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प्रधान संपादक की कलम से

2021 तक व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धाओं में भारत के कुल 17 पदकों में से महज पांच महिलाओं ने जीते थे.

21 जुलाई, 2021 का आवरण 21 जुलाई, 2021 का आवरण

अरुण पुरी

हरेक ओलंपिक के दौरान देश में बहुत हाय-तौबा मचती है कि भारत का जत्था अपनी पूरी क्षमता से प्रदर्शन क्यों नहीं करता. इस साल तोक्यो ओलंपिक भी अलग नहीं है. टीम इंडिया का कुल प्रदर्शन निराशाजनक रहा है. 5 अगस्त को 85 पदक विजेता देशों की तालिका में भारत 62वीं पायदान पर घिसट रहा था. अदने-से कतर और कोसोवो भी दो-दो पदक जीतकर उससे आगे थे.

हमारे कई एथलीट अपनी संभावनाओं पर खरे नहीं उतरे. भारतीय निशानेबाजी टीम का धराशायी होना एक उदाहरण भर है. भारत के दो सबसे शानदार मुन्न्केबाज पहले ही दौर में बाहर हो गए. गौर करने की बात यह है कि ओलंपिक में उतरने से पहले भारतीय एथलीटों को कई बाधाएं पार करनी पड़ती हैं—खेलों का दयनीय बुनियादी ढांचा, राजनीति के अखाड़े बन चुकी खेल संस्थाएं और संवेदनशून्य अफसर. हमारे खिलाड़ी जब दुनिया के सर्वोच्च खेल अखाड़ों में पहुंचते हैं तो और भी गंभीर परेशानियां नतीजों पर असर डालती हैं.

2018 में नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के कोच ने एक गोपनीय रिपोर्ट भेजी, जो कहती है कि भारत के 72 फीसद निशानेबाज हर बड़े मुकाबले में क्षमता से कमतर प्रदर्शन करते हैं. दबाव से निपटने और खुद को नियम-कायदों में रख पाने की उनकी अक्षमता को वे इसकी वजह बताते हैं. रिपोर्ट कहती है कि हमारे पास अकूत प्रतिभा है, कमी है तो खेल विज्ञान की. यही वह है जिसे बीजिंग ओलंपिक के स्वर्ण पदक विजेता अभिनव बिंद्रा हाथ न आने वाला '1 प्रतिशत’ कहते हैं, जो हार को जीत में बदल सकता है.

भारतीय महिला एथलीटों का प्रदर्शन अलबत्ता मौजूदा ओलंपिक में आशा की किरण है. आगे बढऩे के लिए उन्हें असाधारण हुनर की जरूरत पड़ती है, उस समाज में जो अब भी पितृसत्तात्मक है. भारतीय परिवारों में व्यप्त पुत्र-मोह और लिंग-चयन की प्रथाओं से लड़ने से लेकर घर और कार्यस्थलों पर भेदभाव झेलने और पोषण तथा शिक्षा के लिए जद्दोजहद करने तक उन्हें क्या-क्या नहीं करना पड़ता.

लैंगिक खाई पर वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की मार्च 2021 की जेंडर गैप रिपोर्ट कहती है कि भारत इस खाई को केवल 62.5 फीसद ही पाट पाया, जो 2019 के 66.8 फीसद से भी कम है. भारत की 59 फीसद निरक्षर आबादी महिलाएं हैं. यह तोक्यो में भारतीय महिलाओं के प्रदर्शन को इतना उल्लेखनीय बनाने वाले कारणों में से महज एक है.

2021 तक व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धाओं में भारत के कुल 17 पदकों में से महज पांच महिलाओं ने जीते थे. तोक्यो में वे अब तक भारत के पांच में से तीन पदक जीत चुकी हैं. महिला हॉकी टीम ने पहली बार सेमीफाइनल में धमाकेदार प्रवेश किया. यहां तक कि जो महिलाएं जीत नहीं सकीं—तलवारबाज भवानी देवी, टेबल टेनिस खिलाड़ी मनिका बत्रा और गोला फेंक एथलीट कमलप्रीत कौर—वे भी पूरे जोश और दमखम से लड़ीं.

भारतीय महिलाओं ने बेशक अपने पुरुष समकक्षों को पीछे छोड़ दिया है. उनकी कामयाबियों की साख तब और बढ़ जाती है जब उनमें से किसी का भी सफर आसान नहीं रहा. महिला हॉकी टीम की जोशीली कप्तान रानी रामपाल की जिंदगी बहुत जद्दोजहद से भरी थी और वे खेल में आईं ही इसलिए कि अपने परिवार के लिए पन्न्का घर बना सकें और दो जून की रोटी जुटा सकें.

