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प्रधान संपादक की कलम से

महामारी की दशा-दिशा 2022 में दुनिया भर में आर्थिक बहाली तय करने में सबसे अहम होगी. इन चिंताओं के साथ ही भारत के लिए तीसरा संकट चीन से निबटना है.

20 जनवरी, 2021 का आवरण 20 जनवरी, 2021 का आवरण

अरुण पुरी

हमने 2022 में तमाम आशंकाओं-अंदेशों के साथ कदम रखा है क्योंकि नया साल भी काफी कुछ बीते साल जैसा ही लग रहा है. कोविड-19 के मामले फिर बढ़ रहे हैं और नॉवेल कोरोनावायरस का खासा संक्रामक स्ट्रेन दुनिया भर में फैल रहा है. अच्छी बात यही है कि दो साल बाद कोविड कोई अबूझ बीमारी नहीं रह गया है.

हम इस दैत्य के हाव-भाव से वाकिफ हैं और इसका बदतर हमला पिछले साल देख चुके हैं. इसके डेल्टा वेरिएंट का प्रकोप देश भर में फैल गया था. संक्रमण की दूसरी लहर मेडिकल ऑक्सीजन की भारी किल्लत और ब्लैक फंगस के मामलों से जानलेवा हो गई, जिसमें देश में करीब 2,00,000 लोग जान गंवा बैठे. अब वैक्सीन के भरपूर भंडार और सरकार के बूस्टर डोज कार्यक्रम से हमारी तैयारी पुख्ता है.

कोविड-19 दुनिया भर में 54 लाख लोगों की जान ले चुका है, जो 1918 में इन्फ्लूएंजा महामारी से हुई अनुमानित 5 करोड़ मौत का दसवां हिस्सा ही है, जिसे 'स्पैनिश फ्लू’ भी कहा जाता है. उसका प्रकोप दो साल रहा था और उसके संक्रमण के चपेट में मानव आबादी का एक-तिहाई हिस्सा आया था.

कोविड का नया ओमिक्रॉन स्ट्रेन तमाम उपलब्ध सबूतों के आधार पर डेल्टा से कम घातक है. यह थोड़ी राहत की बात है. हालांकि हम अभी भी महामारी के दौर में हैं, पर काफी बेहतर हालात में लगते हैं. लेकिन इससे हम बेपरवाह कतई न हों. वायरस शायद ही उस तरह से बर्ताव करता है, जैसा हम चाहते हैं. एक अध्ययन से पता चलता है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था कोविड-19 की वजह से करीब 30 खरब डॉलर (223 लाख करोड़ रु.) गंवा सकती है.

2022 में अर्थव्यवस्था के 4.3 फीसद दर से बढ़ने का अनुमान है, जो पिछले साल के 5.8 फीसद (2020 में -3.3 फीसद से उठकर) से थोड़ा कम है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) का अनुमान है कि अनेक मौतों की वजह से वैश्विक जीडीपी में घाटा पांच साल में 53 खरब डॉलर (393 लाख करोड़ रु.) तक जा सकता है. भारत को अगर ज्यादा लोगों को गरीबी से ऊपर उठाना है तो मजबूत आर्थिक वृद्धि बेहद जरूरी है.

महामारी की दशा-दिशा 2022 में दुनिया भर में आर्थिक बहाली तय करने में सबसे अहम होगी. इन चिंताओं के साथ ही भारत के लिए तीसरा संकट चीन से निबटना है. मई 2020 में दबंगई पर उतारू चीन ने तीन दशकों के शांति और सौहार्द के प्रोटोकाल को तोड़ दिया और पूर्वी लद्दाख की सीमा पर भारी सैनिक तैनात कर दिए, जिसमें दोनों पक्ष उलझे हुए हैं. सेहत, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा की चिंताओं के अलावा 2022 में कई दूसरे मसले भी राजनैतिक प्रतिष्ठानों के दिमाग में हावी रहेंगे.

इस साल हम अपनी आजादी की 75वीं वर्षगांठ का जश्न मनाएंगे. इस साल राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे. भाजपा इनमें छह राज्यों में सत्ता में है, जिसमें प्रधानमंत्री का गृह राज्य गुजरात भी है. इनमें सत्ता विरोधी रुझानों से निबटने की पार्टी की रणनीति पर करीबी नजर रहेगी.

