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प्रधान संपादक की कलम से

मानव शरीर के किसी भी दूसरे अंग पर शायद उतनी रिसर्च नहीं हुई जितनी हृदय पर हुई है. इसके इर्द-गिर्द चिकित्सा विज्ञान इनसानी दिल की धड़कन की रफ्तार से विकसित हुआ है.

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29 सितंबर, 2010 29 सितंबर, 2010

अरुण पुरी

आम संगीतप्रेमियों में 'केके’ नाम से लोकप्रिय गायक कृष्णकुमार कुन्नथ 53 वर्ष के थे. फिल्मकार राज कौशल 49 वर्ष के. ट्रैवल इंडस्ट्री के अगुआ अंकुर भाटिया 48 के. कन्नड़ अभिनेता-निर्माता पुनीत राजकुमार 46 के. अभिनेता सिद्धार्थ शुक्ला 40 के. रेंटल स्टार्ट-अप ग्रैबहाउस की संस्थापक पंखुड़ी श्रीवास्तव 32 की. सौराष्ट्र के क्रिकेटर अवि बारोट 29 के...

पिछले कुछ अरसे में दिल से जुड़े अप्रत्याशित हादसों की वजह से अचानक मारे गए नामी लोगों की इस फेहरिस्त में सभी खासे युवा या मध्यवय से कम उम्र के थे. दिल के दौरे से लोगों का मरना खबर नहीं है बल्कि नया घटनाक्रम यह है कि सीने में दर्द सरीखे किसी जाहिर-से लक्षण और किसी साफ बेबसी या कमजोरी के बगैर मौत ने उन्हें लील लिया.

हाल में वेलनेस कंपनी इंडिया हेल्थ लिंक और सोशल एडवोकेसी ग्रुप हील फाउंडेशन की तरफ से किए गए 'इंडियन हार्ट्स लैकिंग केयर’ शीर्षक वाले अध्ययन से पता चला कि 26-40 वर्ष के आयु समूह के 53 फीसद भारतीयों में दो रोगों—मोटापे और उच्च रक्तचाप—के कारण कार्डियोवैस्कुलर बीमारी का जोखिम बहुत ज्यादा है. बेंगलूरू स्थित श्री जयदेव इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोवैस्कुलर साइंसेज ने पाया कि समय-पूर्व दिल के दौरे की वजह से भर्ती होने वाले लोगों की तादाद में 2017 के बाद 22 फीसद बढ़ोतरी हुई है.

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, दक्षिण एशियाई लोगों में दिल की बीमारियों की संभावना पश्चिम के लोगों के मुकाबले 40 फीसद ज्यादा है और इसकी मुख्य वजह है शहरी भारत की जीवनशैली और खान-पान की आदतें. जिन तीन चीजों के ज्यादा मात्रा में सेवन से दिल की बीमारी का जोखिम बढ़ जाता है, वे हैं नमक, सैचुरेटेड फैट और चीनी. भारत में इन तीनों चीजों से भरपूर फास्ट और प्रोसेस्ड फूड के आगमन के साथ हृदय रोग की घटनाओं में निश्चित रूप से इजाफा हुआ है.

डब्ल्यूएचओ ने दिन में 16-22 ग्राम से ज्यादा सैचुरेटेड फैट और 6 ग्राम से ज्यादा नमक न खाने की सिफारिश की है. वह यह भी कहता है कि किसी भी रूप में शक्कर का सेवन हमारी कुल ऊर्जा खपत के 10 फीसद से ज्यादा नहीं होना चाहिए. उसकी सलाह है, ''इसे और भी 5 फीसद या लगभग 25 ग्राम (6 चाय के चम्मच भर) से भी कम तक घटाने से अतिरिक्त स्वास्थ्य लाभ हासिल होंगे.’’ मगर बेखयाली में हम इनमें से किसी की परवाह नहीं करते.

जरा सोचिए—मैकस्पाइसी पनीर बर्गर में 17.12 ग्राम सैचुरेटेड फैट होता है, जो हमारी दैनिक सीमा के बराबर है, और मैकस्पाइसी चिकन के साथ एक बार परोसे जाने वाले मैकडोनाल्ड के घी राइस में करीब 2.3 ग्राम नमक होता है, जो हमारी एक दिन की स्वीकृत मात्रा से करीब आधा है. यहां तक कि बर्गर किंग मसाला वेज व्हॉपर में 11.8  ग्राम शक्कर होती है, जो हमारी दिन की स्वीकृत मात्रा की एक-तिहाई है!

हृदय रोग की बढ़ती घटनाओं के साथ विडंबना यह है कि चीजें इस तरह नहीं होनी चाहिए थीं. सीधा-सादा तथ्य यह है कि दिल की बीमारी अनिष्ट पर आमादा नियति का हमारा कोई अकस्मात, अप्रत्याशित, अबूझ कृत्य नहीं है. इसके डर से लाचार हो जाने का इन दिनों ज्यादा कारण नहीं है. मानव शरीर के किसी भी दूसरे अंग पर शायद उतनी रिसर्च नहीं हुई जितनी हृदय पर हुई है. इसके इर्द-गिर्द चिकित्सा विज्ञान इनसानी दिल की धड़कन की रफ्तार से विकसित हुआ है.

