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प्रधान संपादक की कलम से

इतना हम जरूर जानते हैं कि इस महामारी से निबटने के लिए हम जरूरी साधनों से पूरी तरह लैस नहीं हैं.

12 अगस्त, 2020 का आवरण 12 अगस्त, 2020 का आवरण

अरुण पुरी

इस वक्त जब हम कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर से गुजर रहे हैं, भारत के ऊपर भय की चादर पसरी है. 26 मई तक देश में 3,11,388 लोग जान गंवा चुके हैं और कुछ ब्योरों की मानें तो असल संख्या कहीं ज्यादा हो सकती है. दूसरी लहर में हमने मौत और बीमारी को कहीं ज्यादा प्रचंडता से अपने घरों और शहरों में आते देखा.

महामारी में अब तक जितनी मौतें हुईं, उनमें से करीब आधी बीते दो महीनों में हुई हैं. हममें से बहुत कम ही होंगे जो अपने परिजनों या दोस्तों या साथियों को खो देने की पीड़ा से अछूते रह गए हैं. कोविड के आगे दम तोड़ देने वालों में कई खासे तंदुरुस्त लोग भी थे, जो अपनी जिंदगी के यौवनकाल में चले गए.

हमारे मन-मस्तिष्क को यह समझ पाने में बड़ी मुश्किल हुई है कि इतनी तेजी से यह सब कैसे हुआ और इतने सारे लोग हमेशा के लिए कैसे चले गए. इसने वजूद की चिंता के सबसे बुनियादी रूप को उभार दिया और वह है—मरने का डर. पता चलता है कि डर और चिंता की यह लंबी छाया ही महामारी का छिपा हुआ पहलू है. कितने सारे सवाल दिमाग को झकझोर रहे हैं: ‘क्या मुझे यह वायरस लग जाएगा?’

‘क्या मुझे गंभीर तकलीफ उठानी होगी?’, ‘क्या मेरा हश्र भी अंतत: अपने करीबी परिवार और खासकर घर के बुजुर्गों को संक्रमित करने में होगा?’, ‘क्या मैं अपनी नौकरी से हाथ धो बैठूंगा’ या ‘आमदनी घटने पर मैं गुजारा कैसे करूंगा?’ इस किस्म के सवालों ने न केवल तनाव से जुड़ी बीमारियों की आशंका से घिरे लोगों की तकलीफ बढ़ा दी है बल्कि लोगों के नए समूहों को घेर लिया है. मुंबई के जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. हरीश शेट्टी इसे ‘फियरोडेमिक’ या भय के प्रकोप का संकट कहते हैं.

सामाजिक दूरी और लॉकडाउन बेशक कोविड को फैलने से रोकने के लिए बेहद जरूरी हैं, लेकिन उनके चलते जो अकेलापन और अलगाव झेलना पड़ा, उसने तनाव और चिंता को बहुत बढ़ा दिया. संक्रमण को लेकर पैदा उन्माद ने हमें दूसरों को इस अदृश्य वायरस के संभावित वाहक के तौर पर दिखाया. दूसरी ज्यादातर बीमारियों के विपरीत, कोविड-19 के मरीजों का इलाज परिवार और दोस्तों से दूर आइसोलेशन में किया जाता है. मौत का शोक भी अलगाव में ही मनाया जाता है.

उस कोविड पॉजिटिव शख्स की तकलीफ देखिए, जो कोविड से अपनी पत्नी के मरते वक्त उसकी बगल में खड़ा नहीं रह सका. ऐसे कई मामलों में अपने प्रियजनों के मरते समय लोग उनके करीब भी नहीं जा पाए. जो चीज लाचारी के इस एहसास को बढ़ा रही थी, वह थी नागरिकों के मन में यह डर कि उन्हें अपना इंतजाम खुद करना होगा क्योंकि सरकार संकट से निबटने की जद्दोजहद में लगी थी.

बच्चों पर भी असर पड़ा. सामाजिक अलगाव, अस्त-व्यस्त दिनचर्या और मन बहलाने की गतिविधियों की सीमित सुलभता ने उनकी मनो-सामाजिक कुशलता पर गहरा असर डाला. युनिसेफ के प्रमुख ने इस साल मार्च में कहा कि दुनिया भर में हर सात में से एक या 33.2 करोड़ बच्चों को बढ़ाए गए लॉकडाउन में रहना पड़ा और वे मानसिक स्वास्थ्य की परेशानियों के आगे लाचार रह गए. इसने माता-पिता का तनाव और बढ़ा दिया. चिकित्सा की दुनिया का यह सुस्थापित तथ्य है कि तनाव से रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है. इससे कोविड-19 वायरस की प्रचंडता उजागर होती है. यह एक दुष्चक्र बन जाता है.