हालांकि इस साल और आगे भी कई दीर्घकालिक चिंताएं हैं. हमारा विशेषांक '2022: उम्मीद और अंदेशे’ इन चिंताओं पर अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञों के पैनल के नजरिए से गौर करता है. इसका संयोजन एडिटर (फीचर) काइ फ्रीज ने किया है. मसलन, विषाणु वैज्ञानिक गगनदीप कंग का कहना है कि नीतिगत समर्थन के साथ विज्ञान और सार्वजनिक स्वास्थ्य को अग्रिम मोर्चे पर लाने की जरूरत है, क्योंकि सार्स-कोव-2 के वेरिएंट की वैश्विक लहर का खतरा मिटने वाला नहीं है.

ञ़चीन के जानकार एंड्रयू स्मॉल बताते हैं कि मुश्किलें बढ़ाने की बीजिंग की भूख पहले से ज्यादा बढ़ी है और वह विभिन्न मोर्चों पर दुश्मनी के रिश्तों को ही अच्छा मानता है. पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन का मानना है कि 2022 अधिक अप्रत्याशित होगा. वे इस साल भारत से 'ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी’ और विभिन्न आर्थिक समझौतों वाले ब्लॉक से रिश्ते मजबूत करने की उम्मीद करते हैं. इनमें रीजनल कॉम्प्रीहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) और एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिक कोऑपरेशन जैसे ब्लॉक प्रमुख है. 

अर्थशास्त्री जहांगीर अजीज अगले कुछ साल में नजर रखने के लिए पांच बड़े पैमानों का जिक्र करते हैं. ये पैमाने हैं: कोविड-19 का सामान्य बीमारी में तब्दील होना, भविष्य के ऊर्जा स्रोत पर सीओपी26 की प्रतिबद्धताओं का असर, चीन में बड़े नीतिगत बदलाव, कोविड महामारी से होने वाला स्थायी नुक्सान, और वैश्विक चुनावी परिदृश्य. पर्यावरणविद् सुनीता नारायण के मुताबिक, वक्त आ गया है कि भारत जलवायु परिवर्तन के टिकाऊ, किफायती और अधिक ऊर्जा सक्षम मॉडल की रूपरेखा तैयार करके प्रदूषण के बिना बढ़ोतरी का तरीका तलाशे.

पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन और शोधकर्ता श्वेता सैनी का मानना है कि केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन को कृषि सुधारों के खात्मे की तरह नहीं देखा जाना चाहिए. टेक्नोलॉजिस्ट रोहन मूर्ति के लिए 2022 का बड़ा मुद्दा लोगों के काम में ज्यादा सहूलियत की खातिर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा.

भाजपा का मूल वैचारिक संगठन आरएसएस 2025 में अपने गठन की सौवीं वषगांठ मनाएगा. आरएसएस के विचारक राम माधव के मुताबिक, संगठन की चुनौती अपने गर्व और गुस्से में संतुलन कायम करना होगा और पक्का करना होगा कि कोई एक-दूसरे पर हावी न हो. लेखक तथा तृणमूल कांग्रेस नेता पवन वर्मा की दलील है कि 'हिंदुत्व’ का मकसद हिंदू धर्म के समावेशी और सामंजस्य के भाव को बदलना है.

ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (पब्लिशिंग) राज चेंगप्पा मोदी सरकार को आर्थिक सुधारों पर आगे बढ़ने की जरूरत पर जोर देते हैं. वरिष्ठ वकील अरविंद पी. दातार का कहना है कि भारत पश्चिमी लोकतंत्रों की बराबरी करने की ख्वाहिश रखता है तो उसे अदालतों और न्यायाधिकरणों की संस्थागत आजादी को मजबूत करना चाहिए. वैश्वीकरण विशेषज्ञ पराग खन्ना के मुताबिक, प्रवासी भारतीय दुनिया को नया आकार दे रहे हैं. आखिर में खेल पत्रकार शारदा उगरा की भविष्यवाणी है कि नए साल में सभी खेलों में भारतीय एथलीटों का उभार दिखेगा.

वाकई यह बेहतरीन लेखकों का नक्षत्रमंडल है और अगर आप देश और दुनिया की दिख रही या दिखने वाली दिशा जानने की ख्वाहिश रखते हैं, तो इस विशेषांक को जरूर पढ़िए और आनंद उठाइए.


 

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