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प्रधान संपादक की कलम से

वायरस कुदरत की शक्ति है, हम जो त्रासदी झेल रहे हैं वह इनसान की बनाई है. यह आपराधिक नाकारेपन, सत्ताधारियों में दूरदृष्टि के अभाव, घोर कुप्रबंधन, अफसरशाही काहिली, ढीला-ढाला अमल और सबसे ज्यादा, राजनैतिक अक्खड़पन का नतीजा है

3 मार्च, 2021 का आवरण 3 मार्च, 2021 का आवरण

अरुण पुरी

समय से पहले घोषित जीत की सबसे स्याह कहानी ग्रीक मिथकशास्त्र में है. ट्रोजन की जंग के आखिर में हमलावर ग्रीक के राज्य और शहर ट्रॉय पर अपना 10 साल का कब्जा छोड़कर समुद्र के रास्ते रवाना हो गए. उन्होंने लकड़ी का एक विशाल घोड़ा वहीं छोड़ दिया. इस झूठे यकीन से कि वे जीत गए हैं, उन्होंने बंधकों को छोड़ दिया और घोड़े को शहर के अंदर ले जाकर रख दिया. जब ट्रोजन सो रहे थे, घोड़े के अंदर छिपे ग्रीक लड़ाके चुपचाप निकले और दरवाजे खोलकर शहर को बर्बादी की तरफ धकेल दिया.

यह उस पड़ाव का रूपक हो सकता है जहां भारत इस साल की शुरुआत में था. फरवरी में पहली लहर के सुस्त होते ही हमने मान लिया कि कोविड रुखसत हो चुका है और अपना रोजमर्रा का काम फिर शुरू कर दिया, डॉक्टरों तथा वैज्ञानिकों के बताए मास्क और सामाजिक दूरी के नियमों को तिलांजलि दे दी और क्षितिज पर गहराती दूसरी लहर की संभावना को भुला बैठे. इस साल जनवरी में सरकार ने तो फतह का ऐलान ही कर दिया था.

सरकार की गलत प्राथमिकताओं से हमारा टीकाकरण कार्यक्रम गड़बड़ा गया. तभी बगैर किसी चेतावनी के दूसरी लहर टूट पड़ी. इसकी बुनियादी खासियत है रफ्तार, रौद्रता और नए बदले हुए रूप, जिन्हें हम अभी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं. इतना हम जरूर जानते हैं कि मिथकीय ट्रोजनों की तरह हमने सतर्कता में ढील दे दी. इसकी भारी कीमत हम चुका रहे हैं. बीते हफ्ते भारत कोविड के मामलों के रोज नए रिकॉर्ड कायम करता रहा है. 26 अप्रैल को 3,50,000 नए मामले दर्ज हुए. पिछले साल पहली लहर में हमारा शिखर 16 सितंबर को 97,894 नए मामलों का था.

भारत अब 2,00,000 से ज्यादा मौतों के साथ अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा प्रभावित देश है. नई लहर भले ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र सहित 12 राज्यों में प्रचंड हो, लेकिन तेजी से बाहर भी फैल रही है. दुखद यह कि राष्ट्रीय राजधानी दूसरी लहर का केंद्र है जहां 27अप्रैल को 24,149 नए मामले और 381 मौतें दर्ज हुईं और मायूसी व शोक के दृश्य दिल तोड़ने वाले हैं. मुंबई में रोज के मामले घटे हैं, हालांकि हम यकीन से नहीं कह सकते कि यह टेस्ट में कमी की वजह से नहीं है. साफ है कि स्वास्थ्य सेवा के ढांचे पर जबरदस्त बोझ है.

दूसरी लहर में वायरस के नए रूपों ने हमारे फेफड़ों पर ज्यादा तेजी और उग्रता से हमला बोला. पहली लहर के तजुर्बे ने हमें सिखाया कि जिंदगी बचाने की कुंजी ऑक्सीजन है. दुखद यह कि केंद्र और राज्य सरकारें ये सबक भूल गईं. पहली लहर सुस्त होते ही उन्होंने फतह का ऐलान कर दिया. कई राज्यों ने जो अतिरिक्त क्षमताएं निर्मित की थीं, उन्हें रफा-दफा कर दिया. अस्थायी अस्पताल और ऑक्सीजन वाले बिस्तर हटा दिए, जो दूसरी लहर से लड़ने में बेहद अहम होते.

नया उछाल तेजी से देश की उस कोविड क्षमता को पीछे छोड़ने की संभावना से भरपूर है, जिसमें सितंबर 2020 के आंकड़ों के मुताबिक, 15 लाख आइसोलेशन बेड, 2,30,000 ऑक्सीजन बेड और 63,758 आइसीयू बेड हैं. केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल के मसले भी हैं. दोनों ने कोताही बरती. केंद्र-राज्य में सबसे बुरा तालमेल नई दिल्ली में था, जहां ऑक्सीजन वितरण का तंत्र ढह गया और क्रिटिकल केयर बेड पर मरीजों ने दम तोड़ दिया. राज्य सरकार ने ऑक्सीजन टैंकरों की आवाजाही पर नजर रखने के लिए निगरानी व्यवस्था या कंट्रोल रूम कायम नहीं किया.