नन्ही कद-काठी की मीराबाई चानू तोक्यो में रजत पदक जीतने से पहले लकड़ियां बीना करती थीं ताकि अपने गांव के घर में आग जलाकर सर्द रातों को गर्म कर सकें. लवलीना बोरगोहेन के गांव में उनके घर तक पक्की सड़क नहीं थी, पर इससे मुक्केबाजी में कांस्य तक पहुंचने का उनका जज्बा जरा कम नहीं हुआ. ये तंगहाली की हृदयविदारक कहानियां हैं, जिनसे महिला एथलीटों की मुश्किलों और संघर्ष की थोड़ी झलक मिलती है.

पुरुष हॉकी टीम ने कांस्य पदक जीता, जो 41 वर्षों में इस खेल में भारत का पहला पदक है. महिला टीम का सेमीफाइनल में प्रवेश उस खेल में नई जान आने के उत्साहवर्धक संकेत हैं जिसमें कभी भारत का दबदबा हुआ करता था. इसके अलावा, रवि कुमार दहिया ने पुरुषों की 57 किग्रा कुश्ती के फाइनल में अपना पदक पक्का किया.

हमारी आवरण कथा 'बेटियों का दमखम’ तोक्यो में हमारे प्रदर्शन की पड़ताल करती है. यह कंसल्टिंग एडिटर बोरिया मजूमदार ने लिखी है. हमारे यहां प्रतिभा या डीएनए की कमी नहीं. कमी है तो उसे फलीभूत करने की. हमें वही करना होगा जो खेलों के महाशक्ति देशों ने किया—खेल संस्कृति का निर्माण. वैसे ही जैसे हमने सैकड़ों खेल अकादमियां बनाकर और स्कूल से लेकर लीग स्तर और फिर राष्ट्रीय टीम तक बेहतरीन खिलाडिय़ों को छांटने-चुनने की प्रक्रिया कायम करके क्रिकेट में किया है.

हमें ओलंपिक खेलों का 'क्रिकेटीकरण’ करना होगा. इसमें राज्य सरकारों को आगे आने होगा. मसलन, भारत की पुरुष और महिला हॉकी टीमें ओडिशा सरकार के समर्थन के बूते बेहतरीन कोच जुटा पाईं और विश्वस्तरीय संस्थाओं में प्रशिक्षण ले पाईं.

हम कई देशों से सीख सकते हैं. पुरुष और महिला दोनों तीरअंदाजी में पूरी तरह हावी दक्षिण कोरिया पदक जीतने की संभावना से ओतप्रोत अपने खिलाड़ियों को सभी मौसमों में कारगर स्थितियों और खचाखच भरे स्टेडियमों में प्रशिक्षण देता है, ताकि वे मुकाबलों के तनाव के अनुरूप अपने को ढाल सकें.

सात खेलों—वेटलिफ्टिंग, तैराकी, जिम्नास्टिक्स, गोताखोरी, टेबल टेनिस, बैडमिंटन और निशानेबाजी—पर अपने एकाग्र फोकस से चीन ने स्वर्ण पदकों का अच्छा अंबार बटोर लिया और पदक तालिका में अमेरिका से आगे निकल गया. ब्रिटेन ने 1996 के अटलांटा ओलंपिक में एक ही पदक जीता था. देश ने 1997 से लॉटरी का पैसा ब्रिटिश खेलों में लगाना शुरू किया और डेढ़ दशक के भीतर ब्रिटिश टीम ने लंदन 2012 में 29 स्वर्ण पदक जीते.

अपने पदकों की संभावनाओं में इजाफे के लिए हमें तैराकी और एथलेटिक्स सरीखे व्यक्तिगत खेलो में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी होगी. खेलों को विलासिता मानने का अपना रवैया हमें तजना होगा. खेल कई तरह से राष्ट्र की संस्कृति की झलक देते हैं. खेलों में कामयाबी के लिए मजबूत संस्थाओं, अनुशासन, प्रतिबद्धता और जीतने की इच्छाशक्ति की जरूरत है.

पेरिस के 2024 ओलंपिक तीन साल दूर हैं और 2018 लॉस एंजेलिस गेम्स अब से सात साल दूर. यही वक्त है जब हम कमर कस लें और खेलों में नई जान फूंकने की सुव्यवस्थित योजना शुरू करें. आखिर हम 1.3 अरब लोगों का देश हैं. राष्ट्रीय गौरव बढ़ाने के लिए ओलंपिक में कामयाबी से बेहतर कोई दूसरा तरीका नहीं है.

राष्ट्रवाद और अंतरराष्ट्रीय कद बढ़ाने के तमाम संदिग्ध अफसानों से यह कहीं बेहतर है. अगर हम तत्काल और ईमानदारी से योजना बनाकर आगे नहीं बढ़ते तो खेलों में कीर्ति और राष्ट्रीय गौरव की हमारी उक्वमीदें ओलंपिक के छल्लों में अटकी रहने को अभिशप्त रहेंगी.

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