रोग की पहचान करने वाले औजार इन दिनों लेजर जितने तेज और बेहद सटीक हैं. इन्फ्लेमेशन या सूजन का गैर-विशिष्ट संकेतक होते हुए भी सी-रिएक्टिव प्रोटीन में एलडीएल कोलेस्ट्रॉल के स्तरों के मुकाबले बहुत ज्यादा पूर्वानुमान की क्षमता है. सुदूर प्रकाश प्रकीर्णन सरीखी भौतिकी की अवधारणाओं और पद्धतियों ने सीआरपी परीक्षण में दाखिल होकर इसे अत्यंत संवेदनशील बना दिया है. अपने दिल के बारे में ज्यादा से ज्यादा जान पाने के लिहाज से हम एक क्रांतिकारी पड़ाव पर हैं.

दूसरे प्रोटीन मार्कर भी हैं, जैसे ट्रोपोनिन और ब्रेन नैट्रियूरेटिक पेप्टाइड, जिनका इस्तेमाल रोग की पहचान और इलाज के विभिन्न चरणों में किया जाता है. थैलियम मायोकार्डियल परफ्यूजन स्कैन दिल में रक्त प्रवाह के आकलन में उसी तरह मदद करता है जैसे रेडियोएक्टिव ट्रेसर करते हैं; कंप्यूटेड टोमोग्राफी धमनियों के प्लैक में कैल्शियम के जमा होने को स्कैन कर सकती है; और मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग कई कोणों से आपके दिल की तस्वीरें ले सकती है.

दिल को देखने का ताजातरीन तरीका उसे आंख के जरिए देखना है. हमारी आंख में रेटिना के पीछे झीनी-सी वाहिका या वैस्कुलेचर के एआइ की सहायता से किए जाने वाले स्कैन की बदौलत डॉक्टर अत्यधिक सटीकता से दिल के दौरों के जोखिम का पूर्वानुमान लगा पाते हैं और पश्चिम के कुछ हिस्सों में इसका प्राथमिक डायग्नोस्टिक साधन के रूप में इस्तेमाल होने लगा है.

उपचारात्मक और न्यूनतम चीर-फाड़ वाले सर्जिकल हस्तक्षेप भी काफी कुछ विज्ञान-कथा की तरह और अत्यंत समर्थ होते जा रहे हैं—विस्थापन वॉल्व, स्मार्टफोन से जुड़े प्रत्यारोपित डिफाइब्रिलेटर, अत्यधिक उन्नत स्टेंट, सहायक उपकरण और रोबोटिक आर्म, सीधे प्रत्यारोपण या स्टेम सेल थेरेपी के प्रयोगात्मक क्षेत्र का तो कहना ही क्या.

अपने दिल को भला-चंगा रखने की कुंजी स्वस्थ जीवनशैली ही है. मगर ऊपर से दिखता यही है कि भारतीय उलटी दिशा में जा रहे हैं. स्विगी और जोमैटो ने पिछले साल शहरी भारत में 1.2 करोड़ समोसे और प्रति सेकंड दो बिरयानी डिलीवर कीं, जैसा कि सीनियर एसोसिएट एडिटर सोनाली आचार्जी इस हफ्ते हमारी आवरण कथा में बता रही हैं. वे लिखती हैं, ''डॉक्टर पिछले कुछ सालों में दबे पांव आए दिल के दौरों में बढ़ोतरी होती देख रहे हैं, महज इसलिए कि मरीजों को पता ही नहीं था कि वे जोखिम से घिरे हैं.

कार्डिएक मेडिसिन में बड़ी प्रगति हुई है जिसकी बदौलत 99 फीसद सटीकता से दिल के दौरों की भविष्यवाणी की जा सकती है और 1-2 फीसद लंबे वक्त के जोखिम के साथ उनका इलाज किया जा सकता है. ऐसे में दिल के दौरों की वजह से हुई हालिया मौतें देश की ऐसी स्वास्थ्य आपदा हैं जिससे पूरी तरह बचा सकता है.’’ कइयों के लिए यह महज अज्ञात का भय है जो इसे अज्ञात रखे हुए है.

आपके शरीर में जो हो रहा है, उसे न जानने से उसका होना नहीं रुकेगा—जानने से रुकेगा. यह दिखावा करने से कि सब ठीक-ठाक है, बीमारी खत्म नहीं होगी. वह वास्तव में डॉक्टर के पास नियमित जाने और जांच करवाने से खत्म होगी, फिर चाहे यह कितना भी अप्रिय क्यों न जान पड़ता हो. बीमारी की पहचान और इलाज की ज्यादातर पद्धतियों की सफलता दर अब काफी ज्यादा है. जानी-बूझी नादानी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है.

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