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प्रधान संपादक की कलम से

भारत वह देश है जहां 50 फीसद आबादी 25 वर्ष से कम उम्र की है. इसीलिए यह युवा जोश और विचारों से भरा देश है. हम निरंतर आगे बढ़ते देश हैं. हमारी आजादी की स्वर्ण जयंती मात्र 26 साल दूर है

26 अगस्त, 2020 का आवरण 26 अगस्त, 2020 का आवरण

भारत 15 अगस्त, 2022 को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपने 75 साल का जश्न मनाएगा. कृतज्ञ होने के लिए बहुत कुछ है. आजादी के वक्त हम कंगाल और अल्पविकसित देश थे. महज 18 फीसद से कुछ ज्यादा लोग ही पढ़-लिख सकते थे. औसत आदमी मात्र 32 साल की उम्र तक जीने की उम्मीद कर सकता था. खाने-पीने की चीजों से लेकर स्वास्थ्य केंद्रों, डॉक्टरों, संस्थाओं और उद्योगों तक हर चीज की किल्लत थी.

यह सब तब था, जब हमारी आबादी मौजूदा 1.3 अरब के मुकाबले महज 35 करोड़ थी. 74 बरस पूरे होते-होते हमने सकल राष्ट्रीय खुशहाली में ऊंची छलांगें लगाई हैं. हमारे तीन-चौथाई से ज्यादा लोग अब शिक्षित हैं. औसत जीवन प्रत्याशा दोगुनी से ज्यादा हो गई है. खाद्य उत्पादन में हम आत्मनिर्भर हैं और आर्थिक तौर पर नाउम्मीद देश बनने की आशंकाओं को झुठला चुके हैं. 25 खरब डॉलर की जीडीपी के साथ अब हम दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं.

हमारी उपलब्धियों का एक सबक यह है कि देशों में अपने हालात से उबरने की ताकत होती है. देश बेशक लोगों से बने हैं और उन्हीं की जमात से कुछ असाधारण नेता निकलते हैं, जिन्हें हम रहनुमा कहते हैं. अपनी शख्सियतों और कामयाबियों के बल पर उन्होंने हमें मौजूदा मुकाम तक लाने में अहम भूमिका निभाई. राजनैतिक नेताओं से दिग्गज कारोबारियों, वैज्ञानिकों से सेनापतियों, खिलाड़ियों से लेखकों और कलाकारों तक, देश सबकी उपलब्धियों का निचोड़ है. सबने इस सफर में संजीदा असर डाला.

मोहनदास करमचंद गांधी को ही लीजिए. उन्होंने ब्रितानियों के खिलाफ आजादी की लड़ाई में अहिंसा को ताकतवर औजार बनाया और दुनिया के कई नेताओं और आंदोलनों को प्रेरित किया. भीमराव आंबेडकर ने न केवल लोकतंत्र बल्कि सामाजिक सुधारों का भी ढांचा दिया. सरदार पटेल ने रियासतों में बंटे पैबंदों को भारतीय संघ में मजबूती से पिरोया. पहले 17 साल देश के प्रधानमंत्री रहे जवाहरलाल नेहरू ने हमारे नवजात गणतंत्र की अनेक संस्थाओं का निर्माण किया. इंदिरा गांधी ने और आगे बढ़कर उपमहाद्वीप का भूगोल बदला, मगर आपातकाल भी थोपा, जिसकी परिणति विपक्ष की अगुआई वाली पहली सरकार के गठन में हुई.

किसी भी प्रधानमंत्री को मिले सबसे बड़े जनादेश के साथ सत्ता में आए उनके बेटे राजीव गांधी ने कंप्यूटरों से भारत का तआरुफ करवाया और टेलीफोन सुविधा का विस्तार किया. उनके बाद सबसे अप्रत्याशित प्रधानमंत्रियों में से एक नरसिंह राव ने बागडोर संभाली और हमें उदारीकरण की राह पर ले गए. फिर, अटल बिहारी वाजपेयी ने परमाणु परीक्षण किए. उनके बाद मनमोहन सिंह आए, जिन्होंने सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था की सदारत की. अब लगातार दो एकदलीय चुनावी जनादेश जीतने वाले एकमात्र गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जिन्होंने प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण और मुफ्त रसोई गैस सिलेंडर, शौचालयों और स्वच्छ पेयजल के साथ सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं में जबरदस्त रद्दोबदल किए. अनुच्छेद 370 को रद्द करके उन्होंने भारतीय संघ की दिशा को भी बदल डाला.

