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प्रधान संपादक की कलम से

हिंदू और मुसलमानों के बीच विभाजन की खाई जब चौड़ी होने लगी है तब क्या यह वक्त सबको साथ मिलकर संवेदनशील सांप्रदायिक मसलों पर सड़कों पर हिंसा के बदले सभ्य समाज की तरह बातचीत करने का नहीं है?

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31 जनवरी, 2018, 6 फरवरी, 2002, 31 अक्तूबर, 1989 का आवरण 31 जनवरी, 2018, 6 फरवरी, 2002, 31 अक्तूबर, 1989 का आवरण

अरुण पुरी

कई दशक पहले, मुझसे कई अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में बार-बार पूछा जाता था कि भारत का भविष्य क्या है. बेशक, देश में अपने उत्थान और पतन के दौर रहे हैं, लेकिन मेरा जवाब हमेशा यही था कि आती-जाती सरकारों के बावजूद भविष्य उज्ज्वल है क्योंकि देश का अपना आवेग है. सिर्फ एक शर्त है. सांप्रदायिक हिंसा इसकी रफ्तार में फच्चर फंसा सकती है. दुखद है कि मेरी वह आशंका सच साबित हो सकती है. मैं समूचे देश में सार्वजनिक बहस में सांप्रदायिक जहर को घुलते देख रहा हूं. हमें बहस तो उन मुद्दों पर करनी चाहिए थी, जो हमारी 1.38 अरब की आबादी पर सबसे ज्यादा असर डाल रहे हैं.

मसलन, कीमतों में इजाफा, रोजगार, सुशासन और विकास, कोविड-19 की एक और लहर की आशंका, नई शिक्षा नीति, और सही विकास मॉडल. लेकिन इसके बदले, हम अपने पूरे नक्शे पर रामनवमी/हनुमान जयंती पर हिंसा या लगभग हिंसा का विस्फोट देख रहे हैं. आखिरी गिनती तक, कम से कम आठ राज्यों—राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और आखिर में दिल्ली में ऐसी वारदातें हुईं. राहत की बात सिर्फ इतनी है कि मौतें कम हुईं—मध्य प्रदेश के खरगौन में एक, और झारखंड के लोहरदग्गा में दूसरी. इसके पहले कर्नाटक में इस बात पर हिंसा भड़क उठी कि पवित्र उत्सवों के मौसम में क्या हलाल मीट बेचने की इजाजत होनी चाहिए. उसी राज्य में प्री-यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में मुस्लिम लड़कियों को हिजाब पहनने पर प्रतिबंध का एक स्थानीय विवाद देशव्यापी तूफान में बदल गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट को भी दखल देना पड़ा.

देश में हाल के महीनों में हल्का सांप्रदायिक बुखार स्थायी भाव बन गया है. कई तरह के मुद्दों पर विवाद की रूपरेखा तैयार की गई—चाहे वह हिजाब हो या हलाल मीट, अजान, द कश्मीर फाइल्स या छुट-पुट कथित धर्म संसदों में भगवाधारी संतों का कत्लेआम का आह्वान और मौलवियों की उतनी ही खतरनाक धमकियां. दोनों तरफ के कट्टर समूह अपने कट्टरतावादी एजेंडे को आगे बढ़ाने और अपने लोगों को टकराव के लिए उकसाने के दोषी हैं. दुखद यह है कि कई राज्य सरकारें कानून पर अमल करने के बदले किनारे खड़े होकर देख रही हैं. सांप्रदायिक झड़पें भारत में नई नहीं हैं. ये तो बंटवारे के बाद से ही बीच-बीच में और विभिन्न वजहों से होती रही हैं. भाजपा ने अक्सर राजनैतिक फायदे के लिए वोटरों को गोलबंद करने में इसका इस्तेमाल किया है और दूसरों की नजर अल्पसंख्यक वोट बैंक पर रही है. कोई भी पार्टी सत्ता पर काबिज होने के लिए धर्म को औजार बनाने से अनजान नहीं है. इसमें बदलाव यह आया है कि चुनाव आसपास न हों तब भी आम लोगों में कटुता बढ़ती जा रही है. जमीनी स्तर पर हिंसक भावनाएं घर करती जा रही हैं. दोनों तरफ के कट्टर तत्व कट्टरता की होड़ में जुट गए हैं.