केंद्र सरकार को पिछले साल से ही कम से कम चिकित्सा ऑक्सीजन की जरूरत का अंदेशा था, लेकिन वह मांग में तेज उछाल का अंदाज लगाने में नाकाम रही. केंद्र और राज्य क्षमता नहीं बढ़ा पाए. अप्रैल के आखिर में जब अस्पतालों में ऑक्सीजन खत्म हो गई तो पता चला कि तरल ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए क्रायोजेनिक टैंकर और ऑक्सीजन ट्रकों और अंतिम छोर पर डिलिवरी के लिए सिलिंडरों की कमी है. और यथास्थान ऑक्सीजन बनाने के संयंत्रों भी कम हैं—जिनकी मंजूरी दी पर बनाए नहीं—जिनसे टैंकरों पर निर्भरता कम हो सकती थी.

जिन सरकारी अफसरों ने दूसरी लहर का पूर्वानुमान लगाया और उसके लिए वाकई तैयारी रखी, उनमें पूर्वी महाराष्ट्र के सुदूर जिले के कलेक्टर थे. पिछले सितंबर में उन्होंने चिकित्सा ऑक्सीजन मुहैया करने के लिए तरल ऑक्सीजन संयंत्र लगाया, कई आइसोलेशन वार्ड बनाए और कोविड टीकाकरण अभियान की तैयारी की. काश केंद्र और राज्य उनसे सीख पाते.

परेशानी की जड़ मांग और पूर्ति का अंतर है. चिकित्सा ऑक्सीजन की मांग में करीब 10 गुना बढ़ोतरी हुई है. सबसे ज्यादा प्रभावित 12 राज्यों में यह इस साल पहले 700 मीट्रिक टन प्रति दिन (एमटीडी) से 30 अप्रैल को अनुमानित 6,593 एमटीडी पर पहुंच गई. यहां तक कि महाराष्ट्र सरीखे ऑक्सीजन बनाने वाले बड़े राज्य भी कमी झेल रहे थे. लोगों ने ऑक्सीजन सिलिंडरों और रेमडेसिविर इंजेक्शनों की जमाखोरी शुरू कर दी. यह पक्का संकेत था कि लोग सरकारों की इंतजाम करने की क्षमता में यकीन खो बैठे थे. कुछ राज्यों में चिकित्सा के बुनियादी ढांचे की लगातार अनदेखी ने दूसरी लहर में हमें तहस-नहस कर दिया. वैश्विक मानक प्रति 10,000 लोगों पर 10-45 बिस्तर है. भारत में 10,000 लोगों पर औसतन केवल 5 बिस्तर हैं.

हमारे हाथों में अपना चौगुना काम है—ऑक्सीजन सप्लाई बढ़ाना, संक्रमण का वक्र उलटना और उसे फैलने से रोकना, टीकाकरण क्षमता में इजाफा करना और परिचारकों तथा डॉक्टरों वाले ऑक्सीजन बिस्तरों सरीखे अस्पताल के और ज्यादा बुनियादी ढांचे का तेजी से निर्माण करना. ऐसा इसलिए कि दूसरी लहर भारत के उन हिस्सों में फैल सकती है जहां स्वास्थ्य व्यवस्था बेहद लचर है.

हमारी आवरण कथा 'ब्रीदलेस' का पूरा पैकेज देश भर में दूसरी लहर के असर का जायजा लेता है. एक्जीक्यूटिव एडिटर संदीप उन्नीथन ने ऑक्सीजन संकट की पड़ताल की. एक्जीक्यूटिव एडिटर एम.जी. अरुण और एसोसिएट एडिटर अनिलेश एस. महाजन ने भारत के 6.34 करोड़ एमएसएमई पर इसके असर की थाह ली. साथ ही, सीनियर डिप्टी एडिटर अमरनाथ के. मेनन ने हमारे टीकाकरण अभियान की चुनौतियों को जांचा-परखा. हमारे अनेक राज्य ब्यूरो ने ग्रामीण भारत में वायरस के फैलाव का पता लगाया.

वायरस कुदरत की शक्ति है, लेकिन हम जो त्रासदी झेल रहे हैं वह इनसान की बनाई है. यह आपराधिक नाकारेपन, सत्ताधारियों में दूरदृष्टि के अभाव, घोर कुप्रबंधन, अफसरशाही काहिली, बहुत ज्यादा नियम-कायदे, ढीला-ढाला अमल और सबसे ज्यादा, राजनैतिक अक्खड़पन का नतीजा है. मैं अपने साथी नागरिकों को सांस के लिए तड़पता देखने से बदतर दृश्य की कल्पना नहीं कर सकता. भारत बेहतर का हकदार है. बहुत बेहतर का.

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