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प्रधान संपादक की कलम से

लगातार साफ होता जा रहा है कि हम मोदी गणतंत्र के वासी हैं, जैसा कि हमने केंद्र में भाजपा की दोबारा जीत के बाद 5 जून, 2019 की अपनी आवरण कथा में कहा था. फिलहाल लगता है कि सिर्फ और सिर्फ मोदी का दौर है

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5 जून, 2019 और 9 फरवरी, 2022 का आवरण 5 जून, 2019 और 9 फरवरी, 2022 का आवरण

अरुण पुरी

लगता है, कोई आंतरिक शक्ति भाजपा में दम भर देती है. लगातार बढ़ोतरी और दबदबे की भूख की धधकती आग-जो दूसरों में और खासकर कांग्रेस में तो बिल्कुल ही नदारद है. विधानसभा चुनावों में एक और चौंकाऊ जीत की शाम 10 मार्च, 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस एक राज्य पर कुछ कहना चाहा, वह था पंजाब. पांच राज्यों के चुनाव में इसी इकलौते राज्य में भाजपा के खाते में खास नहीं आया. आंतरिक उद्वेग को इससे बेहतर जाहिर नहीं किया जा सकता था. मोदी की अगुआई वाली भाजपा के लिए हर नाकामी भविष्य की कामयाबी की परियोजना बन जाती है, यानी दोहरी मशक्कत करने का आह्वान. पार्टी किसी अजेय ताकत का आभास देती है. मानो भारत की धरती खुद को और अधिक दक्षिणावर्ती करती जा रही है.

उत्तर प्रदेश बोल चुका है. चुनाव अभियान में जोरशोर से दोहराए गए 'डबल इंजन सरकार' यानी मोदी और योगी का योग भाजपा के लिए झोली भर के नतीजे ले आया. यह कई कथित नकारात्मक वजहों के बावजूद हुआ. किसानों की नाराजगी, बेरोजगारी, कोविड में हुई तबाही और आवारा पशुओं की समस्या सभी डबल इंजन के फॉर्मूले से पैदा की गई सकारात्मक हवा में उड़ गए. देश में राजनैतिक तौर पर सबसे प्रभावी राज्य ने हमें वह भी दिया, जिसकी मौजूदगी से अब इनकार नहीं किया जा सकता और वे हैं योगी आदित्यनाथ, जो चुनाव प्रचार के दौरान कानून-व्यवस्था पर अपने कड़े रुख की वजह से 'बुलडोजर बाबा' कहे गए. तो, इस संन्यासी ने 3.8 करोड़ वोटरों को भाजपा को वोट देने की इकलौती इच्छा के साथ मतदान बूथ तक पहुंचने की प्रेरणा बनकर इतिहास रच दिया.

यह समाजवादी पार्टी को पड़े वोट से करीब 90 लाख अधिक है. इस तरह योगी उत्तर प्रदेश में अपना कार्यकाल पूरा करके दोबारा चुने जाने वाले पहले मुख्यमंत्री बन गए. चुनाव नतीजे इंडिया टुडे-एक्सिस माइ इंडिया के एक्जिट पोल के आकलन को पुष्ट करते हैं. लोगों ने भाजपा के पक्ष में जाने की नंबर एक वजह 'विकास' को चुना, जिसके प्रत्यक्ष गवाह हाइवे हैं, जो अमूर्त सच्चाई नहीं, बल्कि हर वोटर के अपने अनुभव के दायरे में है.

इसी तरह दूसरी और तीसरी वजह है, कानून-व्यवस्था और कल्याणकारी योजनाएं. अमित शाह की सोच से आगे बढ़ी मुफ्त राशन ने दूसरे मोर्चों पर मतदाताओं के गुस्से को शांत करने में अहम भूमिका निभाई और सुरक्षा का एहसास तो रोजमर्रा की जिंदगी का सबसे बुनियादी पहलू ही है, जिसमें सांप्रदायिक सीमा को छू लेने वाले तत्व हैं. मोदी राज में जमीनी स्तर पर जाति समीकरण को साधते हुए विकास का संदेश लोगों तक पहुंचाने के मामले में काफी उम्दा प्रदर्शन किया है. हम वाकई वोटरों के एक नए वर्ग खासकर गरीबों को जन्म लेता देख रहे हैं, जो कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी हैं. यह वर्ग जाति की सीमाएं लांघ जाता है और उसमें हिंदुत्व की एक अंतर्धारा बहती है. खासकर महिलाएं इस नए वोट बैंक का हिस्सा हैं. 