ऐसे सांप्रदायिक तनाव के नतीजों को समझने के लिए हमने कई नामी-गिरामी शख्सियतों को लेख के जरिए अपनी राय जाहिर करने को आमंत्रित किया. सबके लिखे में घोर निंदा के तेवर हैं. यहां तक कि दक्षिणपंथी टिप्पणीकार भी हिंसा के तांडव के प्रति खबरदार करते हैं. मसलन, आरएसएस के विचारक राम माधव विपक्षी नेताओं की 'हेकड़ी' की बात करते हैं, जो ''ऊंचे नैतिक मानदंड की शेखी बघारते हैं जबकि उनकी आलमारियां डरावने कंकालों से भरी हुई हैं.'' लेकिन वे स्वीकार करते हैं कि ''कुछ भगवाधारियों सहित हिंदुओं के एक वर्ग की ओर से'' उठने वाले नफरत के बोल ''निहायत अहिंदू'' हैं और कि ''एक पूरे समुदाय के नरसंहार की बातों में हिंदू धर्म के सामीकरण की बू आती है.'' दक्षिणपंथ समर्थक विद्वान मकरंद परांजपे भी लिखते हैं कि ''नकल में और जवाबी हिंसा का तांडव...गणतंत्र के लिए ठीक नहीं है.''

कांग्रेस नेता शशि थरूर का मानना है कि यह एक या दो वारदात का मामला नहीं है, ''जहर'' तो हमारे राजनैतिक शरीर की हर कोशिका में फैल चुका है. पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा अफसोस जताते हैं कि ''जिन संस्थाओं से...हमारे लोकतंत्र का रखवाला बनने की उम्मीद थी, उन्हें आज खुद सुरक्षा की जरूरत है.'' आहार विशेषज्ञ पुष्पेश पंत भी न्यायिक व्यवस्था के संस्थागत रूप से कदम पीछे खींचने से हैरान हैं जबकि ''स्वयंभू पहरुओं ने खुद ही पुलिस, जुरी, जज और जल्लाद की भूमिका ओढ़ ली है.'' एनएएलएसएआर के कुलपति फैजान मुस्तफा की दलील है कि जब मुट्ठी भर इस्लामी कट्टरतावादी यह धारणा बनाते हैं कि उनका मजहब अमन और भाईचारे के बदले हिंसक है तो दुनिया भर में मुसलमान समुदाय को मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं. वे चेताते हैं कि ''अगर असामाजिक तत्वों को हावी होने और दुनिया के सबसे सहिष्णु धर्म की छवि को नुक्सान पहुंचाने दिया गया'' तो हिंदू धर्म भी उसी गर्त में गिर सकता है. आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर के पूर्व संपादक शेषाद्रि चारी लिखते हैं, ''ज्यादा बड़ा मुद्दा संबंधित समुदायों के नेताओं की जिम्मेदारी का है कि वे बलपूर्वक या जरूरत पड़ने पर कानूनी सहारा लेकर उपद्रवी तत्वों पर लगाम लगाएं और काबू करें.''

हिंदू और मुसलमानों के बीच विभाजन की खाई जब चौड़ी होने लगी है तब क्या यह वक्त सबको साथ मिलकर संवेदनशील सांप्रदायिक मसलों पर सड़कों पर हिंसा के बदले सभ्य समाज की तरह बातचीत करने का नहीं है? अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण और दानवीकरण के बीच मध्य मार्ग भी होना चाहिए. क्या सभी समुदायों को फिलहाल उनके नाम पर होने वाली नफरत, उत्पात और हिंसा की निंदा नहीं करनी चाहिए? हमारे बीच एक नई पीढ़ी है, जिसने न बंटवारा देखा है, न 1992 में बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना. भारत उन त्रासदियों से बाहर निकल आया है और आगे बढ़ा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमेशा यही माना है कि शांति, सौहार्द और एकता ही विकास की पूर्वशर्त है. 2022 में जब देश आजादी का 75वां साल मना रहा है, हमें अपनी एकता का जश्न मनाना चाहिए, अपनी विविधिता का जोरदार प्रदर्शन करना चाहिए और विभाजनकारी खाइयों को मिटा देना चाहिए.

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