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प्रधान संपादक की कलम से

धन और टेक्नोलॉजी का सवाल भी है. विकासशील देशों के पास स्वच्छ ऊर्जा टेक्नोलॉजी या उनकी कीमत चुकाने के लिए धन नहीं है.

23 दिसंबर, 2009 का आवरण 23 दिसंबर, 2009 का आवरण

अरुण पुरी

एक अमेरिकी जियोकेमिस्ट ने हमें 1975 में हमारे सबसे महत्वपूर्ण मुहावरों में से एक दिया—ग्लोबल वार्मिंग. अपने शोध पत्र 'क्लाइमेट चेंज: आर वी ऑन द ब्रिंक ऑफ ए प्रोनाउंस्ड ग्लोबल वार्मिंग?’ में वॉलेस स्मिथ ब्रोकर ने भविष्यवाणी की कि वायुमंडल की कार्बन डाइऑक्साइड में कई गुना बढ़ोतरी पृथ्वी के औसत तापमान को पिछले 1,000 वर्षों में अनुभव किए गए तापमानों से ऊपर पहुंचा देगी.

इस साल हमें उस प्रश्न का दोटूक उत्तर मिला जो ब्रोकर ने 46 साल पहले पूछा था: क्या हम ग्लोबल वार्मिंग की कगार पर हैं? इसी अगस्त में जारी आइपीसीसी (इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज) की रिपोर्ट कहती है कि पिछला दशक (2011-2020) बीते 1,25,000 वर्षों के किसी भी दौर से ज्यादा गर्म था.

जैसा कि पहले अनुमान था, इस सदी के अंत में नहीं बल्कि 2050 में ही धरती खतरनाक बिंदु पर पहुंच जाएगी. बहुत कम मालूम देती इस बढ़ोतरी के संभवत: भीषण नतीजे होंगे और बाढ़, भारी बारिश और सूखे जैसी विनाशकारी मौसमी घटनाएं बढ़ जाएंगी और समूची प्रजातियों का नामो-निशान मिट जाएगा.

ग्लासगो में चल रहे संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन सीओपी26 के पहले दिन विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की ओर से जारी रिपोर्ट कहती है कि वैश्विक समुद्री जलस्तर का बढ़ना 2013 से तेज होकर 2021 में नई ऊंचाई पर पहुंच गया, साथ ही 'महासागरों में निरंतर तापमान वृद्धि और अम्लीकरण’ भी.

जलवायु ज्यादा गर्म और अजीब होती जा रही है. इससे जानें जा रही हैं और लोगों की आजीविका भी. अमेरिका में समुद्री तूफानों और दावानलों से लेकर जापान में ग्रीष्म लहरों और तमिलनाडु तथा केरल को तहस-नहस करती बाढ़ तक दुनिया विनाशकारी मौसमी बदलावों से घिरी है.

ध्रुवीय बर्फ के टुकड़े पिघलकर गिर रहे हैं. महासागर के बढ़ते स्तर का मतलब है कि बांग्लादेश सरीखे राष्ट्रों और मालदीव सरीखे द्वीपीय देशों के इस सदी के अंत तक डूबने का खतरा मंडरा रहा है. मुंबई, चेन्नै और कोलकाता सरीखे तटीय शहरों का भी यही हश्र हो सकता है. 

हमें अब भी नहीं मालूम कि 2020 में अचानक आ धमकी कोविड-19 की वैश्विक महामारी प्राकृतिक प्रकोप थी या प्रयोगशाला से रिसकर आई थी. मगर जलवायु परिवर्तन के बारे में ऐसा कोई संशय नहीं. वैश्विक तापमान वृद्धि के लिए मानव जाति ही पूरी तरह जिम्मेदार है. पिछली दो सदियों में कोयले, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधन बेभाव फूंके गए, जिससे तथाकथित ग्रीनहाउस गैसें कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन उत्पन्न हुईं.

अपने वाहनों में हम जो ईंधन जलाते हैं, हमारे बिजली संयंत्रों को जो कोयला आग देता है और अपने शहर और खेत बनाने के लिए हम जिन जंगलों का सफाया करते हैं, उन्होंने अरबों टन ऐसी गैसें छोड़ीं. इन गैसों से घिरकर पृथ्वी ग्रीनहाउस बन गई है और इससे निकलने को छटपटाती सूरज की गर्मी तापमान बढ़ा रही है. संक्षेप में, यह प्रलय है जो ऐन हमारे सामने खड़ा है.

