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प्रधान संपादक की कलम से

भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार दूसरे साल आइसीयू में है. पिछले वित्त वर्ष में यह 7.3 फीसद संकुचित हुई, जो 1979-80 में जीडीपी के 5.2 फीसद सिकुड़ने के बाद पहला पूरे साल का संकुचन था.

17 फरवरी, 2021 का आवरण 17 फरवरी, 2021 का आवरण

अरुण पुरी

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल की शुरुआत में दो सूत्रवाक्यों ने काफी आशाएं जगाई थीं. वे थे 'न्यूनतम सरकार, अधिकतम राजकाज’ और 'कारोबार में होना सरकार का कारोबार नहीं’. यह सुनकर मेरे कानों में शहद घुल जाता था. भारतीय राज्यसत्ता लंबे समय से अर्थव्यवस्था की 'कमांडिंग हाइट्स’ या नियंत्रणकारी हिस्सों पर काबिज थी. कुछ तो नियंत्रणकारी भी नहीं थे, मसलन, होटल और एयरलाइंस.

ज्यादातर नाकारा और सरकारी खजाने को खोखला करने वाले थे. दुर्भाग्यवश विपक्ष के 'सूट-बूट की सरकार’ ताने ने पहले कार्यकाल के उन सूत्रवाक्यों पर विराम लगा दिया. हालांकि सरकार माल और सेवा कर (जीएसटी) और ऋणशोधन अक्षमता तथा दिवाला संहिता (आइबीसी) सरीखे बहुत जरूरी सुधार लाई.

इस साल 24 फरवरी को निवेश और सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री को यह ऐलान करते सुनना उत्साहवर्धक था कि ''सरकार जब एक संपत्ति विशेष का मुद्रीकरण करती है, तो उसकी जगह देश का निजी क्षेत्र ले लेता है. निजी क्षेत्र निवेश के साथ बेहतरीन वैश्विक प्रथाएं भी लेकर आता है. यह सबसे अव्वल गुणवत्ता का मानवबल लाता है और प्रबंधन का कायापलट कर देता है.

वह उस क्षेत्र का तेजी से विस्तार करता है और नौकरियों के नए अवसर रचता है.’’ प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर ध्यान दिया और इस साल के केंद्रीय बजट में विनिवेश की बात कही गई. सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान आज 'मुद्रीकरण’ और 'विनिवेश’ शब्दों को खुलकर प्रयोग करता है, जो पहले अभिशाप होता. विचारधारा बरतरफ, इस दिशा में सरकार की बड़ी कोशिश की अच्छी वजह भी है.

भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार दूसरे साल आइसीयू में है. पिछले वित्त वर्ष में यह 7.3 फीसद संकुचित हुई, जो 1979-80 में जीडीपी के 5.2 फीसद सिकुड़ने के बाद पहला पूरे साल का संकुचन था. रही-सही उम्मीदों को इस अप्रैल में कोविड-19 महामारी की दूसरी जानलेवा लहर ने तहस-नहस कर दिया, जब चौथी तिमाही में अर्थव्यवस्था 1.6 फीसद की दर से बढ़ी. वित्त वर्ष 2022 की पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था अपनी सबसे तेज दर 20.15 फीसद से बढ़ी, लेकिन यह पिछले साल के निम्न आधार के कारण था.

इसी वित्तीय संकट के चलते सरकार ने अब संपत्ति मुद्रीकरण जैसे गैरमामूली उपायों का सहारा लिया है, जिसमें वह संसाधन उगाहने के लिए अपनी परिसंपत्तियां निजी क्षेत्र को लीज पर देगी. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 23 अगस्त को राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन (एनएमपी) का ऐलान किया, जिसके लिए सरकार ने 12 मंत्रालयों और महकमों से जुड़े 13 क्षेत्रों की पहचान की है जिनमें 20 परिसंपत्ति वर्ग हैं.

निजी क्षेत्र सड़कों पर टोल वसूल सकता है, सरकार की बनाई पटरियों पर ट्रेन दौड़ा सकता है, रेलवे स्टेशन चला सकता है, बिजली उत्पादन और पारेषण लाइनों से राजस्व जमा कर सकता है, गोदाम और टेलीकॉम टावर संभाल सकता है और हवाई अड्डों का संचालन कर सकता है. सरकार का मनसूबा इस इन्फ्रास्ट्रक्चर को लीज पर देकर अगले चार सालों में 6 लाख करोड़ रुपए जुटाना है. उसे उम्मीद है कि सड़कों (1.6 लाख करोड़ रु.), रेलवे (1.52 लाख करोड़ रु.), बिजली पारेषण (45,200 करोड़ रु.) और बिजली उत्पादन (39,832 करोड़ रु.) से बड़ी कमाई होगी.

इसमें से कुछ कमाई का इस्तेमाल सरकार अगले पांच वर्षों में बुनियादी ढांचे को उन्नत बनाने और कनेक्टिविटी बढ़ाने की खातिर 111 लाख करोड़ रु. की राष्ट्रीय इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन सरीखी महत्वाकांक्षी योजनाओं के लिए करेगी. उसे 2024 तक हर गांव में नल का जल पहुंचाने के लिए 3.6 लाख करोड़ रु. की जल जीवन मिशन सरीखी मौलिक सामाजिक योजनाओं के लिए भी धन चाहिए.

संपत्ति मुद्रीकरण सराहनीय विचार है, लेकिन हम पहले भी देख चुके हैं कि कमी नारों और विचारों की नहीं है; नाकामी उन पर अमल में है. अपने नारों को जमीन पर उतारने के मामले में सरकार का रिकॉर्ड मिला-जुला रहा है. 2020-21 में सरकार 2.1 लाख करोड़ रु. के नियोजित विनिवेश लक्ष्य का बस दसवां हिस्सा ही जुटा सकी.

वह भी तब जब शेयर बाजारों में तेजी थी. मार्च 2020 की 31 तारीख तक कुल जमा 70,820 करोड़ रु. के घाटे से दबे एयर इंडिया सरीखे भीतर से सड़ते पीएसयू बिके नहीं हैं. भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लि. (बीपीसीएल), कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, सार्वजनिक क्षेत्र के दो बैंकों और एक सामान्य बीमा कंपनी सरीखे दूसरे पीएसयू की अधर में लटकी बिक्री इरादे और अमल के बीच विशाल खाई का प्रमाण है. 

सरकार को इस अभियान के पीछे अपने इरादों के बारे में स्पष्ट होना चाहिए. यह महज इसलिए किया जा रहा है कि पैसों की किल्लत है, या वे दिल से मानते हैं कि देश के हित में यही सबसे अच्छा है? जवाब तय करेगा कि वे उस निकम्मी अफसरशाही पर पूरा जोर डालने के लिए कितनी सख्ती से तैयार हैं, जिसकी बुनियादी फितरत यथास्थिति की हिफाजत करना है, क्योंकि वे अपनी जागीर के बड़े हिस्से पर हुकूमत गंवा बैठेंगे.

असल खेल बारीकियों में है. मुद्रीकरण की शर्तों को वे इतना सक्चत बना सकते हैं कि यह बोली लगाने की खातिर किसी के लिए भी आकर्षक न रह जाए. राजस्व उगाहने के अलावा सरकार में यह विश्वास होना ही चाहिए कि निजी हाथों में सौंपे जा रहे संसाधनों का इस्तेमाल ज्यादा दक्षता से और देश के फायदे में होगा.

विवाद तो खैर होंगे कि संपत्तियों का मूल्य निर्धारण कैसे किया गया है. विपक्ष सरकार को घर की बेशकीमती चीजें बेचने और कुछेक कुलीनों के आधिपत्य पैदा करने का आरोप भी लगाएगा. सरकार को विरोधों का डटकर मुकाबला करना और यह अफसाना भरोसेमंद ढंग से लोगों के गले उतारना होगा कि यह उपभोक्ता और देश के फायदे के लिए ही है.

हमारी आवरण कथा 'निजीकरण की जोरदार पहल’ सरकार की संपत्ति मुद्रीकरण नीति की पड़ताल करती है. इसे एग्जीक्यूटिव एडिटर एम.जी. अरुण और डिप्टी एडिटर श्वेता पुंज ने लिखा है.

हालिया इतिहास में ऐसे काफी उदाहरण हैं जो बताते हैं कि अर्थव्यवस्था पर सरकार-नियंत्रित कंपनियों का दबदबा आम तौर पर दरअसल मौत का शिकंजा होता है. चीन सरीखे कट्टरपंथी कम्युनिस्ट देश को अपनी अर्थव्यवस्था निजी उद्यमों के लिए खोलनी पड़ी, ताकि वह वृद्धि के रास्ते पर बढ़ सके. 1978 में यह कदम उठाने के बाद उनका जीडीपी सालाना 10 फीसद की औसत दर से बढ़ा. इसकी बदौलत 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को गरीबी से निकाला गया.

1978 में चीन की प्रति व्यक्ति आय 156.4 डॉलर और भारत की 205.6 डॉलर थी. 2020 में भारत की प्रति व्यक्ति आय 1,900 डॉलर और चीन की 10,500 डॉलर थी. चीनी सुधारों के महान वास्तुशिल्पी देंग श्याओ पिंग का मशहूर कथन है: ''बिल्ली जब तक चूहे पकड़ती है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह काली है या सफेद.’’

प्रधानमंत्री को भी यह चिंता नहीं करनी चाहिए कि उनके आलोचक उनकी बिल्ली को किस रंग का कहेंगे. उन्हें बहुप्रतीक्षित सुधार की राह पर पक्के इरादे से आगे बढ़ना चाहिए और भारतीय अर्थव्यवस्था को हमारे विनाशकारी सोशलिज्म दौर की आखिरी निशानियों से आजाद कर देना चाहिए.

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