहले ही की जा चुकी है, जब कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य और सोनिया गांधी के भरोसेमंद अहमद पटेल को भरूच के एक अस्पताल में (जिसमें पटेल ट्रस्टी रहे थे) काम कर चुके एक संदिग्ध आतंकी के जरिए आइएसआइएस से जोडऩे की कोशिश की गई थी.

शाह का दूसरा तुरुप का पत्ता डी.जी. वंजारा हैं जो गुजरात पुलिस के पूर्व डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल और आतंक-विरोधी दस्ते के प्रमुख थे. उन्होंने कथित फर्जी मुठभेडों में की गई हत्याओं के आरोप में आठ साल जेल में बिताए हैं. इसने उन्हें कट्टर हिंदुओं के बीच हीरो बना दिया है. भाजपा मानती है कि वंजारा की लोकप्रियता कांग्रेस की जाति रणनीति की दमदार काट साबित हो सकती है.

जब तक मोदी सर्वेसर्वा हैं तब तक शाह की रणनीति और बूथ प्रबंधन की वजह से कांग्रेस के लिए गुजरात में अपने सपने को साकार करना आसान नहीं है.

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