यह बात भी स्पष्ट है कि ऊर्जा की खपत विकास की कुंजी है. देश अपने लोगों के लिए ऊर्जा की व्यवस्था किए बगैर उन्हें गरीबी से नहीं निकाल सकते. तेल और कोयला सर्वाधिक दोषी इसलिए हैं क्योंकि वे सस्ते और बहुतायत से उपलब्ध हैं और उनसे ऊर्जा पैदा करना आसान है. नतीजा यह कि उत्सर्जन बढ़ते जाते हैं.

साल 2050 तक ग्लोबल नेट जीरो—जितनी कार्बन उत्सर्जित हो उतनी ही हटा दी जाए—न्यूनतम जरूरत है जो तापमान को 1.50 सेल्सियस से ऊपर बढ़ने न देने के लिए हमें चाहिए ही. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीओपी26 में महत्वाकांक्षी प्रतिबद्धताएं घोषित कीं.

भारत 2030 तक गैर-जीवाश्म ऊर्जा उत्पादन क्षमता (मौजूदा 150 गीगावाट से) 500 गीगावाट तक बढ़ाएगा, अपने कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में एक अरब टन की कटौती करेगा और 2070 तक पूरी तरह कार्बन न्यूट्रल—जब वायुमंडल में रत्ती भर भी यह गैस न छोड़ें—बनने की ओर कदम बढ़ाएगा.

इतने महत्वाकांक्षी लक्ष्य हम कैसे हासिल कर सकते हैं? ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (पब्लिशिंग) राज चेंगप्पा ने 1992 का रियो शिखर सम्मेलन कवर किया था, जो जलवायु परिवर्तन को सामने लाने वाले पहले सम्मेलनों में था. उन्होंने हमारी आवरण कथा 'कैसे बचेगी धरती’ लिखी है.

यह लक्ष्य हासिल करने में मददगार 10 पहलकदमियों की पड़ताल करती है. बीते कुछ दशकों में अनगिनत बार कयामत के दृश्य प्रस्तुत किए गए हैं, पर स्थिति बदतर ही होती गई. यह आवरण कथा बताती है क्या करने की जरूरत है. इलेक्ट्रिक कारों के लिए बैटरियों में सुधार से लेकर सौर पैनलों को बेहतर बनाने और कोयले से शून्य-कार्बन ईंधन के सफर में गैस को वैकल्पिक ईंधन बनाने की संभावनाओं की पड़ताल करने तक समाधान कई हैं.

फिर ग्रीन टेक्नोलॉजी का प्रयोग कर रहे विकासशील देशों की आर्थिक सहायता का मुद्दा है, जिसके लिए विकसित देशों को बड़े पैमाने पर वित्तीय सहयोग देना ही चाहिए. अंत में, हमें इस पर भी विचार करने की जरूरत है कि अगर हमें अपने ग्रह को आसन्न विनाश से बचाना है तो दुनिया भर की सरकारों को नीति और महत्वाकांक्षा के लिहाज से किस तरह साथ मिलकर काम करना चाहिए.

और भी कई अहम और विवादित मुद्दे हैं, जिनका समाधान जरूरी है. पहला, जलवायु न्याय और अंधाधुंध क्षति का मसला है. अपने विकास की गरज से विकसित देश हमें पर्यावरण विनाश की कगार पर ले आए हैं. अब भी ज्यादातर कार्बन उत्सर्जन विकसित दुनिया से हो रहा है, पर उसके नतीजों का दंश अल्पविकसित दुनिया को भुगतना पड़ रहा है.

धन और टेक्नोलॉजी का सवाल भी है. विकासशील देशों के पास स्वच्छ ऊर्जा टेक्नोलॉजी या उनकी कीमत चुकाने के लिए धन नहीं है. विकसित देशों ने 2009 में जलवायु कार्यकलापों के लिए विकासशील दुनिया को 2020 से हर साल 100 अरब डॉलर देने का वादा किया था, जो अब तक पूरा नहीं हुआ.

ये गतिरोध दूर किए बगैर हम आगे नहीं बढ़ पाएंगे. पृथ्वी को बचाना जरूरी है. हम अभी पूरी गंभीरता और शक्ति से कदम नहीं उठाते, तो हमारी भावी पीढ़ियों को निष्ठुर और विनाशकारी भविष्य का सामना करना होगा. और वे हमें कभी माफ नहीं करेंगी.

 

16 दिसंबर, 2015  का आवरण
 

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