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गोवाःनीतीगत अपंगता

बीमार मुख्यमंत्री तो राज्य की सबसे छोटी समस्या, दिक्कत बड़ी.

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मेदांता खदान परिसर में बेकार खड़े ट्रक मेदांता खदान परिसर में बेकार खड़े ट्रक

फरवरी में जब से मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर के अग्नाशय के कैंसर का इलाज शुरू हुआ है, तब से गोवा में सरकारी निर्णय प्रक्रिया के ठप पड़ जाने से आर्थिक और राजनैतिक गतिविधियां भी रुक गई हैं. पर्रीकर के जिम्मे के मंत्रालय-गृह, वित्त, उद्योग और शिक्षा तो इससे बुरी तरह प्रभावित हैं.

संकट की गंभीरता हाल में तब सार्वजनिक हो गई, जब राज्य निवेश प्रोत्साहन बोर्ड (आइपीबी) ने 17 अक्तूबर को  की गई अपनी घोषणा वापस ले ली कि उद्योग और होटल से संबंधित 200 करोड़ रुपये के आठ प्रस्तावों को मंजूरी दे दी गई है. उसने दावा किया था कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिग के जरिये आइपीबी चेयरमैन पर्रीकर के नेतृत्व में बैठक में मंजूरी दी गई थी. इस पर विपक्षी कांग्रेस ने पूछा कि सरकार ने कौन-से कागजात पर हस्ताक्षर किए हैं, तो सरकार ने कहा कि अभी केवल प्रस्तावों पर विचार-विमर्श हुआ है.

राज्य की अर्थव्यवस्था में साफ गिरावट दिख रही है-जीएसटी और उत्पाद शुक्ल का संग्रह 20 फीसदी गिर गया है. वित्त मंत्रालय ने सभी विभागों के बजट में 25 फीसदी की कटौती की है, क्योंकि राजस्व में भारी कमी आई है. हालांकि पर्रीकर ने फरवरी में 17,123 करोड़ रु. का बजट पेश करते हुए 145 करोड़ रु. की अतिरिक्त राजस्व उगाही का अनुमान लगाया था. खनन पर सुप्रीम कोर्ट के प्रतिबंध और खराब बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क ने दिक्कतें और बढ़ा दी हैं. पर्याप्त बिजली होने के बावजूद राज्य अब बिजली कटौती का सामना कर रहा है.

पर्रीकर की गैरमौजूदगी राजनैतिक मोर्चे पर भी महसूस की जा रही है. गोवा भाजपा में फूट पड़ गई है. राज्य भाजपा अध्यक्ष विनय तेंडुलकर और पूर्व मुख्यमंत्री लक्ष्मी पार्सेकर एक-दूसरे के खिलाफ हो गए हैं, क्योंकि तेंडुलकर ने 14 अक्तूबर को पार्सेकर के विरोधी कांग्रेस विधायक दिलीप सोप्टे को भाजपा में शामिल कर लिया. और अब दो अन्य वरिष्ठ भाजपा नेता राजेंद्र आर्लेकर तथा दयानंद मांडरेकर खुलकर बाहरी लोगों को जगह देने के लिए तेंडुलकर का विरोध कर रहे हैं.

स्थिति नाजुक है. अगर पर्रीकर को हटाया जाता है तो तेंडुलकर मुख्यमंत्री पद के अग्रणी दावेदार के रूप में अपने को पेश कर रहे हैं (अन्य दो दावेदारों, विधानसभा अध्यक्ष प्रमोद सावंत और स्वास्थ्य मंत्री विश्वजीत राणे को भाजपा कार्यकर्ताओं या सरकार में सहयोगी दलों का विश्वास हासिल नहीं है).

पर्रीकर की बीमारी ने तरह-तरह की अफवाहों को हवा दे दी है. राणे ने आखिरकार पत्रकारों की एक बैठक में 26 अक्तूबर को खुलासा कर ही दिया कि मुख्यमंत्री अग्नाशय के कैंसर से जूझ रहे हैं.

राणे ने कहा, ''यह कोई छुपाने की बात नहीं है, उन्हें अपने परिवार के साथ शांति से रहने दिया जाए.''

इस बीच सहयोगी दलों का धीरज टूट रहा है. एमजीपी प्रमुख दीपक धावलिकर ने धमकी दी है कि अगर दूसरे सबसे वरिष्ठ मंत्री, उनके भाई सुदीन को पर्रीकर की अनुपस्थिति में मुख्यमंत्री का पद नहीं दिया गया, तो वे दूसरे विकल्प पर विचार करेंगे. यानी भाजपा के हाथ से बागडोर छूटती जा रही है. शायद इसका एहसास भाजपा केंद्रीय नेतृत्व को भी हो गया है.

गोवा कांग्रेस के अध्यक्ष गिरीश चोडांकर ने आरोप लगाया है कि कुछ नौकरशाहों और भाजपा नेताओं ने पर्रीकर को कैद करके रखा है. उन्होंने सवाल किया कि क्यों बीमार मुख्यमंत्री से किसी को मिलने नहीं दिया जा रहा है. चोडांकर ने पूछा, ''हम सुनते हैं कि वह फाइलों को मंजूरी दे रहे हैं, मुझे इस पर संदेह है...क्या उन्होंने वास्तव में उन फाइलों पर हस्ताक्षर किए हैं या उनके जाली हस्ताक्षर किए जा रहे हैं.

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