इस तरह हमें खुशकिस्मती से ऐसे नेता मिले, जिनके कामों का मोटे तौर पर अच्छा ही असर पड़ा है. राष्ट्र निर्माण अलबत्ता राजनैतिक तबके का ही विशेषाधिकार नहीं है. हमें उद्योगों और अनुसंधान संस्थाओं की नींव डालने वाले जे.आर.डी. टाटा और शेयर बाजार की जीवंत संस्कृति का निर्माण करने वाले धीरूभाई अंबानी सरीखे कारोबारी दिग्गज और संपदा निर्माता भी मिले. एन.आर. नारायण मूर्ति सरीखे सूचना प्रौद्योगिकी दिग्गजों ने देश को दुनिया के आइटी नक्शे पर जगह दिलवाई. लीक से हटकर इन असाधारण शख्सियतों ने राष्ट्र की नियति की राह बदल दी.

उत्कृष्टता के और भी द्वीप रहे हैं, खासकर अत्याधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान और टेक्नोलॉजी में. होमी भाभा, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, राजा रमन्ना, विक्रम साराभाई और सतीश धवन सरीखे दूरदर्शियों के सिलसिले ने इस विकासशील देश का अंतरिक्ष और एटमी शक्ति बनना पक्का किया. अनुसंधान प्रयोगशालाओं की शृंखला स्थापित करने वाले शांति स्वरूप भटनागर और हरित क्रांति के जनक एम.एस. स्वामीनाथन सरीखे वैज्ञानिकों ने भी देश को वैज्ञानिक मन और मिजाज दिलाया.

खेलों में भी सुनील गावस्कर, सचिन तेंडुलकर सरीखे क्रिकेट दिग्गजों और पी.टी. उषा और मिल्खा सिंह सरीखे एथलीटों ने नई पीढ़ी के कई खेल सितारों को प्रेरित किया. सत्यजित राय और अडूर गोपालकृष्णन जैसे फिल्मकार भारत को विश्व मानचित्र पर लाए. मदर टेरेसा ने सबसे गरीब की सेवा करके करुणा को नए मायने दिए.

मैंने कुछ ही पथप्रदर्शकों का जिक्र किया है, पर स्वतंत्रता दिवस के इस विशेषांक में ऐसे 115 दिपदिपाते सूर्य हैं. वे राजनीति, कारोबार, विज्ञान, प्रतिरक्षा, आध्यात्मिकता, साहित्य, संगीत, नृत्य, कला, खेल, सिनेमा के क्षेत्रों से आए हैं. इन सभी ने अपने ढंग से देश को समृद्ध किया. यकीनन और भी कई पथप्रदर्शक हैं, जिन्हें हम यहां शामिल नहीं कर पाए, लेकिन जिनका राष्ट्र निर्माण में योगदान है. इसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूं.

हमारे पथप्रवर्तक इतने जाने-माने हैं कि उनकी जिंदगी और काम को नए नजरिए से देखना चुनौती भरा काम था. इसलिए हमने उनके बारे में लिखने के लिए कुछ और असाधारण शख्सियतों को जुटाया. यह हमारे इस खास अंक को और भी खास बनाता है. इस तरह हमारे यहां राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई पर, महामहिम दलाई लामा महात्मा गांधी पर, राजमोहन गांधी सरदार पटेल पर, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान प्रधानमंत्री मोदी पर, अकाली प्रमुख प्रकाश सिंह बादल शेख अब्दुल्लाह पर, कांग्रेसी कमल नाथ पी.वी. नरसिंह राव पर, पी. चिदंबरम मनमोहन सिंह पर, बिहार के नीतीश कुमार ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक पर, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव अपने मार्गदर्शक राममनोहर लोहिया पर, अजीज प्रेमजी जेआरडी टाटा पर, सिमी ग्रेवाल राज कपूर पर, बीसीसीआइ के अध्यक्ष और पूर्व कप्तान सौरभ गांगुली सचिन तेंडुलकर पर लिख रहे हैं. ये कुछ उदाहरण भर हैं. हमारी पथप्रदर्शक शख्सियतों पर उनकी राय पड़ना दिलचस्प और लीक से हटकर होगा.

भारत वह देश है जहां 50 फीसद आबादी 25 वर्ष से कम उम्र की है. इसीलिए यह युवा जोश और विचारों से भरा देश है. हम निरंतर आगे बढ़ते देश हैं. हमारी आजादी की स्वर्ण जयंती मात्र 26 साल दूर है. मैं उम्मीद करता हूं कि हमारी हीरक जयंती इस अगले बड़े पड़ाव की तरफ हमारी छलांग का सोपान बनेगी. इसके लिए तमाम नए पथप्रवर्तकों को आगे आना होगा. मैं कामना करता हूं कि उनकी नस्ल फूले-फले और वे नियति से साक्षात्कार पूरा कर पाएं.

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