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प्रधान संपादक की कलम से

जो कूनो के परिवेश में अच्छा जीवन नहीं जी सकता और वे चाहेंगे कि भारत के पास जो रह गया है, उसे ही बचाने में अपने कीमती संसाधन को खर्च करना चाहिए.

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23 मई, 2005 23 मई, 2005

अरुण पुरी

वन्यजीवों के मामले में भारत का इतिहास थोड़ा धुंधला ही रहा है, लेकिन इस हफ्ते एक साहसिक प्रयोग हो रहा है, ताकि शून्यता के एक गहरे एहसास को भरा जा सके. पचहत्तर साल पहले भारत के आजाद फिजा में कदम बढ़ाने के साथ ही एक त्रासद संयोग यह था कि एक शानदार जानवर चीता खात्मे के कगार पर खड़ा था.

अब छत्तीसगढ़ में पड़ने वाली तत्कालीन कोरिया रियासत के महाराजा रामानुज प्रताप सिंह देव ने हाथ में बंदूक और पैरों में पड़े तीन मृत चीतों के साथ तस्वीर ठीक बाकी राजाओं की तरह ही खिंचवाई. समस्या यह थी कि उनके कदमों में पड़े वे भारत के आखिरी चीते थे.
यह दुनिया भर में वन्यजीव प्रजातियों के जबरन खात्मे की कहानी का ही हिस्सा है. पिछली सदी की शुरुआत में चीतों की आबादी एक लाख होने का अनुमान था, तो 2016 की आखिरी गणना में चीतों की कुल संख्या 7,100 आंकी गई. उनमें भी ज्यादातर अफ्रीका के दक्षिणी हिस्से में और एक छोटा-सा झुंड ईरान में बचा हुआ है. भारत अब नक्शे से बाहर हो गया.

1952 में ही हमने चीतों के खात्मे का औपचारिक ऐलान कर दिया, यानी आजादी के बाद पहली जानवर प्रजाति इतिहास के हवाले हो गई. आधुनिक वैज्ञानिकों का अंदाजा है कि भारतीय उप-प्रजाति एकिनोनिक्स जुबाटस वेनाटिकस शायद एक और दशक तक घने जंगलों में छुटपुट तादाद में रही, मगर इतनी मजबूत आबादी न थी कि वह फिर लहलहाने लगती. हालांकि बीती सहस्राब्दी में तकरीबन एक सदी पहले तक चीते भारत में तमिलनाडु के तिरुनेलवेलि से उत्तर के मैदानी इलाकों तक लाखों की संख्या में कुलांचें भरते रहते थे.

चीतों की असल दुश्मन मनुष्य जाति ही है. आखिरी महाराजाओं और अंग्रेजों की शिकार की मौज-मस्ती तो उन पर खतरे की महज एक वजह थी. परंपरागत रूप से उन पर खतरा सदियों तक पालतू चीतों की मदद से चला चीतों के शिकार का खेल था. मिस्र के फिरौन (राजाओं की उपाधि), यूरोप के राजा और पोप, चंगेज खान....सभी को अपने आसपास पालतू चीते पसंद थे. अकबर को तो थोड़े से संतोष न था.

उनके बाड़े में पूरे जीवनकाल में 9,000 चीते थे. उनके सबसे प्यारे चीते का नाम समंद मलिक था जिसे हीरे-जवाहरात से जड़ा लबादा पहनाया जाता था और सिपाही उसकी पालकी ढोते थे. अंग्रेजों ने चीतों को ऐसा दरिंदा माना, जिनका खात्मा और भी शानदार जानवरों बाघ और शेर को बचाने के लिए जरूरी था. चीतों के शिकार के लिए 6 रु. से लेकर 18 रु. तक इनाम दिया जाता था और उस वक्त यह राजसी तोहफे जैसी रकम थी.

अब हम एक अनूठी परियोजना के जरिए सदियों के उस नुक्सान की भरपाई करना चाह रहे हैं और यह है जंगल में मांसाहारी जानवर का पहली बार एक से दूसरे महाद्वीप को हो रहा हस्तांतरण. ठीक-ठीक कहें तो चीतों का आयात. लेकिन उन्हें फिर बसाएंगे कहां? उनके उपयुक्त रहवास के लिए वर्षों की छानबीन के बाद ग्वालियर के सिंधिया राजाओं की पसंदीदा आखेट स्थली मिली.

सब कुछ ठीक रहा तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें अपने जन्मदिन 17 सितंबर को जंगल के छोटे-से हिस्से में छोड़ेंगे. महीने भर बाद उन्हें पश्चिमोत्तर मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क के 750 वर्ग किमी के क्षेत्र में छोड़ दिया जाएगा.

