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प्रधान संपादक की कलम से

कोई नहीं कह सकता कि हमारी दंड व्यवस्था के सुधारों को अंजाम देने में अभी और कितने दिन लगेंगे और कितने मनुष्यों की बलि ली जाएगी. मगर हमें सच्चा लोकतंत्र बनना है तो बेहद जरूरी है कि इन सुधारों को जल्द से जल्द अंजाम दिया जाए

भारत में क्यों है कैदियों की सबसे बड़ी आबादी? भारत में क्यों है कैदियों की सबसे बड़ी आबादी?

अरुण पुरी

जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर ने अपने कार्यकाल में कई ऐतिहासिक फैसले दिए. 1977 के अपने ऐसे ही एक फैसले में उनके शब्द थे, ''बुनियादी नियम जमानत है, जेल नहीं.'' वे अनुच्छेद 21 की व्याख्या कर रहे थे कि हिरासत नियम क्यों नहीं होना चाहिए. यह अनुच्छेद व्यक्ति को स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है.

आज हालत यह है कि हमारी लचर न्याय व्यवस्था का दंश विचाराधीन कैदियों को झेलना पड़ता है—यानी उन लोगों को जिन्हें कानून के उल्लंघन के संदेह में पकड़कर जेल में डाल दिया जाता है, लेकिन जिन्हें दोषी साबित होने तक निर्दोष माना जाना चाहिए. इस समय देश भर की जेलों में 3,30,487 विचाराधीन कैदी हैं. यह संख्या लद्दाख की आबादी से भी ज्यादा है. जिनका अपराध अभी साबित होना है, ऐसे विचाराधीन कैदी भारत की जेलों में बंद लोगों की कुल तादाद के 69 फीसद हैं और इससे एक और सचाई उजागर होती है. भारत में न्याय का पहिया अक्सर इतना धीमे घूमता है कि प्रक्रिया ही सजा बन जाती है. अंधाधुंध गिरफ्तारी, जांच में देरी और गिरता-लुढ़कता मुकदमा कैद की मियाद बढ़ाने में योगदान देता है. जमानत अपवाद बन गई है, नियम नहीं. विधि आयोग ने चार साल पहले एक रिपोर्ट में लिखा था कि भारत में महज 28 फीसद यानी औसतन तीन में से एक आरोपी को जमानत मिलती है.

2002 के अक्षरधाम आतंकी हमले के आरोपी छह लोगों को सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में बरी कर दिया. तब तक वे जेल में 10 साल बिता चुके थे. पिछले साल मार्च में सूरत की एक अदालत ने 127 लोगों को आतंक के आरोपों से बरी कर दिया. 20 साल की कैद के बाद वे आजाद हुए.

अक्सर कमजोर आधार पर जमानत देने से इनकार कर दिया जाता है. सवाल हमें यह पूछना चाहिए कि गंभीर बीमारियों के शिकार मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, छात्रों और कारोबारियों को मुकदमे से पहले लंबे वक्त के लिए जेलों में रखने की जरूरत आखिर क्यों है? अगर 90 दिनों के भीतर आरोपपत्र दाखिल नहीं किया जाता तो कानून जमानत का अधिकार देता है. पुलिस इस नियम का उल्लंघन करती है, क्योंकि गरीब और अनपढ़ अक्सर अपने अधिकार से वाकिफ नहीं होते. सरकार की मुफ्त कानूनी सहायता आरोपपत्र दाखिल होने और मुकदमा शुरू होने के बाद लागू होती है. मुकदमा शुरू होने में तो अंतहीन वक्त लगता ही है.

नामचीन आरोपियों को एनडीपीएस (नार्कोटिक्स ड्रग्स ऐंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस), यूएपीए (अनलॉफुल एक्टिविटीज—प्रीवेंशन—अमेंडमेंट) और पीएमएलए (प्रीवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग ऐक्ट) सरीखे विशेष कानूनों के सख्त प्रावधानों के जाल में फंसा लिया जाता है, जिनमें अभियोजन कानूनी प्रावधानों के सहारे हमेशा जमानत का विरोध करता है. इससे न्यायशास्त्र की बुनियादी मान्यता—दोष सिद्ध होने तक आरोपी निर्दोष है—उलट जाती है.
हमारी न्याय व्यवस्था के कमजोर होने की वजह खोजने के लिए दूर जाने की जरूरत नहीं.

