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कृषिः घाटे की फसल

मौके पर सरकारी खरीद के इंतजाम नाकाफी, किसान औने-पौने बेच रहे फसल. पर सरकार सुधार के उपायों पर कायम.

कीमत तो मिले मध्य प्रदेश की  एक अनाज मंडी में बिकने को तैयार धान कीमत तो मिले मध्य प्रदेश की एक अनाज मंडी में बिकने को तैयार धान

यह इसी 3 अक्तूबर की बात है. हरियाणा की कैथल मंडी में 1,500 रुपए प्रति क्विंटल अपना धान तुलवाकर लौट रहे 26 वर्षीय किसान प्रदीप चहल बताते हैं कि मंडी में सरकारी खरीद शुरू होने से ठीक पहले भाव में कुछ सुधार दिखा है. इससे पहले धान के भाव 1,000—1,100 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच गए थे.

हालांकि 1,500 रुपए प्रति क्विंटल का भाव भी सरकार की ओर से तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 1,868 रुपए से करीब 20 फीसद कम ही है. लेकिन अब फसल बेचना उनकी मजबूरी थी क्योंकि उन्हें अगली फसल की तैयारी करनी है और पिछली फसल का कर्ज भी उतारना है. 

इसी तरह जिन मंडियों में सरकारी खरीद शुरू हो गई है वहां भाव एमएसपी के करीब पहुंच रहे हैं. मसलन, पंजाब के कपूरथला, फाजिल्का, जालंधर, गुरुदासपुर जिले की मंडियों में आवक शुरू हो गई है और भाव एमएसपी के करीब हैं. पंजाब बासमती राइस मिलर्स एसोसिएशन के महासचिव आशीष कथूरिया बताते हैं, ''10 अक्तूबर के बाद मंडियों में अच्छी फसल की आवक शुरू हो जाएगी.

घाटे की फसल

अभी भी भाव एमएसपी से 50 से 70 रुपए प्रति क्विंटल ही नीचे चल रहे हैं.’’ कथूरिया को बस एक ही फिक्र है कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से अगर ज्यादा स्टॉक पंजाब आ गया तो पंजाब-हरियाणा के किसानों को चोट पहुंचेगी.

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले की मंडियों का हाल जुदा है. यहां अभी सरकारी कांटे लगने का इंतजार है. जिन किसानों का सब्र जवाब दे रहा है वे 1,100 रुपए से 1,400 रुपए क्विंटल जो भी भाव मिल जाए उस पर धान बेचने को तैयार हैं.

शिकारपुर तहसील के किसान परविंदर मंडियों का हाल बयान करते हुए कहते हैं कि मोटा धान 1,200 रुपए में बिक ही रहा है, अच्छी क्वालिटी के धान की भी पूछ नहीं. इसी गांव के राजेंद्र काका कहते हैं, ''दो दिन पहले 1509 वेरायटी का धान 1,800 रुपए क्विंटल में तुलवा आए जो दो साल पहले दो गुने तक बिका था. इसके लिए सरकार की कोई एमएसपी भी नहीं है.’’

मंडियों की पड़ताल और किसानों की बातों से जाहिर है कि जमीन पर सरकारी खरीद के उपयुक्त इंतजाम नहीं हैं. जो किसान अपनी उपज और ज्यादा रोक कर रख पाने में असमर्थ हैं, वे औने-पौने भाव पर उसे बेचने (डिस्ट्रेस सेलिंग) को तैयार हैं. मोटी बात यह है कि फसल के दाम सरकारी खरीद के सहारे ही चलते हैं.

जिन राज्यों में सरकारी खरीद अच्छी होती है, वहां सही भाव मिल जाता है या जिन फसलों के एमएसपी में सरकार बढ़ोतरी करती है उनकी बुवाई बढ़ जाती है. वहीं, सरकारी खरीद के अभाव में किसानों की उपज के भाव मांग-आपूर्ति के तराजू में ही तौले जाते हैं. बंपर पैदावार उनके लिए तो जैसे अभिशाप बन जाती है. 

सरकारी खरीद के आधार पर दाम का चलना सरकार के उस दावे की पोल खोलता है जिसमें खुले बाजार को किसानों के लिए अच्छा और फसल के बेहतर दाम दिलवाने के लिए जरूरी बताया गया है. पूर्व केंद्रीव कृषि राज्य मंत्री सोमपाल शास्त्री कहते हैं, ‘‘बाजार के अर्थशास्त्र से अनभिज्ञ किसान लगातार पैदावार बढ़ाने में जुटे रहते हैं और सरकार भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करती है.

लेकिन जब पर्याप्त बुनियादी ढांचे के अभाव में उसकी फसल एमएसपी पर भी नहीं बिकती तो वे खुद को संकट में घिरा पाते हैं.’’ 2019-20 में अनाज पैदावार और सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो सरकार की ओर से केवल 43 फीसद धान और 36 फीसद गेहूं की ही खरीद की जा सकी.

यह खरीद भी कुछ राज्यों और करीब एक-चौथाई किसानों तक ही सीमित है. वैसे, केंद्रीय खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभाग के सचिव सुधांशु पांडेय के मुताबिक, पिछले साल के मुकाबले इस साल धान की खरीद करीब 23 फीसद ज्यादा हुई है. पिछले साल 627 लाख मीट्रिक टन खरीद हुई थी, अबकी 738 लाख मीट्रिक टन हुई है.

