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प्रधान संपादक की कलम से

दुनिया के दो सबसे बड़े विकासशील देशों को अपने लोगों की भलाई का जतन करना है, तो एलएसी को शांत और तय अंतरराष्ट्रीय सीमा बनाना ही होगा

19 जुलाई, 2017 और 1 जुलाई, 2020 का अवरण 19 जुलाई, 2017 और 1 जुलाई, 2020 का अवरण

अरुण पुरी

आप दोस्त बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं. '' यह बात करीब दो दशक पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा में कही थी. वे पाकिस्तान की चर्चा कर रहे थे. यह चीन पर भी लागू हो सकता था. 1950-51 में तिब्बत पर चीन के आक्रमण और कब्जे ने दोनों देशों को अपने उत्तर-औपनिवेशिक इतिहास में पहली बार पड़ोसियों में बदल दिया. उन्हें औपनिवेशिक ब्रिटिश और साम्राज्यिक चीन से विरासत में अनसुलझी सरहदें मिलीं, जो तिब्बत को वैसल स्टेट या कठपुतली देश मानते थे. भारत पूरे अक्साई चिन पर दावा करता है, जो चीनी प्रांत शिनजियांग और तिब्बत को जोड़ता है. चीन पूरे अरुणाचल प्रदेश पर दावा करता और उसे 'दक्षिण तिब्बत' कहता है. सात से ज्यादा दशकों से समाधान दोनों ही पक्षों के हाथ नहीं लगा.

सरहद की इन भिन्न-भिन्न धारणाओं ने 1962 में सीमाई टकराव पैदा किया. मगर 1967 और 1975 की दो झड़पों के अलावा सरहद 45 सालों से खामोश थी. मई 2020 में यह बदल गया, जब चीन ने पीछे से जबरदस्त सैन्य लामबंदी के सहारे एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) की कई जगहों पर अचानक और अबूझ घुसपैठ कर ली. नतीजा पिछले साल 15 जुलाई को गलवान घाटी में हिंसक टकराव में हुआ, जिसमें 20 भारतीय सैनिक और चीनी सेना के मुताबिक उसके कम से कम चार कर्मी मारे गए.

भारत को श्रेय देना होगा कि वह चीनी सेना की जोर-जबरदस्ती के आगे झुका नहीं और उसने सरहद पर सैन्यबल और साजो-सामान ले जाकर दिलेरी से जवाब दिया. जता दिया गया है कि एलएसी पर मई 2020 से पहले की स्थिति पूरी तरह बहाल किए बगैर रिश्ते पहले जैसे नहीं हो सकते.

नौ महीनों के गतिरोध के बाद फरवरी में दोनों सेनाएं पैंगोंग त्सो झील के उत्तरी और दक्षिणी किनारों से पीछे हट गईं. अलबत्ता रिश्ते ठंडे पड़ गए. विदेश मंत्री स्तर की वार्ताएं हुई हैं और कोर कमांडर स्तर की बातचीत का 12वां दौर जल्द होने की उम्मीद है. मगर यह शांति छलावा है. जमीन पर दोनों सेनाओं के रुख सख्त हो गए हैं. भारतीय सेना 50,000 से ज्यादा सैनिक पाकिस्तानी सीमा से हटाकर चीन से सटे उत्तरी सीमांत पर ले आई है. चीन ने तिब्बती पठार पर सैन्य विमानन का बुनियादी ढांचा बढ़ाया है. वह मौजूदा हवाई क्षेत्रों का विस्तार और नयों का निर्माण कर रहा है. सबसे बड़ा नुक्सान है भरोसे का टूटना—चीन के एक सैन्य कदम ने 30 साल की बातचीत से विकसित सरहदी नियमों की धज्जियां उड़ा दीं.

बीते तीन दशकों के ज्यादातर वक्त चीन ने देंग शियाओ पिंग के 'अपनी ताकत छिपाओ और अपने वक्त का इंतजार करो' फलसफे का पालन किया. इसका मतलब था आर्थिक बाहुबल विकसित करने तक भूभागीय विवादों को टालते रहो. इस साल चीन का 140 खरब डॉलर जीडीपी अमेरिका से बस जरा ही कम है और असल में यह दशक खत्म होने से पहले वह उसे पीछे छोड़ सकता है. माओ त्से तुंग के बाद चीन के सबसे ताकतवर नेता शी जिनपिंग मानते हैं कि उनके देश के लिए विश्व व्यवस्था में अपनी जगह हथियाने और तमाम भूभागीय विवाद निपटाने का वक्त आ गया है. एलएसी पर दावे के अलावा, उनका प्रमुख विवाद ताइवान के साथ है, जिसे बीजिंग बिगड़ैल प्रांत कहता है, और दक्षिण चीन सागर का वह समुद्री दालान, जिसे चीन पूरा का पूरा अपना भूभागीय समुद्र बताकर दावा करता है.

