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प्रधान संपादक की कलम से

क्या तालिबान ने सबक सीखा है? क्या वे स्थायी सरकार देंगे या फिर हम हिंसा का एक और चक्र देखेंगे? इन सवालों के साफ जवाब अभी तक हमारे पास नहीं हैं

28 नवंबर, 2001 का आवरण 28 नवंबर, 2001 का आवरण

अरुण पुरी

अफगानिस्तान में अमेरिका की मौजूदगी पर तालिबान की एक कहावत थी, 'घड़ी तुम्हारे पास है, वक्त हमारे साथ.' तो, 20 साल बाद तालिबान का वक्त आ गया है और अमेरिकियों ने अफगानिस्तान से हड़बड़ी में रवानगी डाल दी है. अगले महीने 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमले की 20वीं बरसी है, जब अल कायदा के आतंकवादियों ने अपहरण किए विमानों को घातक मिसाइलों में बदल डाला और उन्हें न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के जुड़वा टावरों तथा वाशिंगटन में पेंटागन पर दे मारा, जिसमें 2,996 लोग मारे गए थे. इन हमलों से प्रतिशोध लेने पर उतारू अमेरिकी फौज अफगानिस्तान में उतरी, ताकि अल कायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन को खोज निकाले, जिसे अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने पनाह दे रखी थी. अफगानिस्तान से तालिबान को बाहर किया गया और अमेरिकी सहयोगियों ने नई पश्चिम समर्थक सरकार बनाई.

पश्चिमी ताकतों ने 42 देशों की 65,000 फौज के साथ दो दशकों तक तालिबान के खिलाफ तीखा और खूनी बगावत विरोधी अभियान चलाया. सबसे ज्यादा फौजी मौजूदगी वाला अमेरिका 2012 में तालिबान के साथ शांति वार्ता और ट्रंप सरकार के दौरान 2020 तक फौज की पूरी तरह वापसी पर राजी हुआ. राष्ट्रपति जो बाइडन ने इस साल 31 अगस्त तक अपने देश की सबसे लंगी जंग से पूरी तरह वापसी के वादे पर अमल किया.

6 जुलाई तक अमेरिकी फौज अफगानिस्तान में अपने सबसे बड़े फौजी ठिकाने बगराम हवाई पट्टी को खाली कर चुकी थी. पिछले डेढ़ महीने में जो हुआ, उससे राष्ट्रपति अशरफ गनी की सरकार की बेआबरू से बेदखली और तालिबान की चौंकाऊ रफ्तार से सत्ता में वापसी हुई. बीस साल बाद अफगानिस्तान फिर उसी मोड़ पर लौट आया है. अमेरिका ने उन देशों की फेहरिस्त में एक और नाम जोड़ लिया है, जहां जोरदार फौजी दखलअंदाजी के बाद वह जैसे-तैसे छोड़कर चला गया.

अब दुनिया और खासकर भारत के सामने बड़ा सवाल यह है कि क्या तालिबान ने अपने मध्ययुगीन तौर-तरीकों को बदल लिया है और क्या देश को दोबारा इस्लामी आतंकवादियों की सुरक्षित पनाहगाह बनने से रोकने की उसकी कोई इच्छा है. हालांकि तालिबान मानवाधिकारों, खासकर महिला अधिकारों के प्रति सहमति के स्वर जाहिर कर रहा है और तख्तापलट की शिकार हुई सरकार तथा उसके विदेशी सहयोगियों की मदद करने वालों के खिलाफ बदला न भंजाने की बात कह रहा है, लेकिन देश छोड़कर भागने वाले हजारों लोगों के दुखद दृश्य देखकर उनकी बातों पर कम ही लोगों को यकीन हो पा रहा है. वह दृश्य भुलाना मुश्किल है कि उड़ते अमेरिकी विमान से लटककर कैसे कुछ अफगान गिर कर मर गए या कुछ अधिक खुशकिस्मत 640 शरणार्थी अमेरिकी मालवाहक विमान में बोरों की तरह ठूंस दिए गए.

अलबत्ता, अफगानिस्तान पिछले 20 साल में नाटकीय ढंग से बदल गया है. उसकी जीडीपी 2001 के 2.5 अरब डॉलर से बढ़कर 2020 में 19.8 अरब डॉलर हो गई है. महिला साक्षरता 2000 में 28 फीसद से 2018 में 43 फीसद हो गई है. इंटरनेट कनेक्शन 2002 में 0.01 फीसद से 2018 में 13.5 फीसद आबादी को मुहैया है. हालांकि गरीबी की दर 2007-08 में 34 फीसद से बढ़कर 2016-17 में 55 फीसद हो गई है. आज तालिबान के सामने एक अलग अफगानिस्तान है. वह नहीं, जिसे उसने बीस साल पहले छोड़ा था. उसने दिखाया है कि वह जंग जीत सकता है, लेकिन क्या वह राजकाज भी चला सकता है? देश में विभिन्न जातीय और कबायली समुदाय हैं. क्या तालिबान उन्हें अपने बैनर तले एकजुट कर सकता है, यह सवाल खुला हुआ है.

