scorecardresearch
 

प्रधान संपादक की कलम से

र्च 2020 से कोविड-19 महामारी की वजह से पारंपरिक कंपनियों को भारी झटका लगा, लेकिन इसी दौरान भारत में 23 स्टार्ट-अप यूनिकॉर्न की विशिष्ट जमात में जा बैठीं और उनकी कुल संख्या 48 हो गई.

6 जनवरी, 2016 का आवरण 6 जनवरी, 2016 का आवरण

अरुण पुरी

महामारी की तमाम तरह की तबाही और नाउम्मीदी के बीच यह आवरण कथा कुछ उम्मीद के पल बटोर लाई है. भारतीय स्टार्ट-अप की दुनिया इतनी बेहतर कभी नहीं रही है. पिछले साल देश में सबसे अधिक तकरीबन 1,600 स्टार्ट-अप यानी मोटे तौर पर हर चार दिन में एक की दर से आ जुड़ीं. आइटी उद्योग की संस्था नैस्कॉम ने भारत को टेक स्टार्ट-अप के मामले में दुनिया का तीसरी सबसे बड़ा हब आंका है.

टेक्नोलॉजी आधारित, बदलावकारी और निजी मिल्कियत वाले ये साहसिक नए उद्यम न सिर्फ कारोबार के परंपरागत नियम-कायदों को  बदल रहे हैं, बल्कि समय-सीमा को भी छोटा कर रहे हैं. 2015 में किसी भारतीय स्टार्ट-अप को ‘यूनिकॉर्न’ जमात में पहुंचने में औसतन 15 साल लग जाते थे. 2016 में यह समय-सीमा सिकुड़कर महज 2.4 साल हो गई.

1 अरब डॉलर (7,430 करोड़ रु.) बाजार मूल्य को लांघने वाले निजी मिलिकयत वाले स्टार्ट-अप को माथे पर एक सिंग वाले घोड़े जैसे मिथकीय जानवर के नाम पर यूनिकॉर्न कहा जाता है. उस अदृश्य मिथकीय जानवर का जिक्र उनकी कामयाबी के विरले आंकड़ों का प्रतिबिंब है.

मार्च 2020 से कोविड-19 महामारी की वजह से पारंपरिक कंपनियों को भारी झटका लगा, लेकिन इसी दौरान भारत में 23 स्टार्ट-अप यूनिकॉर्न की विशिष्ट जमात में जा बैठीं और उनकी कुल संख्या 48 हो गई, जो बस अमेरिका (288) और चीन (133) के पीछे है.

भारत की करीब 21 फीसद यूनिकॉर्न फिनटेक, 19 फीसद सॉफ्टवेयर सेवाओं और 15 फीसद ई-कॉमर्स में हैं. इन 48 यूनिकॉर्न का संयुक्त बाजार मूल्य फिलहाल 139.7 अरब डॉलर (10.4 लाख करोड़ रु.) है, जबकि भारतीय शेयर बाजार में सबसे अधिक मूल्य वाली कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज की बाजार पूंजी 13.23 लाख करोड़ रु. है.

भारत में नियति से यह नया साक्षात्कार तीन दशक पहले हुआ, जब सरकार ने अर्थव्यवस्था की बेड़ियां तोड़ने का फैसला किया. उदारीकरण का एक मकसद हमारे उद्यमियों के जीवट में पंख लगाना था. उसके बाद से भारत की जीडीपी 1990 में 270.5 अरब डॉलर से 2019 में 28.7 खरब डॉलर हो गई.

यह कोई संयोग मात्र नहीं है. यह दशक भर पहले शुरू हुए रुझान का ही नतीजा है. 2008 की महामंदी के राख से भारतीय स्टार्ट-अप की एक नई पीढ़ी एंजेल निवेशकों की मदद से जन्मी थी. उसने अपनी कामयाबी की दास्तान उदारीकरण के बाद उद्यमियों की पहली लहर के साथ लिखी, जिससे भारत आइटी और आइटीईएस के क्षेत्र में दुनिया का हब बन गया.

मसलन, 2015 में भारत में 1,200 स्टार्ट-अप शुरू हुए. देश में तेजी से बढ़ते डिजिटल माहौल ने भी उनकी उछाल में दम भर दिया. अनुमान है कि देश की 43 फीसद आबादी या मोटे तौर पर 62.2 करोड़ लोग इंटरनेट का सक्रिय इस्तेमाल करते हैं. दिलचस्प यह है कि शहरी क्षेत्रों में इंटरनेट का इस्तेमाल साल-दर-साल  के आधार पर 4 फीसद बढ़ा, जबकि ग्रामीण भारत में यह बढ़ोतरी 13 फीसद रही, जिससे डिजिटल सेवाओं की वृद्धि की संभावनाओं का पता चलता है.

दूसरा विशाल मौका मोदी सरकार के दौरान 10 करोड़ जन धन खाताधारकों का होना था, जो आधार से सत्यापित हैं. देर-सबेर वे डिजिटल अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनेंगे. डिजिटल भुगतान का दायरा व्यापक हुआ है. दुनिया में सबसे सस्ता मोबाइल फोन डेटा ने उपभोक्तावाद के डिजिटाइजेशन को हवा दी है.