भारतीय दंड प्रक्रिया पुलिस, न्यायपालिका और जेलों के तिपाये पर टिकी है. तीनों ही पाये बहुत ज्यादा बोझ से दबे और अशक्त हैं और इसलिए समुचित काम नहीं कर पाते. संयुक्त राष्ट्र प्रति एक लाख लोगों पर 222 पुलिसकर्मियों की सिफारिश करता है. मगर भारत में प्रति एक लाख आबादी पर महज 137 पुलिसकर्मी हैं. न्यायपालिका में भी कर्मचारियों की घोर कमी है. भारत में प्रति दस लाख आबादी पर 21 न्यायाधीश हैं, जबकि चीन में 147 और अमेरिका में 102. करीब 120 फीसद की ऑक्युपेंसी रेट के साथ भारत की 1,350 जेलें खचाखच भरी हुई हैं. ये कैदी अमानवीय हालात में रहते हैं, जिनमें ज्यादातर विचाराधीन हैं.

गिरफ्तारी के हथियार का इस्तेमाल बगैर सोचे-विचारे किया जाता है. राष्ट्रीय पुलिस आयोग ने 1980 में 60 फीसद गिरफ्तारियों को गैरजरूरी और जेल के 42 फीसद खर्चों के लिए जिम्मेदार बताया था और गिरफ्तारियों के लिए दिशानिर्देश तय किए थे. 2010 में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41 को संशोधित करके कुछ निश्चित प्रावधान स्पष्ट किए गए कि बस इन्हीं के तहत किसी को गिरफ्तार किया जा सकता है. उनमें एक निर्देश यह था कि केवल सात साल कैद की सजा वाले मामलों में ही गिरफ्तार किया जाए. मगर आंकड़ों से पता चलता है कि मजिस्ट्रेट और पुलिस अफसरों को इस संशोधन का पालन अभी करना है.

निचली अदालतों में तीन साल से कम सजा वाले छोटे-मोटे अपराधों में भी जमानत की धनराशि 10,000 रुपए है. यह 57 फीसद भारतीयों की मासिक आमदनी से ज्यादा है.

भारत की दंड प्रक्रिया संहिता सुधारों के लिए छटपटा रही है. विधि आयोग ने पच्चीस साल पहले जमानत पर विचार करने के लिए दर्जन भर पहलुओं का जिक्र किया था. उसने सिफारिश की थी कि जमानत की अर्जियों पर फैसला लेते वक्त जज अपराध की गंभीरता, आरोपों के स्वरूप, आरोपी की हैसियत, उनकी पृष्ठभूमि तथा सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका, और निर्दोष होने की संभावना पर विचार करें. उसने स्पष्ट किया कि केवल अंतिम उपाय के तौर पर ही आर्थिक स्थितियों पर ध्यान दिया जाए और प्रस्ताव रखा कि विकल्प के तौर पर आरोपी की पहचान के मूल दस्तावेज अदालत में जमा करवाए जा सकते हैं. बदकिस्मती से इनमें से एक भी सिफारिश सीआरपीसी में नहीं जोड़ी गई.

हमारी आवरण कथा 'जमानत या जेल?' न्याय प्रणाली की खामियों का जायजा लेती है और इस बात की भी पड़ताल करती है कि दुनिया में विचाराधीन कैदियों की सबसे बड़ी आबादी आज भी आखिर भारत में क्यों है? इसे डिप्टी एडिटर कौशिक डेका ने लिखा है.

न्यायमूर्ति अय्यर सात साल पहले 99 साल की उम्र में गुजर गए. थोड़े अफसोस के साथ शायद आज भी उन्होंने कहा होता कि अब भी जमानत की बजाए जेल ही नियम बना हुआ है. उनके एक महान उत्तराधिकारी न्यायमूर्ति डी.वाइ. चंद्रचूड़ ने हाल में अपने साथियों से इस बात को लेकर सजग रहने को कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं की पहली रक्षा पंक्ति वे ही हैं—''किसी को उसकी स्वतंत्रता से एक दिन के लिए भी वंचित करना ज्यादती है.'' कोई नहीं कह सकता कि हमारी दंड व्यवस्था के सुधारों को अंजाम देने में अभी और कितने दिन लगेंगे और कितने मनुष्यों की बलि ली जाएगी. मगर हमें सच्चा लोकतंत्र बनना है तो बेहद जरूरी है कि इन सुधारों को जल्द से जल्द अंजाम दिया जाए.

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