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प्रधान संपादक की कलम से

यह देखने के लिए 2018 में गठित रोहिणी आयोग ने पाया कि करीब 6,000 ओबीसी जातियों और समुदायों में सिर्फ 40 ही आरक्षण का 50 फीसद लाभ उठाती हैं.

17 मई, 2006 का आवरण 17 मई, 2006 का आवरण

अरुण पुरी

चाहे हम जितना इनकार करें, देश आजादी के 75 साल और काफी  आर्थिक तरक्की के बाद भी जाति में फंसा समाज है. यह हमारे समाज और सबसे बढ़कर हमारी राजनीति में रचा-बसा है. अमूमन कहा जाता है, भारत के लोग अपना वोट नहीं देते, बल्कि अपनी जाति को वोट देते हैं. जाति और राजनीति के इस मेल को ज्यादातर निहितस्वार्थी नेता हमेशा बनाए रखना चाहते हैं.

1989-90 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह के मंडल आयोग पर अमल करने के फैसले के बाद देशव्यापी विरोध उठ खड़ा हुआ तो जाति की राजनीति केंद्रीय राष्ट्रीय मंच पर आ धमकी. उनका फैसला सामाजिक न्याय के प्रति लगाव से नहीं, बल्कि अपनी गठजोड़ सरकार को बचाए रखने की चतुर गणना से प्रेरित था. उस फैसले ने 27 फीसद सरकारी नौकरियों को ओबीसी या अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित कर दिया.

वह राष्ट्रव्यापी जाति वोट बैंक बनाने की शुरुआती कोशिश थी. संविधान ओबीसी को मान्यता देता है, मगर उसने यह तय करने का जिम्मा राज्यों पर छोड़ दिया कि वे कौन हैं. वर्षों के अंतराल में ये जातियां राजनैतिक और आर्थिक तौर पर ताकतवर हो गईं लेकिन शिक्षा और सरकारी नौकरियों से खुद को वंचित पाती हैं इसलिए आरक्षण की मांग कर रही हैं. मंडल आयोग के जाति आधारित आरक्षण को विभाजनकारी मानने वाली भाजपा ने अपने हिंदू वोट बैंक को गोलबंद करने के लिए राम मंदिर आंदोलन छेड़ दिया.

इस बीच, मंडल के बाद के दौर में हरेक ओबीसी जाति केंद्रित राजनैतिक पार्टियों का उदय देखा गया. माना जाता है कि ओबीसी आबादी का करीब 52 फीसद हैं. यह आंकड़ा लंबे समय से जांचा-परखा नहीं गया है क्योंकि आखिरी जाति आधारित जनगणना 1931 में हुई थी. यहां तक कि 1980 के मंडल  आयोग ने भी 1931 के जनगणना के आंकड़ों को ही आधार बनाया.

मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के तीन दशक बाद ओबीसी फिर सुर्खियों में हैं. 2018 में केंद्र सरकार ने कहा कि वह हर दशक में एक बार जनगणना की प्रक्रिया में इस बार जाति की गणना भी करेगी. हालांकि इस जुलाई में वह मुकर गई और कहा कि जाति आधारित जनगण्ना नहीं करेगी.

इसकी वजहें जानना कोई मुश्किल नहीं है. राजनैतिक रूप से अहम उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव महज छह महीने दूर हैं. सरकार को डर है कि जाति-समीकरण में छेड़छाड़ से उसे ऊंची जातियों की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है और सत्ता में वापसी की उसकी संभावना गड़बड़ा सकती है. इसके अलावा, जाति की संख्या में कोई ऊंच-नीच बर्र के छत्ते को छेड़ना जैसा है, जिससे न सिर्फ केंद्र और राज्यों में 90 लाख सरकारी नौकरियों में, बल्कि 23 लाख इंजीनियरिंग और तकरीबन 80,000 मेडिकल कॉलेजों की सीटों में भी आरक्षण बढ़ाने की मांग तेज होगी. 

विपक्षी पार्टियां, कुछ एनडीए की सहयोगी भी, जाति जनगणना चाहती हैं. उन्हें उसमें भाजपा की हिंदू वोट बैंक की गोलबंदी को तोड़ने और ओबीसी वोट को उससे अलग करने का मौका दिख रहा है. पिछले कुछ साल से भाजपा ने अपनी ओबीसी वोट हिस्सेदारी लगातार बढ़ाई है. उसकी ओबीसी वोट हिस्सेदारी 2009 के आम चुनावों में 22 फीसद से बढ़कर 2019 में 44 फीसद हो गई. उत्तर प्रदेश में 32 फीसद भाजपा विधायक ओबीसी हैं, जो एक दशक पहले 20 फीसद थे.

