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प्रधान संपादक की कलम से

सबसे ज्यादा चमकी दलित राजनीति जिसमें अल्पज्ञात नायक-नायिकाओं की कहानियों से समुदाय को प्रेरित और एकजुट किया गया. इस मामले में अन्य पिछड़ी जातियां नहीं पिछड़ीं. उन्होंने भी अपने नायक गढ़े.

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26 मई, 2010 26 मई, 2010

अरुण पुरी

इस देश में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होने के साथ ही चुनावी राजनीति में एक-एक व्यक्ति की अहमियत बढ़ गई, चाहे वह किसी जाति-समुदाय का हो. मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद देश में जाति आधारित पार्टियां सत्ता पर काबिज हो गईं. इन पार्टियों ने अपने-अपने नायकों को महिमामंडित किया और जिनके पास नहीं थे उन्होंने इतिहास तथा मिथकों के अंधेरे कोने से झाड़-पोंछकर नए नायक गढ़ लिए. इसकी वजह से देश की सबसे पुरानी पार्टी धीरे-धीरे उत्तर के अपने गढ़ों को गंवाती चली गई.

उस पर यह इल्जाम था कि उसने सिर्फ अगड़ी जातियों के नेताओं को ही बढ़ावा दिया और सिर्फ अगड़े नायकों का ही गुणगान किया. राजनीति के मामले में जागरूक समझे जाने वाले बिहार में आजादी से चौदह साल पहले कांग्रेस में सवर्णों के वर्चस्व के खिलाफ तीन जातियों—कुर्मी-कोयरी-यादव ने त्रिवेणी संघ बना लिया. इन जातियों ने अपनी उत्पत्ति- को मिथकीय नायकों से जोड़ा और कालांतर में उसमें कई ऐतिहासिक नाम भी जुड़ गए. नब्बे के दशक में देश की राजनीति ने करवट ली और विभिन्न जातियों ने अपने-अपने नायक चुन लिए.

सबसे ज्यादा चमकी दलित राजनीति जिसमें अल्पज्ञात नायक-नायिकाओं की कहानियों से समुदाय को प्रेरित और एकजुट किया गया. इस मामले में अन्य पिछड़ी जातियां नहीं पिछड़ीं. उन्होंने भी अपने नायक गढ़े. कइयों ने ऐतिहासिक पुरुषों को अपनी जाति-समुदाय का बता दिया. यह सत्ता में पहुंचने और समुदाय के सशक्तीकरण का बढि़या साधन बन गया.

'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ के नारे लगने लगे. सरकारी नौकरियों, शैक्षिक संस्थाओं में रिजर्वेशन के बाद देश के संसाधनों पर भी जनसंख्या के अनुपात में अधिकार की मांग को लेकर जातियों की जनगणना कराने का फरमान जारी कर दिया गया. मंडल के बरअक्स कमंडल की राजनीति 2014 में अपने शबाब पर पहुंच गई.

देश की बहुसंख्यक आबादी की स्वाभाविक पसंद समझने वाली पार्टी ने इन सब जातियों को एकजुट करने के लिए एक समान दुश्मन पर निशाना साधा: सल्तनत काल से लेकर मुगलकाल और अंग्रेजों से लड़ने वाले सारे स्थानीय नेताओं को राष्ट्रवादी करार दिया और एक तरह से सभी को अपने पाले में लाने का प्रयास शुरू कर दिया. उसकी यह कोशिश काफी हद तक कामयाब है हालांकि राजनीति जातियों के सांचे में बंट गई है और मिथकीय-ऐतिहासिक नायक भी जाति के सांचे में बंटते जा रहे हैं.

भारत के महान सम्राट अशोक के गिरनार अभिलेख में उनका एक वक्तव्य दर्ज है: ''लोगों के लिए अपने उद्यम से मैं बहुत संतुष्ट नहीं हूं. सभी लोगों की भलाई को आगे बढ़ाने के काम को ही मैं अपना सबसे बड़ा कर्तव्य मानता हूं. मैं जो भी प्रयास करता हूं, वे इसलिए करता हूं ताकि हर प्राणी मात्र के प्रति अपने ऋण से उऋण हो सकूं.

मैं उन्हें इस लोक में सुखी रखने की कोशिश करता हूं ताकि वे आगे के लोक में स्वर्ग को पा सकें. मैं धम्म संबंधी ये बातें पत्थर पर इस वजह से लिखवा रहा हूं ताकि मेरे बेटे, पोते और परपोते भी इसका पालन करते हुए आमजन की भलाई में लगें.’’ इसमें सम्राट अशोक ने किसी एक जाति-समुदाय नहीं बल्कि सबकी भलाई की बात की है. वे किसी एक जाति के नहीं, पूरे देश का गौरव हैं.

लेकिन चुनावी राजनीति में वे भी जाति के सांचे में ढाल दिए गए. इस साल 8 अप्रैल को बिहार की प्रदेश भाजपा ने राजधानी पटना में सम्राट अशोक की जयंती का भव्य आयोजन किया. अगले ही दिन जनता दल (यू) ने भी अशोक की जयंती मनाई. माना जा रहा है कि इन दोनों पार्टियों के इन आयोजनों का सिर्फ एक मकसद था.

इस महान सम्राट की जयंती के बहाने राज्य की पिछड़ा वर्ग की प्रभावशाली जातियों—कुशवाहा और कुर्मी को रिझाने की कोशिश. हाल के दिनों में इन जातियों के बीच अशोक के नाम पर काफी गोलबंदी देखने को मिली है. इनके लिए भारत का यह महान सम्राट इनकी जाति की अस्मिता का प्रतीक है.

कुछ यही कहानी पूर्वी उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक नायक सुहेल देव की है. उनके नाम पर पूर्वांचल में जमकर राजनीति होती है. पिछड़े वर्ग को एकजुट करने और उसे लुभाने के लिए सुहेल देव के नाम पर भाजपा से लेकर ओमप्रकाश राजभर की सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी तक यहां सक्रिय हैं.

लेकिन नायकों को जातियों के खांचों में बांटने की कवायद केवल जाति क्रम में निचली कही जाने वाली जातियों तक सीमित नहीं है. इसका एक उदाहरण पौराणिक किरदार परशुराम हैं जिन पर अब ब्राह्मण समुदाय दावा करता है और यहां भी राजनैतिक पार्टियां इस गोलबंदी का फायदा उठाती दिखती हैं. 

इस हफ्ते की आवरण कथा 'जाति ही पूछो महापुरुषों की’ विशेष संवाददाता विनय सुल्तान ने लिखी है. वे कहते हैं, ''जाति उन्मूलन का दंभ भरने वालों को शायद यह एहसास नहीं कि इससे जातिवाद ही बढ़ेगा.’’ उन्होंने इस बात का जायजा लिया है कि कैसे जाति-धर्म से परे देश के नायक अब जातिगत अस्मिता के प्रतीक बनाए जा रहे हैं और कैसे राजनीति में उनका इस्तेमाल हो रहा है.

नायकों से प्रेरणा लेकर समुदायों को सशक्त बनाना तो सही है लेकिन उन्हें जातियों के सांचे में ढालना अक्लमंदी नहीं है. देश में पहले ही कई ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनैतिक दरारें हैं. उन्हें उभारने की बजाए पाटने के लिए सियासी दलों के बीच आम सहमति होनी चाहिए. मिथकीय-ऐतिहासिक नायक देश के हैं, किसी जाति विशेष के नहीं. हमें उनके शौर्य और सूझबूझ से प्रेरणा लेनी चाहिए, उन्हें झगड़े का सबब नहीं बनाना चाहिए.


 

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