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प्रधान संपादक की कलम से

वायरस के नए रूपों पर रिसर्च, असरदार दवाओं और प्रभावी वैक्सीन के बावजूद महामारी रौद्र रूप धारण करती जा रही है. लिहाजा कहना होगा कि हम अनजाने खतरों के समुद्र में तैर रहे हैं

21 अप्रैल, 2021 का आवरण 21 अप्रैल, 2021 का आवरण

अरुण पुरी

हमारा देश युद्धरत है,'' जनरल वी.पी. मलिक ने 18 अप्रैल को ट्वीट किया. आखिरी बार युद्ध में सेना की अगुआई करने वाले भारतीय सेना प्रमुख होने के नाते वे बेहतर जानते हैं. देश में हर दिन 2,000 लोग कोविड-19 से हारकर जान गंवा रहे हैं, जो 1999 में 11 हफ्ते चले करगिल युद्ध में हताहत सैनिकों की तादाद से चार गुना हैं. मगर एक अहम फर्क है—यह महामारी कहीं दूर सरहद पर जनरलों और पेशेवर सैनिकों के बीच लड़ी जा रही जंग नहीं है.

दूसरी लहर की सूनामी हमारे कस्बों और शहरों में आ धमकी है, हमारे दोस्तों, पड़ोसियों और रिश्तेदारों को आगोश में ले रही है, हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा उठी है, लोगों को अस्पताल में बिस्तर, ऑक्सीजन सिलिंडर और मृतकों की अंत्येष्टि के लिए श्मशान में समय लेने के लिए भी छीना-छपटी पर मजबूर कर रही है. 15 अप्रैल से रोज 2,00,000 से ज्यादा लोग एक दिन में संक्रमित हो रहे हैं, जो पिछले साल महामारी की शुरुआत के बाद दुनिया भर में नए मामलों की सबसे बड़ी तादाद है. भारत के 1.5 करोड़ सक्रिय मामलों में से 80 फीसद दस राज्यों—दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और राजस्थान—में हैं. दूसरी लहर की मृत्यु दर पहली की तरह भले 1 फीसद हो, लेकिन यह ज्यादा संक्रामक है जो खौफनाक रफ्तार से देश की चीरती चली जा रही है.

सक्रिय मामले हर 10 दिन में दोगुने हो रहे हैं. राष्ट्रीय टेस्ट पॉजिटिव दर इस हफ्ते औसतन 13.5 फीसद रही और 20 अप्रैल को एकाएक 20 फीसद पर जा पहुंची (डब्ल्यूएचओ मौजूदा उछाल सरीखी स्थिति से बचने के लिए इसे 5 फीसद से नीचे रखने की सिफारिश करता है). कुछ राज्यों में पॉजिटिव दर 30 फीसद है, जिसका अर्थ है हर तीन में एक शख्स का टेस्ट पॉजिटिव निकलना. भारत अब अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा ग्रस्त देश है, जहां हालात और बिगड़ सकते हैं. सरकार को भी इस हकीकत की सुध आई इसीलिए उसने टीके 18 वर्ष से ऊपर के लोगों के लिए खोल दिए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 अप्रैल को देशव्यापी लॉकडाउन की संभावना को खारिज कर दिया. पिछले साल मार्च में, जब विशेषज्ञ वायरस को ठीक से अभी समझ ही रहे थे, भारत ने 68 दिनों का जो लॉकडाउन लगाया था, उससे अर्थव्यवस्था को गंभीर नुक्सान पहुंचा. इस बार प्रधानमंत्री ने अर्थव्यवस्था की सेहत को देश की सेहत जितना ही जरूरी बताते हुए कोविड के संक्रमण की शृंखला तोड़ने के लिए माइक्रो-कंटेनमेंट जोन और स्व-अनुशासन पर जोर दिया. हफ्तों भीषण गलतियां करने, आरोप-प्रत्यारोप मढ़ने, विदेशी वैक्सीनों को मंजूरी देने में हीला-हवाली करने और टुकड़ों में टीकाकरण कार्यक्रम शुरू करने के बाद सरकार ने दवाइयों या वैक्सीनों की कमी से इनकार किया है. उसने नियम-कायदों में ढील और निजी क्षेत्र को आने की इजाजत दे दी. यह स्वागतयोग्य कदम था लेकिन उस दिन नए मामले पहले ही 2,90,000 और टेस्ट पॉजिटिविटी दर 17 पर जा पहुंची थी.

राज्य खुद अपनी रणनीतियों पर चल रहे हैं. दूसरे सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य दिल्ली ने हफ्ते भर का लॉकडाउन लगाया है. महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश ऐसे ही उपायों पर गौर कर रहे हैं. यह अब भी साफ नहीं है कि दूसरी लहर कब तक टिकेगी. लेकिन एक चीज तय है. हम एक अनदेखे और तेजी से रूप बदलने वाले दुश्मन से दो-चार हैं, जो अनियंत्रित छोड़ दिए जाने पर देश भर में कहर बरपा सकता है. संक्षेप में कहें तो हम एक संपूर्ण युद्ध झेल रहे हैं जो 1918 के स्पेनिश फ्लू से मिलता-जुलता है.