चीन ने शीत युद्ध के बाद किसी भी देश का सबसे बड़ा सैन्य विस्तार शुरू किया और जता दिया है कि भूभागीय विवादों को निपटाने के लिए ताकत के इस्तेमाल से उसे गुरेज नहीं है. यह भारत के लिए बुरी खबर है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी के बीच अब तज दी गई अनौपचारिक बैठकें, जो 2018 में वुहान से शुरू हुई थीं, शायद भारत का वक्त हासिल करने का अपना तरीका थीं, ताकि हमारी उपेक्षित सरहदी रक्षा तैयारियों को मजबूत और हमारी सेना को आधुनिक बना सकें. उस प्रक्रिया को अब तेज करना होगा. अनसुलझा सीमांत बजट की मुश्किलों के वक्त न केवल और ज्यादा सैन्य संसाधनों की मांग करेगा बल्कि राजनैतिक नेतृत्व का ध्यान भी बंटाएगा. सैन्य टकराव की छाया तले कोई अर्थव्यवस्था नहीं बढ़ सकती.

आक्रामक चीन से निपटना राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती है और चीन पर भारत की लगातार निर्भरता आर्थिक चिंता का सबब है. भारत-चीन का दोतरफा व्यापार पिछले साल 87.6 अरब डॉलर था और चीनी आयातों के पक्ष में बुरी तरह झुका था. वह निर्भरता इस साल और बढ़ गई, जब दोतरफा व्यापार पहले छह महीनों में ही 62.7 फीसद की छलांग लगाकर 57.48 अरब डॉलर पर पहुंच गया. भारत चीनी आयातों पर निर्भर है, पर चीन भारतीय आयातों पर नहीं. चीन के निर्यातों में भारत की हिस्सेदारी महज 2 फीसद है.

सरहद पर हालात सामान्य नहीं हैं. भारतीय और चीनी सैनिक इस फरवरी में केवल एक जगह से पीछे हटे. कम से तीन दूसरी जगहों पर एक दूसरे की आंखों में आंखें डाले डटे हैं. सरहद पर दावा करने के लिए दोनों पक्ष एक बार हल्के हथियारबंद गश्ती दल भी भेज चुके हैं. अब उन्होंने बैटल टैंकों, तोपों, लड़ाकू विमानों और हेलिकॉप्टर गनशिप के साथ भारी हथियारबंद व्यूहरचनाएं कर ली हैं. भरोसे का टूटना और गलतफहमियों से निबटने के लिए नए सैन्य नियम-कायदे नहीं होने का मतलब यह है कि एक भी गलती बढ़कर कहीं टकराव में न बदल जाए.

बदतर यह कि हम पाकिस्तान और चीन से सटी दो सरहदों से दोचार हो सकते हैं, जो सामरिक गठबंधन से बंधे हैं. यह स्थिति कोई देश गवारा नहीं कर सकता. यही वजह है कि भारत अब अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ चारपक्षीय सुरक्षा संवाद में उत्साह से शामिल है. चीन के युद्धपिपासु रवैये के प्रति परस्पर घृणा, खासकर दक्षिण चीन सागर में, इन चारों लोकतांत्रिक देशों में साझा है.

हमारी पाकिस्तान के साथ एलओसी (नियंत्रण रेखा) और चीन के एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) है, लेकिन अपनी कूटनीतिक शब्दावली में हम एक और छोटा नाम जोड़ना गवारा नहीं कर सकते और वह है—एलओएनसी (अनियंत्रण रेखा). यही हमारी आवरण कथा है जो मैनेजिंग एडिटर संदीप उन्नीथन ने लिखी है. यह सरहद पर इस खतरनाक खेल का जायजा लेती है. भले ही यह सरहद तक सिमटा हो, लेकिन युद्ध साफ तौर पर भारत और चीन के बीच विकल्प नहीं है. दुनिया के दो सबसे बड़े विकासशील देशों को अपने लोगों की भलाई का जतन करना है, तो एलएसी को शांत और तय अंतरराष्ट्रीय सीमा बनाना ही होगा. यही इस खेल की आखिरी अकेली पायदान है, जिसकी दिशा में दोनों देशों को काम करने की जरूरत है.

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