द लांसेट साइकिएट्री पत्रिका में अप्रैल में छपे एक अध्ययन ने बताया कि अमेरिका में 2,30,000 से ज्यादा मरीजों में ‘‘कोविड-19 के संक्रमण के बाद छह महीनों में स्नायुतंत्र से जुड़ी और मानसिक बीमारियां’’ देखी गईं. हमें नहीं पता कि भारत में यह संख्या कितनी है, लेकिन बहुत अलग नहीं होगी. इतना हम जरूर जानते हैं कि इस महामारी से निबटने के लिए हम जरूरी साधनों से पूरी तरह लैस नहीं हैं. 2021-22 के केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य के लिए तय 2.23 लाख करोड़ रुपए में मानसिक स्वास्थ्य के लिए महज 40 करोड़ रुपए थे. भारत में हर 4,00,000 लोगों पर महज दो मनोचिकित्सक और एक मनोवैज्ञानिक है, जबकि वैश्विक औसत प्रति 1,00,000 लोगों पर कम से कम नौ मानसिक स्वास्थ्यकर्मियों का है.

हमारी आवरण कथा ‘दहशत का दौर’ महामारी के इसी चिंताजनक नतीजे की पड़ताल करती है, जो सीनियर एडिटर सुहानी सिंह ने तमाम ब्यूरो की सूचनाओं के साथ लिखी है. भय और घबराहट को कम करने का रास्ता बेशक यही है कि हम अपना ख्याल रखें. भावनाओं को भीतर घुमड़ने न दें और दोस्तों-परिजनों से जुड़ने के रास्ते खोजें, सुरक्षित रहते हुए. तनाव और थकान कम करने के लिए व्यायाम करें, सेहतमंद खाना खाएं और अच्छी नींद सोएं. साथ की स्टोरी में डिप्टी एडिटर कौशिक डेका पड़ताल कर रहे हैं कि स्कूल और सामाजिक जिंदगी ऑनलाइन आ जाने के कारण बच्चों में तनाव कैसे बढ़ रहा है.

मुझे करीब महीने भर पहले कोविड हुआ था. होम आइसोलेशन और ऑनलाइन होम केयर के बल पर मैं ठीक हो गया हूं. खुशकिस्मती से यह हल्का झटका था, शायद इसलिए कि मैं दो वैक्सीन की दोनों खुराक लगवा चुका था, पर मुझे भावनात्मक सदमे से तो गुजरना ही पड़ा. अब झूठी तसल्ली के लिए मैं नेटफ्लिक्स पर बहुत अच्छी बनाई गई सीरीज ग्रेटेस्ट इवेंट्स ऑफ वर्ल्ड वॉर टू देख रहा हूं.

यह मुझे याद दिलाती है कि लोग उस वक्त किस नरक से गुजरे थे जब बम बरस रहे थे और जहां-तहां लोगों को मार रहे थे, लाखों सैनिक अपने देश की महिमा के लिए मौत की तरफ कूच कर रहे थे और लोग उन छह भयावह सालों के दौरान कितनी तंगहाली में रहे थे. लोगों ने बेपनाह तकलीफ झेली थी.

उस युद्ध में 7.5 करोड़ लोग मारे गए, जिनमें से 4 करोड़ नागरिक थे. दुनिया उस दारुण विपत्ति में किसी तरह बची रही और जब वह खत्म हो गई, लोग फिर ताना-बाना जोड़कर अपनी जिंदगी का पुनर्निर्माण करने निकल पड़े. इसके बाद दुनिया ने ऐसी आर्थिक प्रगति देखी जो सदी के अंत तक जारी रही.

महामंदी के चरम पर तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट ने 1933 के अपने पहले उद्घाटन भाषण में कहा था, ‘‘हमारे पास डरने के लिए खुद डर के अलावा कुछ नहीं है.’’ तो इसे ही गंभीरता से लें क्योंकि यह दुस्वप्न भी गुजर ही जाएगा.

(अरुण पुरी)>

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