अमेरिका में सस्ती पूंजी की उपलब्धता से उसके वेंचर पूंजीपतियों को भारतीय स्टार्ट-अप में निवेश करना आसान हो गया है. इधर हाल में, महामारी की कई लहरें और लॉकडाउन से लोग घरों में रहने पर मजबूर हुए तो उन्होंने जरूरी सामान, पका हुए भोजन का ऑर्डर देने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर देखा और भुगतान करने के लिए ई-कॉमर्स सिस्टमों का इस्तेमाल किया.

भारत की सबसे कीमती स्टार्ट-अप बेंगलूरू की एडटेक फर्म बायजूÓज इस घटनाक्रम की बेहतरीन मिसाल है. दशक भर पहले 40 वर्षीय बायजू रवींद्रन और उनकी पत्नी 34 वर्षीय दिव्या गोकुलनाथ ने इस पोर्टल की स्थापना की थी. यह विज्ञान और गणित जैसे विषयों के वीडियो पाठ लेकर आया और देश के विशाल शिक्षा बाजार को पकडऩे के लिए इंटरेक्टिव टूल का इसतेमाल किया.

यह फर्म दरअसल 'डेकाकॉर्न’ या 10 अरब डॉलर से अधिक वालों की जमात में पहुंच गई है. इस जून में उसका बाजार मूल्य 16.5 अरब डॉलर (1.2 लाख करोड़ रु.) हो गया है. यह केंद्र सरकार को पिछले साल सीमा शुल्क से हासिल राशि के बराबर है. उत्तर केरल के एक गांव में स्कूल अध्यापक मां-बाप का बेटा कैसे दुनिया की 11वीं सबसे कीमती स्टार्ट-अप कायम कर पाया, यह अपने आप कारोबारी दुनिया की एक मिसाल है. और वह इकलौता नहीं है.

हमारी आवरण कथा 'यूनिकॉर्न: नई सूझ के सूरमाÓ भारतीय स्टार्ट-अप की बुलंदी की दिलचस्प कहानी बयान करती है. इसे एग्जीक्यूटिव एडिटर एम.जी. अरुण और डिप्टी एडिटर श्वेता पुंज ने लिखा है

जैसा कि हर कारोबार के साथ होता है, इस बुलंदी का एक दूसरा पहलू भी है. बाजार मूल्य में इजाफा धारणाओं का खेल है. नकदी खर्च भारी है और कई घरेलू निवेशक और वित्तीय सलाहकार आगाह करते हैं कि भारतीय स्टार्ट-अप का संसार हवा भरे गुब्बारे की तरह है. जाहिर है, इससे इस कारोबारी मॉडल के टिकाऊपन को लेकर आशंकाएं बढ़ गई हैं

दरअसल, हर यूनिकॉर्न के लिए दर्जनों स्टार्ट-अप बर्बाद होते हैं या मजदूरी करने जैसी हालत में पहुंच जाते हैं. हालांकि निवेशक मुनाफे की उक्वमीद में पैसा लगाए जा रहे हैं. भारतीय स्टार्ट-अप की बुलंदी का कभी शुभंकर जैसा रहा फ्लिकार्ट 14 साल पहले अपनी शुरुआत से ही लगातार घाटे में चल रहा है. महामारी में ऑनलाइन कक्षाओं की भारी मांग के बावजूद बायजूÓज मार्केटिंग में भारी खर्च के कारण 2020-21 में अपने 15 करोड़ डॉलर मुनाफे के लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया.

फिर भी उनमें निवेश करने वाले भरोसा बनाए हुए हैं. उनके मुताबिक, यह खेल ऐसा है कि ''कौन आखिर तक टिका रहता है’’और ये स्टार्ट-अप ऐसे ''ठिकाने’’ हैं जहां उपभोन्न्ताओं के पास जरूरी उत्पाद या सेवाओं के खातिर लौट-लौट कर आना पड़ेगा. हालांकि सबसे अहम ''खर्च सहने की दरÓÓ है, यानी निवेशक हाथ झाड़ लेने के पहले कितना घाटा उठाने को तैयार हैं.

इन तमाम जोखिम के बावजूद यूनिकॉर्न वाकई अच्छे हैं. इनसे पता चलता है कि कारोबार कैसा होना चाहिए. उनके पास एक बड़ा आइडिया है, उसमें वे पूरी लगन से जुट जाते हैं और ऐसे मुस्तैद रहते हैं, जो बाकी कारोबार में नहीं हो सकता है. वे ऐसे वन्न्त रोजगार पैदा कर सकते हैं, जब हर ओर रोजगार गायब हो रहे हैं.

कंसल्टिंग फर्म केपीएमजी का अनुमान है कि इस साल ई-कारोबार और उससे जुड़े लॉजिस्टिक और भंडारण क्षेत्र जैसे मामलों में 14.5 लाख रोजगार पैदा होंगे. स्टार्ट-अप इनोवेशन और उद्यमशीलता की संस्कृति भी पैदा करते हैं. इससे बदले में समाज में रचनात्मक विखंडन पैदा होता है, जो प्रगति की ओर ले जाता है. तो, यूनिकॉर्न का यही फलीतार्थ है. उनकी जमात फले-फूले! 

(अरुण पुरी)

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें