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प्रधान संपादक की कलम से

एलआइसी के शेयर की बिक्री से सरकार का खजाना तो भरेगा ही, सुधार और निजीकरण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का भी पता चलेगा, जिसकी बातें इस साल जोर से की जा रही हैं

एलआइसी: शेयर बिक्री से भरेगा सरकार का खजाना एलआइसी: शेयर बिक्री से भरेगा सरकार का खजाना

हाल के वर्षों में देश का आर्थिक इतिहास यही बताता है कि बड़े सुधार मुश्किल दौर में ही हुए हैं. वे सिर्फ वैचारिक प्रतिबद्धताओं से नहीं, बल्कि आर्थिक जरूरतों से संभव हुए. मई 1991 में देश का विदेशी मुद्रा भंडार जब महज कुछ हफ्तों के आयात लायक ही बच गया तो चंद्रशेखर सरकार ने वह किया जो सोचा भी नहीं जा सकता था. देश के लोगों की सबसे प्रिय धातु, 67 टन सोना आइएमएफ से 2.2 अरब डॉलर कर्ज हासिल करने के लिए विदेश भेजा गया. उसके बाद जून में, आंशिक तौर पर ही सही, लाइसेंस राज के खात्मे का कदम उठाया गया. आज हम वैसे ही मोड़ पर खड़े हैं. महामारी की वजह से इस वित्त वर्ष में जीडीपी के 8 फीसद तक सिकुड़ जाने का अनुमान है, जो पिछले साल के मुकाबले 12 फीसद का कुल घाटा है. मतलब है कर राजस्व में कमी. और फिर सरकार वही कुछ कर रही है, जैसा पहले सोच के उलट किया गया था.

सार्वजनिक उपक्रमों के ताज में बेशकीमती नग भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआइसी) का गठन 1956 में संसद के कानून से किया गया गया था. यह भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) और भारतीय स्टील प्राधिकरण जैसे देशव्यापी और उदारीकरण के दौर के पहले महान समाजवादी विशालकाय संगठनों में से एक है. यह निगम उस दौर का है जब सरकार ब्रेड, हाथ घड़ी और मोटर कार बनाया करती थी, बैंक और एयरलाइन चलाया करती थी और देशवासियों को बीमा पॉलिसी बेचती थी. धीरे-धीरे, विभिन्न सरकारों ने महसूस किया कि ये नॉन कोर गतिविधियां निजी क्षेत्र बेहतर कर सकता है. कुछ को बेच दिया गया जबकि कुछ को खत्म होने दिया गया. अलबत्ता कई सरकार के गले में हार की तरह बने रहे.

उदारीकरण के बावजूद एलआइसी भीमकाय सरकारी कंपनी बनी हुई है. अभी भी वह देश के बीमा बाजार में 66 फीसद की हिस्सेदारी रखती है. हर पांचवां देशवासी उसका बीमा लिए हुए है. उसके 1,00,000 से ज्यादा कर्मचारी हैं और करीब 36 लाख करोड़ रु. की संपत्ति का प्रबंधन करती है, जो देश के सबसे बड़े निजी क्षेत्र की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज की कुल संपत्ति मूल्य का तीन गुना है. उसके 29 करोड़ पॉलिसीधारक महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश की कुल जनसंख्या के योग के बराबर हैं. उसने 2019-20 में 6.16 लाख करोड़ रु. की आमदनी और 2,713 करोड़ रु. का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया.

उसकी अपने पॉलिसीधारकों को बोनस और डिविडेंड के मद में मुनाफे को साझा करने की अनोखी नीति भी है. इन सकारात्मक पहलुओं के बावजूद निगम अपारदर्शी बना हुआ है और अपने मुनाफे की धुंधली छवि पेश करता है. वर्षों से इसकी नाकामियों का पहाड़ खड़ा होता गया है. उसके एनपीए की फेहरिस्त तकरीबन 6 फीसद है जबकि इस उद्योग में कायदा सिर्फ 1.5-2 फीसद का है.

वर्षों से एलआइसी से विनिवेश दूर ही रहा है. अतीत में कई कोशिशों के बावजूद, खासकर 1999 में जब बीमा क्षेत्र खोला गया, यह निगम सूचीबद्ध होने या विनिवेश से दूर ही रहा. इसकी कई वजहें रही हैं. बड़ी वजह तो यही है कि बीमा संगठन होने के अलावा वर्षों से एलआइसी सरकार का आखिरी कर्जदाता रहा है. वह अपने विशाल धन भंडार से सरकारी बैंकों को उबारता रहा है, सरकारी बॉन्ड खरीदता रहा है और सरकारी कंपनियों में शेयर खरीदकर विनिवेश के लक्ष्य को साधता रहा है. मार्च 2020 तक एलआइसी का कुल निवेश पोर्टफोलियो 33.7 लाख करोड़ रु. था, जो निजी बीमा कंपनियों के कुल योग का लगभग चार गुना अधिक है.