इसके लिए शानदार आठ चीतों की पहली खेप नामीबिया से आई है. केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव की मानें तो यह एक पायलट प्रोजेक्ट है, जो आखिर में 25 चीतों तक जा सकता है, ताकि एक स्थिर आबादी तैयार हो जाए, जिसे आखिरकार दूसरे माकूल इलाकों में छोड़ा जा सके. यही मूल बिंदु है. चीता धरती पर सबसे तेज दौड़ने वाला जानवर है, जो स्पोट्र्स कार की तरह अचानक रफ्तार पकड़ सकता है और 120 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकता है, इसलिए दौड़ने के लिए उसे खास तरह का खुला जंगल चाहिए.

अफ्रीका के दक्षिणी हिस्से का विशाल दायरा उसके लिए मुफीद है. इसके उलट भारत के जंगल पेड़ों और झाडिय़ों से भरे हैं. कुनो का इलाका ही उसके आसपास ठहरता है. वहां शुरू में गिर के शेरों को बसाने का विचार था, पर वह अभी कागजों में ही है. लेकिन इस प्रक्रिया में पर्यावरण और पारिस्थितिकी को लेकर एक खास शुबहा भी पैदा हो गया है. जंगल से मानव आबादी पूरी तरह से हटाने के लिए 24 गांवों को नई जगह बसाया जा रहा है और उनके खेत घास के हरेभरे मैदान में तब्दील हो गए हैं, जिसके आसपास खैर और तेंदू के जंगल हैं.

इस विचार पर 1970 के दशक से माथापच्ची चल रही है. तब इंदिरा गांधी की सरकार ने ईरान के शाह से संपर्क किया था, पर दोनों जगह सरकारें बदलने से प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया. एशियाई चीता के आखिरी ठिकाने ईरान में भी उनकी संख्या गिनी-चुनी है. अब संभावित क्षेत्र वही था, जहां चीते आज भी कुलांचें भरते हैं और जहां आधुनिक ए. जुबाटस प्रजाति का पहली बार जन्म हुआ. अफ्रीका में 39 लाख साल पहले के पाए गए जीवाश्म अब जीव-विज्ञानियों की बहस के लंबे समय से सबूत बने हुए हैं.

तो, हमें पहली खेप में आठ मिल रहे हैं. पर क्या वे बचे रह पाएंगे? बाधाएं कम नहीं. उनके सबसे पुराने दुश्मन बैठे हैं. बिलाव वंश परंपरा से ही उपजी यह प्रजाति बाघ, शेर और तेंदुओं की ही दूर की रिश्तेदार है लेकिन चीता इन सबमें ज्यादा नाजुक है. उसका शरीर औसत मनुष्य से हल्का होता है, उसके तीखे नाखून वाले पंजे शिकार को छटकने नहीं देते, लेकिन उसे तेंदुए की तरह पेड़ पर चढ़ने के नाकाबिल बनाते हैं.

यानी वह शानदार तो है मगर कुछ नाजुक भी. फिर उसके लिए पर्याप्त शिकार उपलब्ध होने का भी मामला है. क्या वह काफी होगा? और तेंदुओं तथा बाघों से प्रतिद्वंद्विता का क्या होगा? क्या वे इन सब बाधाओं से पार पा सकेंगे?

हमारे भोपाल के सहकर्मी सीनियर एडिटर राहुल नरोन्हा वन्यजीवों के प्रति अपने जुनून के साथ इस पूरे ड्रामे को विस्तार से बता रहे हैं. हर बारीकी पर गौर करते हुए वे संरक्षणवादियों के बीच छिड़े विवाद की परतें भी खोलते हैं. सबसे ऊंचा विवादी स्वर वाल्मीक थापर का है. उनकी दलील है कि अफ्रीकी चीता पराए परिवेश का है, जो कूनो के परिवेश में अच्छा जीवन नहीं जी सकता और वे चाहेंगे कि भारत के पास जो रह गया है, उसे ही बचाने में अपने कीमती संसाधन को खर्च करना चाहिए.

भारत में वन्यजीव संरक्षण के दिग्गज एम.के. रंजीत सिंह और दूसरे इस दलील से सहमत नहीं. आजादी के बाद भारतीय बाघ और शेर के संरक्षण के दो बड़े प्रोजेक्ट सफल रहे हैं. पर उनमें तो मौजूद तादाद को बढ़ाना ही था. भारत में चीते को वापस लाने का ऐसा महादेशीय हस्तांतरण का प्रोजेक्ट दुनिया में कहीं नहीं चलाया गया. दुनिया भर के पर्यावरणवादियों और जानवर प्रेमियों की नजर बनी रहेगी कि इसमें आगे क्या होता है.

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