हालात चाहे कितनी ही मायूस करने वाले क्यों न हों, सब कुछ खत्म नहीं हो गया है. हमारे पास अवसर की एक छोटी खिड़की खुली हुई है क्योंकि तालिबान अभी देश पर अपने पूरे दबदबे के लिए संघर्षरत है. उसे शायद यह पता पड़े कि बगावत की जंग लड़ना 3.8 करोड़ लोगों के देश में राज चलाने से ज्यादा आसान है, खासकर जहां औसत उम्र 18.4 वर्ष है. इसका मतलब है कि औसत अफगान तालिबान के राज से वाकिफ नहीं है. अफगान औरतें भी मुश्किल से मिली अपनी आजादी आसानी से शायद ही छोड़ें.

शायद तालिबान को भी इसका एहसास है. अपने पहले पांच साल के शासन में उसने देश को मध्ययुगीन इस्लामी राज की तरह चलाया. महिलाओं पर पत्थर बरसाए गए और अल्पसंख्यकों का नरसंहार किया गया. इस बार, कुछ छुटपुट घटनाओं के अलावा, उसकी हरकतें अभी तक कम क्रूर रही हैं. तालिबान ने महिला अधिकारों और उनकी शिक्षा तथा रोजगार पर उदार नजरिया दिखाने का वादा किया है. ये शुरुआती और उत्साहवर्धक संकेत हैं कि वे अपने राज के लिए अंतरराष्ट्रीय वैधता हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, हालांकि यह साफ नहीं है कि उनके राज में किसकी चलती है. दो दशक पहले यह समूह एकांगी था. अब वे हक्कानी नेटवर्क और क्वेटा शूरा जैसे विभिन्न धड़ों का झुंड जैसे लगते हैं. कई साल से तालिबान के मौजूदा सर्वोच्च नेता मौलवी हैबतुल्ला अखुंदजादा से कुछ सुना नहीं गया है.

तालिबान ने अपनी बगावत का खर्च हेरोइन की बिक्री से उठाया है, क्योंकि अफीम की खेती दुनिया में 90 फीसद इसी देश में होती है, मगर किसी राष्ट्र-राज्य का राजकाज नशे की बिक्री से नहीं चल सकता. अफगानिस्तान अपनी सरकार चलाने के लिए विदेशी रकम पर काफी निर्भर रहा है, तालिबान को भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय से वित्तीय मदद की जरूरत होगी. यह चुनौती भरा है क्योंकि अमेरिका ने देश की 9.5 अरब डॉलर की विदेशी संपत्तियों को जाम कर दिया है.

गनी सरकार का गिरना बुरी खबर है, क्योंकि यह काबुल में भारत के मित्रवत प्रशासन के चरण का अंत है. इसलिए नई दिल्ली को तालिबान की वापसी से चिंतित होना लाजिमी है. अगर अपने पिछले राज की तरह वह आतंकवादियों को अफगानिस्तान से जम्मू-कश्मीर में भेजता है तो इस क्षेत्र में अमन बहाली की स्थिति पेचीदा हो सकती है.

खुशकिस्मती से भारत को अफगानिस्तान में मुख्य रूप से अनुकूल ताकत माना जाता है. हम उनके सबसे बड़े क्षेत्रीय दाता हैं. बांध, सड़कें और संसद भवन के निर्माण में 3 अरब डॉलर से ज्यादा मुहैया कराया, जो लोगों के फायदे के लिए हैं. भारत को 1 अगस्त को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की महीने भर के लिए अध्यक्षता मिली और वह सुरक्षा परिषद का दो साल तक हिस्सा बना रहेगा. अब अफगानिस्तान जैसे देशों पर प्रतिबंध के फैसले में भारत की आवाज भी अहम होगी.

हालांकि इस मामले में राय अभी बंटी हुई है कि क्या भारत को तालिबान के साथ संपर्क बनाना चाहिए. एक वर्ग का मानना है कि अगर भारत आतंक को शह देने के लिए पाकिस्तान से बात नहीं करता है तो वह तालिबान से भी शायद ही बात करे, जिसकी वैधता को भी वह मान्यता नहीं देता. दूसरे वर्ग का मानना है कि हमें उस समूह से विभिन्न स्तरों पर बात करने की जरूरत है.

बेशक, भारत को अपने सभी पत्तों पर विचार करने की जरूरत है, व्यावहारिक रुख अपनाएं और अचानक किसी प्रतिक्रिया से बचें. चाहे कितना ही बुरा लगे, हमें नए तालिबान से संपर्क कायम करने के तरीके ढूंढने की जरूरत है. हमने जाना है कि अफगानिस्तान की घटनाएं चक्र पूरा कर रही हैं. हमें जल्दबाजी में किसी नतीजे पर पहुंचने की जगह इंतजार करने और विचार करने की जरूरत है.

हमारी आवरण कथा 'तालिबान से कैसे निबटें' भारत के सामने विकल्पों की पड़ताल करती है क्योंकि उसका साबका दुनिया की सबसे अजीबोगरीब सत्ता से है. इसे ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (पब्लिशिंग) राज चेंगप्पा ने लिखा है. क्या तालिबान ने सबक सीखा है? क्या वे स्थायी सरकार देंगे या फिर हम हिंसा का एक और चक्र देखेंगे? इन सवालों के साफ जवाब अभी तक हमारे पास नहीं हैं. हम इतना जरूर जानते हैं कि अफगानिस्तान में उम्मीदों को तोड़ने का रुझान रहा है. आशा यही है कि इस बार देश के भाग्य में नया मोड़ आए.

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