धान के इतर भी गेहूं, मक्का, सोयाबीन, कपास आदि ऐसी फसलें हैं जिनका मूल्य बाजार में एमएसपी के नीचे है. केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री कैलाश चौधरी बताते हैं कि खरीफ 2020-21 सीजन में अभी तक गुजरात, महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे राज्यों से आए प्रस्तावों के आधार पर 13.88 लाख मीट्रिक टन सोयाबीन खरीद की स्वीकृति दी गई है. महाराष्ट्र में 15 अक्तूबर से इसकी खरीद शुरू हो जाएगी.’’ 

बहरहाल, राष्ट्रीय किसान महासंघ के राष्ट्रीय प्रवक्ता अभिमन्यु कोहाड़ एक और पहलू की ओर इशारा करते हैं, ''सरकारी खरीद खत्म होने के बाद अगर किसान चार-पांच महीने गेहूं रख लेता था तो उसे एमएसपी से 200-250 रुपए ऊपर का भाव आसानी से मिल जाता था. इस साल हालत खराब है.

हरियाणा की मंडियों में 1,925 रुपए की एमएसपी वाला गेहूं बमुश्किल 1,600 रुपए में बिक रहा है.’’ सरकारी खरीद में सबसे बड़ी हिस्सेदारी गेहूं और धान की ही होती है. अभिमन्यु कहते हैं, ''सरकार जो भी दावे करे, जमीन पर कोई तैयारी नजर नहीं आती. गिने-चुने किसानों को ही एमएसपी का फायदा मिल पाता है.’’ 

उधर मध्य प्रदेश में मंडी शुल्क घटाने की मांग को लेकर 24 सितंबर से मंडियों में हड़ताल है. करीब दो हफ्ते से जारी इस हड़ताल के बीच ही सोयाबीन, मक्का समेत खरीफ फसलों की आवक शुरू हो चुकी है. मंडियों में कारोबार ठप होने के चलते किसान उपज को बाहर औने-पौने दाम पर बेचने के लिए मजबूर हैं.

इंदौर के व्यापारी हेमंत जैन बताते हैं, ''सोयाबीन का भाव अभी एमएसपी से 200 रुपए नीचे चल रहा है. जल्द हालात सामान्य होते हैं तो इस सीजन में किसानों को अच्छा भाव मिल सकता है.’’ हड़ताल के दौरान सोयाबीन के किसानों को अपनी फसल 3,000 रुपए और उसके भी नीचे बेचने को मजबूर होना पड़ा. सरकार ने सोयाबीन (पीली) की एमएसपी 3,880 रुपए तय की है.

मक्के का हाल तो और बुरा है. कर्नाटक, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश की विभिन्न मंडियों में मक्का का औसत भाव 900 से 1,200 रुपए प्रति क्विंटल के बीच है, जबकि सरकार ने मन्न्के की एमएसपी 1,850 रुपए न्न्विंटल तय की है. कासगंज मंडी में 6 अन्न्तूबर को मक्के का औसत भाव 1,150 रुपए प्रति क्विंटल था. वैसे निचली बोली 1,080 रुपए तक गई थी.

निकट भविष्य में मक्के की कीमतों में किसी तेजी की उम्मीद नजर नहीं आ रही. यही कारण है कि किसान औने-पौने भाव पर मक्का बेचने के लिए मजबूर है. मक्के के भाव गिरने का कारण भी हर साल पैदावार बढऩा और निर्यात मांग का घटना है.

कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा कहते हैं, ''एमएसपी घोषित करने का फायदा ही क्या जब किसान को उसका भाव मिल नहीं रहा.’’ खरीफ की विभिन्न फसलें नई आवक से पहले ही एमएसपी के नीचे कारोबार कर रही हैं.

बाजार में आपूर्ति बढ़ेगी तो भाव और टूटेंगे, जिसका असर सरकारी खरीद खत्म होने के बाद दिखेगा. वे कहते हैं, ''ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की रैंकिंग 102 है और हमारे ही देश में बफर स्टॉक लिमिट से ज्यादा अनाज भरा है. सरकार किसानों की आय दोगुनी करने के दावे कर रही, यहां न्यूनतम भाव ही नहीं मिल रहा.’’

किसानों को बाजार के प्रति जागरूक बनाने, पैदावार नियंत्रित करने और कुछ नीतिगत फैसले लेने की जरूरत है. शास्त्री सुझाते हैं, ''कृषि समर्थन मूल्यों को किसानों का वैधानिक अधिकार बना दिया जाए और कृषि मूल्य तथा लागत आयोग को संवैधानिक दर्जा दे दिया जाए, जिसकी सिफारिशें सरकार के ऊपर कानूनी रूप से बाध्य हों, तो इन उपायों के निश्चित तौर पर दीर्घकालीन लाभ हो सकते हैं.’’ 

''राज्यों को जरूरी स्वीकृतियां प्रदान की गई हैं. राज्य सरकारों द्वारा एमएसपी पर खरीद सुनिश्चित की जाएगी.’’
कैलाश चौधरी
केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री

''बाजार के अर्थशास्त्र से अनभिज्ञ किसान पैदावार बढ़ाने में जुटे रहते हैं, सरकार भी इसे बढ़ावा देती है और फसल एमएसपी पर न बिकने पर वही पैदावार किसानों के लिए अभिशाप बन जाती है.’’
सोमपाल शास्त्री
पूर्व केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री
 

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