चार दूसरे राज्यों के वोटरों ने भी बोला. यह कहानी निर्विवाद रूप से ब्रांड मोदी की है. मोदी ने भाजपा को वह जादुई आभा दे दी है, जो वोट आकर्षित करती है. मसलन, उत्तराखंड या गोवा में मुख्यमंत्री के चेहरे का कोई मायना नहीं था. दरअसल, इसका कोई मतलब ही नहीं था कि मौजूदा चेहरा कमजोर है, या वाकई बोझ है. दोनों राज्यों में समस्याएं और वोटरों की नाराजगी साफ दिख रही थी. पिछले साल ठीक 10 मार्च से पर्वतीय राज्य में तीन मुख्यमंत्री देखे गए—और पुष्कर सिंह धामी अपना निजी चुनाव हार गए तो अब चौथे दिखेंगे. क्या धामी या गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत लौटेंगे या नहीं? यह निहायत बेमानी सवाल है.

भाजपा ने 'प्रशासन की स्वाभाविक पार्टी' के तौर पर जिसकी जगह ली, उस पार्टी कांग्रेस की दुर्दशा मणिपुर से ज्यादा सबसे साफ-साफ कहीं और नहीं दिख सकती, जहां विजयी मुख्यमंत्री एन. बिरेन सिंह और भाजपा के दर्जन भर जीते उम्मीदवार पूर्व कांग्रेसी हैं. इसी वजह से इन नतीजों की अहमियत इन अलग-अलग राज्यों के लिए मायने से कहीं ज्यादा बड़ी है. 2024 की राह पुख्ता तौर पर तय हो चुकी है. अखिलेश यादव की नियति विपक्ष के लिए अपशकुनी सबक की तरह है, जो अपने जीवन की सबसे अच्छी लड़ाई लड़े और पार्टी के लिए अब तक के बेहतरीन 32.1 फीसद की वोट हिस्सेदारी हासिल करने में कामयाब रहे, फिर भी कुल संख्या में काफी पीछे रह गए. हमारे मुख्य आलेख में ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा ने यह पड़ताल की है कि कैसे इन नतीजों ने राष्ट्रीय मौसम का रुझान तय कर दिया है. यहां योगी के उदय से भाजपा के आंतरिक समीकरण भी दिलचस्प हो गए हैं.

दूसरी हैरतअंगेज कहानी बेशक पंजाब की है, जहां आम आदमी पार्टी ने एलीट विरोधी एक नया अफसाना गढ़ दिया है. निपट नवांगुतकों से धूल खाए हर रंग-पांत के परंपरागत नेता मैदान में अपने घाव सहलाते बिखरे पड़े हैं. अरविंद केजरीवाल अब इकलौती गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस शख्सियत हैं जिनके पास दो राज्यों की बागडोर है—भले दिल्ली 'आधा ही राज्य' है मगर उसका कद अपने आकार या सरकारी ढांचे से कहीं ज्यादा बड़ा है. तो, भारतीय राजनीति की भविष्य की रूपरेखा के लिए इसके क्या मायने हैं? कांग्रेस के लगातार पतन से यह बात चल पड़ी है कि आप 'विकल्प' बन रही है. बेशक, पार्टी दशक भर पहले वाली अपनी लोकप्रियता की ऊंचाई के आसपास भी नहीं है मगर वह अपनी बांहें उस ओर फैला रही है. डिप्टी एडिटर कौशिक डेका ने उसके लंबे सफर का जायजा लिया है, मगर देश अभी भी आप के लिए काफी कुछ अनजाना है.

जब हम 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले होने वाले 11 राज्यों के चुनाव की ओर बढ़ रहे हैं तो यह लगातार साफ होता जा रहा है कि हम मोदी गणतंत्र के वासी हैं, जैसा कि हमने केंद्र में भाजपा की दोबारा जीत के बाद 5 जून, 2019 की अपनी आवरण कथा में कहा था. फिलहाल लगता है कि सिर्फ और सिर्फ मोदी का दौर है.

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