युद्ध केवल सेना नहीं लड़ती, बल्कि राज्यसत्ता के समूचे संसाधनों के बल पर पूरा देश लड़ता है, यह लड़ाई भी व्यक्ति या सरकारें अलग-अलग नहीं लड़ सकतीं.  इसके लिए समन्वित केंद्रीय नजरिये और सभी राष्ट्रीय संसाधनों के संयोजन की जरूरत होती है. कुछ कदम हैं जो सरकारों और राज्यों को युद्ध स्तर पर उठाने होंगे. पहला, हमें अपनी टेस्ट की सुविधाओं को मजबूत करना होगा. ज्यादातर शहरों में टेस्ट के नतीजे मिलने में पहले के छह घंटों के मुकाबले अब चार दिन लग रहे हैं. अगर तेजी से पर्याप्त टेस्ट नहीं करेंगे तो पता ही नहीं चलेगा कि संक्रमण किस हद तक है.

पहली लहर में 80 फीसद मामले बगैर लक्षणों वाले थे, 20 फीसद को अस्पताल में भर्ती कराने और उनमें से 5 फीसद को आइसीयू तथा 1 फीसद के वेंटिलेटर की जरूरत पड़ी थी. दूसरी लहर में भी यही सच है, सिवा इसके कि संक्रमितों की कुल तादाद कहीं ज्यादा है. हमें इस अदृश्य, तेजी से बढ़ते दुश्मन के जीनोम का पता लगाने पर संजीदगी से ध्यान देने की जरूरत है. जीनोम सीक्वेंसिंग, यानी पैथोजीन की जेनेटिक संरचना का अध्ययन, आरंभिक चेतावनी की प्रणाली है.

इससे हम जान सकते हैं कि वायरस कहां-कहां और कैसे-कैसे घूम रहा है. सरकार वायरस के रूप बदलने की स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चेतावनियों के आगे बहरी हो गई थी. एक स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने हमसे कहा कि हम नए रूपों के क्लिनिकल लक्षणों पर नजर रखने में नाकाम रहे इसीलिए हम ऑक्सीजन की बढ़ती मांग सरीखी चुनौतियों के लिए तैयार नहीं हो सके. हमें संक्रमण की लहरें थामने के लिए वैक्सीन का उत्पादन बढ़ाना होगा और सभी को जल्द टीका लगाना होगा. यह रॉकेट साइंस नहीं है—बीमार देश की कीमत वैक्सीन की कुछ अरब शीशियों की कीमत से कहीं ज्यादा है.

महामारी ने दहशत फैला दी है. जीवनरक्षक दवाइयों, इंजेक्शनों और ऑक्सीजन सिलिंडरों की जमाखोरी हो रही है. पिछले साल की तरह प्रवासी मजदूरों के जत्थों के अपने घरों की तरफ उमड़ पड़े हैं. सरकार को चाहिए कि चौबीसों घंटे सातों दिन काम करने वाले आपातकालीन नियंत्रण कक्ष बनाए और अपनी काबिलियत में लोगों का भरोसा बहाल करे. अगर इलेक्शन वॉर रूम संभाल सकती और देशव्यापी राजनैतिक अभियान चला सकती है तो दहशत से भी लड़ सकती है. डिजिटल इंडिया, यानी वह देश जहां दुनिया के दूसरे सबसे ज्यादा स्मार्टफोन यूजर और दुनिया का सबसे नफीस पहचान पत्र कार्यक्रम आधार है, अगर जरूरत में अपने लोगों के काम नहीं आया, तो यह शर्म की बात होगी.

हमारी आवरण कथा 'नया डर, उखड़ती सांसें' कोविड की दूसरी लहर की भयावहता और उससे लड़ने की रणनीतियां सामने रखती है. इसे देश भर में फैले ब्यूरो की रिपोर्ट के साथ एसोसिएट एडिटर सोनाली अचार्जी ने लिखा है. साफ है कि इस लड़ाई को लड़ना और जीतना ही होगा. आतंक के विरुद्ध अमेरिका की लड़ाई का हिस्सा रहे पूर्व अमेरिकी रक्षा मंत्री डोनाल्ड रम्सफेल्ड ने कहा था, ''कुछ खतरे हमें पता हैं, कुछ खतरे पता हैं पर पूरी तरह नहीं पता हैं और कुछ खतरों के बारे कुछ भी नहीं पता है.''

वायरस के नए रूपों पर रिसर्च, असरदार दवाओं और प्रभावी वैक्सीन के बावजूद महामारी रौद्र रूप धारण करती जा रही है. लिहाजा कहना होगा कि हम अनजाने खतरों के समुद्र में तैर रहे हैं. लगातार सतर्कता रखना, हर जानकारी पर नजर रखना, रणनीतियां विकसित करना, एकजुट रहना और सामुदायिक स्तरों पर जवाबदेही लेना ही समाधान है. हम बतौर देश काफी आपदाएं झेल चुके हैं. हम इससे भी उबर ही जाएंगे.

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