पिछले साल शुरुआत में जब अर्थव्यवस्था सिकुड़ने लगी तो सरकार ने एलआइसी की 5 से 10 फीसद हिस्सेदारी बेचने की सोचा. संघ परिवार के कुछ हलके और एलआइसी के भीतर से उठे विरोध के कारण वह प्रस्ताव धरा रह गया. हालांकि विनिवेश की राह में दूसरी भी दिक्कतें हैं. एलआइसी का गठन संसद से पारित कानून से हुआ था इसलिए संसद से शेयर बेचने की मंजूरी लेनी होगी. सरकार पर घर का सोना सस्ते में बेचने का भी आरोप लगने लगा है. आलोचकों का कहना है कि सरकार को एलआइसी के विनिवेश में धीरे कदम उठाना चाहिए, शायद पहले छोटा-सा शेयर  बेचना चाहिए.

लेकिन महामारी और लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था को जर्जर कर दिया है और देश चार दशक में पहली बार मंदी की ओर बढ़ चला है, हालात फौरी कदम उठाने जैसे हो गए हैं. राजकोषीय घाटा या सरकार की आमदनी और खर्च में कमी से सरकारी देनदारी 9.5 फीसद तक बढ़ गई है. सरकार को कम से कम 4.5 लाख करोड़ रु. घाटे को 6.8 फीसद के स्तर पर लाने के लिए चाहिए, जिसकी प्रतिबद्धता सरकार ने अगले वित्त वर्ष के लिए जताई है.

एलआइसी के मूल्यांकन पर पहुंचना भी चुनौतीपूर्ण है. अनुमानों में फर्क काफी चौड़ा है. उनमें 2-3 लाख करोड़ रु. से लेकर 20 लाख करोड़ रु. तक का फर्क है. उम्मीद यह है कि सरकार 10 फीसद शेयर बेचकर कम से कम 1 लाख करोड़ रु. उगाह सकती है. इससे सरकार को अपने 2022 के लिए 1.75 लाख करोड़ रु. के विनिवेश लक्ष्य को हासिल करने में काफी मदद मिलेगी. तंगहाल सरकार को उबारने के अलावा एलआइसी के शेयर बेचने के कई और लाभ होंगे. उससे अर्थव्यवस्था में जान लौटेगी. आइपीओ के विशाल आकार से शेयर बाजार में अनुमानित 5-5.5 लाख करोड़ रु. की पूंजी आ जाएगी और अनुमानित 1 करोड़ निवेशकों की आमद से पूंजी बाजार का आकार बड़ा हो जाएगा.

इससे उसके कामकाज में पारदर्शिता आएगी और निजी निवेशकों के प्रति जवाबदेही का भाव आएगा. इससे एलआइसी का कामकाज अधिक बेहतर होगा. पिछले दो दशक में कुछ उद्योग वृद्धि और रोजगार में इजाफे की वजह बने हैं. पहले, आइटी कंपनियां थीं तो उसके बाद टेलीकॉम और ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग का नंबर आया. उसके बाद बीमा क्षेत्र का नंबर आना था लेकिन उसमें उठान नहीं आया क्योंकि उसमें पूरी तरह उदारीकरण नहीं हो पाया. अब बीमा क्षेत्र में एफडीआइ की सीमा 49 फीसद से 74 फीसद तक बढ़ी और एलआइसी के शेयर बेचने की बात आई तो बीमा क्षेत्र में बुलंदी आने को है. भारत दुनिया में सबसे कम बीमा वाला देश है. इस क्षेत्र में बुलंदी लाखों रोजगार पैदा कर सकती है.

हमारी आवरण कथा 'एलआइसी पर दांव' इस विशाल वित्तीय कंपनी के विनिवेश की चुनौतियों पर गौर करती है. इसके लेखक सीतांशु स्वैन हैं जो 25 साल से इस क्षेत्र को कवर करते रहे हैं.

एलआइसी के शेयर की बिक्री से सरकार का खजाना तो भरेगा ही, सुधार और निजीकरण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का भी पता चलेगा, जिसकी बातें इस साल जोर से की जा रही हैं. अगर योजना के मुताबिक वाकई बिक्री होती है, तो इससे संकेत मिलेगा कि सरकार यकीनन गंभीर है और निजीकरण से पीछे नहीं हटेगी. इससे देश का भला ही होगा.

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