जाति जनगणना की मांग 4 मार्च को महाराष्ट्र में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से तेज हो उठी. सर्वोच्च अदालत ने ओबीसी आंकड़ों के अभाव में राज्य के नगर निगमों, जिला परिषदों और ग्राम पंचायतों के स्थानीय निकाय चुनावों में 27 फीसद ओबीसी आरक्षण को रद्द कर दिया.

ओबीसी आरक्षण में किसी तरह के फेरबदल से कई पार्टियों के जाति समीकरण बुरी तरह गड़बड़ा सकते हैं. मसलन, इससे 27 फीसद ओबीसी आरक्षण को बढ़ाने की मांग उठ सकती है. इसी तरह कुछ जाति समूहों के बारे में कोई सरकारी स्पष्टता नहीं है. मसलन, जाट राजस्थान में तो ओबीसी सूची में हैं, लेकिन हरियाणा या केंद्रीय सूची में नहीं हैं. कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे कई राज्यों में ब्राह्मण ओबीसी सूची में हैं.

ओबीसी जातियों की संख्या भी बढ़ रही है. आजादी के दौरान 2,399 पिछड़ी जातियां थीं, लेकिन 2006 तक उनकी संख्या 5,013 हो गई और फिलहाल करीब 6,000 हैं.

इस जाति झमेले में अब यह भी जुड़ गया है कि महाराष्ट्र जैसे राज्यों में मराठा जैसी प्रभावशाली जातियां भी ओबीसी की तरह आरक्षण की मांग कर रही हैं. पहले निजी क्षेत्र की नौकरियों में भी आरक्षण की मांग उठ चुकी है.

केंद्र राजनैतिक तौर पर इस गरम तवे को राज्यों के हवाले करने की उतावली में है. इस साल 127वां संविधान संशोधन लाया गया, जिसमें किसी जाति समूह को ओबीसी घोषित करने की ताकत वापस राज्यों को दे दी गई. इसके बावजूद कई उलझी गांठें हैं. मसलन, 27 फीसद आरक्षण पर कैसे अमल हो रहा है.

यह देखने के लिए 2018 में गठित रोहिणी आयोग ने पाया कि करीब 6,000 ओबीसी जातियों और समुदायों में सिर्फ 40 ही आरक्षण का 50 फीसद लाभ उठाती हैं. जाति समीकरण में फेरबदल की कोई भी कोशिश एक या दूसरी जाति को काफी नागवार लग सकती है.

हमारी आवरण कथा 'पिछड़ों की सियासत’ ओबीसी वोटों की इस होड़ की पड़ताल करती है. इसे डिप्टी एडिटर कौशिक डेका ने लिखा है. जाति भारतीय समाज की तकरीबन 2,000 साल से अभिन्न अंग रही है. हालांकि इसमें कोई तुक नहीं है कि सरकारी नौकरियों या प्रोफेशनल शिक्षा के कोर्सों में दाखिले की इकलौती योग्यता महज किसी जाति या परिवार विशेष में जन्म होनी चाहिए.

अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण तो ऐतिहासिक वजहों से समझ में आता है. बावजूद इसके, अनंत काल तक जातियों को सीमित दायरे में रखने के लिए विधायी उपायों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए, या उसे वोट बैंक की राजनीति के दोहन का औजार नहीं बनाया जाना चाहिए, जो सबसे बुरा है. अगर आरक्षण का इस्तेमाल असंतुलित विरासत को दुरुस्त करने के लिए किया जाना है तो वह समयबद्ध होना चाहिए.

उसकी स्पष्ट समय-सीमा और हर कुछ साल में समीक्षा होनी चाहिए. अगर हमें आधुनिक समाज की तरह प्रगति करनी है तो हर सरकारी लाभ के लिए सामाजिक-आर्थिक हैसियत पर गौर किया जाना चाहिए, चाहे कोई किसी जाति का हो.

व्यापक संदर्भ में देखें तो अर्थव्यवस्था में ऐसी तेज बढ़ोतरी हो, जहां निजी क्षेत्र में अकूत नौकरियां हों, सरकारी नौकरियों के लिए कोई भागमभाग न रहे और शिक्षा सुविधाएं प्रचूर हों तो सरकारी हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए. आजादी के 75 साल बाद, हमें योग्यता आधारित होना चाहिए, न कि जाति आधारित.

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