scorecardresearch
 

प्रधान संपादक की कलम से

भाजपा के नए प्रमुख अब भी अपनी सबसे बड़ी चुनौती की गहमागहमी के बीचोबीच हैं और उन सात में से चार राज्यों के चुनावों में पार्टी को रास्ता दिखा रहे हैं.

8 जून, 2016 का आवरण 8 जून, 2016 का आवरण

अरुण पुरी

भारत के ठेठ जमीनी राजनैतिक बदलावों में से एक भाजपा का समग्र कायाकल्प रहा है. वह प्रमुख विपक्षी धड़े से दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी में बदल गई है जो 15 करोड़ से ज्यादा सदस्य होने का दावा करती है. 2014 में राष्ट्रीय फलक पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके पार्टी प्रमुख अमित शाह के आगमन ने इस बदलाव का डंका पीटा. बीते सात सालों में भाजपा ने अपने को चुनाव लडऩे की अथक मशीन में तब्दील कर लिया है जो हमेशा चुनाव अभियान के अंदाज में मालूम देती है.

यह जीती-जागती पेचीदा बनावट राष्ट्रीय सरकार के शिखरों से लेकर ठेठ नीचे पहले ‘पन्ना समितियां’ कही जाने वाली बूथ समितियों तक जाती है, जो वोटरों और कार्यकर्ताओं को लामबंद करती हैं और जिन्हें लगातार निखारा जाता है. इतना जबरदस्त संगठन खड़ा करना और उसे कामयाबी से चलाना हैरतअंगेज प्रबंधकीय कमाल है, इतना कि हार्वर्ड बिजनेस स्कूल इसे अध्ययन के लायक मानता है. पार्टी के पास दोटूक रणनीति है और यह राज्य और यहां तक कि नगर पालिका के चुनाव भी उसी जोशो-खरोश से लड़ती है जिससे वह आम चुनाव लड़ती है.

यह आठ राज्यों में अपने दम पर और अन्य नौ राज्यों में गठबंधनों के साथ सत्ता में है. भारत के 48 फीसद भूभाग पर उसकी हुकूमत है. उसकी सत्ता की भूख चुनाव नतीजों से शांत नहीं होती. मध्य प्रदेश, हरियाणा और गोवा में पार्टी बहुमत से पीछे रह गई थी लेकिन गठबंधन के जरिए या दूसरी पार्टियों के नुमाइंदों को लुभाकर उसने सरकारें बना लीं. राजस्थान में पिछले साल कांग्रेस की सरकार गिरने से बाल-बाल बची.

कुछ ही हफ्तों पहले पुदुच्चेरी में कार्यकाल खत्म होने से कुछेक हफ्ते पहले नारायणसामी की सरकार के गिरने के पीछे भाजपा का हाथ माना जाता है. विपक्ष शासित कोई राज्य सुरक्षित नहीं है, खासकर जब उसका मुकाबला एक ऐसे विपक्ष से है जो कभी सोता नहीं, कभी हार नहीं मानता और मानता है कि राजनीति साल के 365 दिन, चौबीसों घंटे, सातों दिन, कर्तव्य की पुकार है. यह कहना समीचीन होगा कि भारत ने भाजपा 2.0 सरीखी आक्रामक और सुसंगठित दूसरी राष्ट्रीय पार्टी पहले कभी नहीं देखी.

चुनाव लड़ने की इस दुर्जेय मशीन को गढ़ने का ज्यादातर श्रेय शाह को जाता है जिन्होंने भाजपा प्रमुख की कमान पिछले साल पार्टी के अंतरंग जगत प्रकाश नड्डा को सौंप दी. नड्डा ने 1998 से ही मोदी और शाह के साथ काम किया है. असल में उन्हें 2013 में ही पार्टी अध्यक्ष के तौर पर राजनाथ सिंह की जिम्मेदारी संभालने का इशारा कर दिया गया था.

शांत, मिलनसार और सुव्यवस्थित नेता को इस पद के लिए तैयार किया गया और जून 2019 से वे कार्यवाहक अध्यक्ष के तौर पर काम कर रहे थे. उनके कंधों पर बहुत भारी जिम्मेदारी है. पार्टी के अध्यक्ष के नाते इन 14 महीनों में नड्डा ने बिहार के चुनावों की देख-रेख की, जहां भाजपा ने न केवल गठबंधन सरकार बनाई बल्कि पहली बार गठबंधन के भागीदार जद (यू) को पीछे छोड़ दिया.

भाजपा के नए प्रमुख अब भी अपनी सबसे बड़ी चुनौती की गहमागहमी के बीचोबीच हैं और उन सात में से चार राज्यों के चुनावों में पार्टी को रास्ता दिखा रहे हैं जो भाजपा की ‘कोरोमंडल रणनीति’ यानी दक्षिण में केरल से लेकर पूरब में पश्चिम बंगाल तक फैले सतत भूभागीय विस्तार में अपनी मौजूदगी स्थापित करने के मंसूबे का अंग है. 2016 में पहली बार शाह ने इस इलाके पर ध्यान दिया जहां भाजपा की राजनैतिक छाप नाम मात्र की है.

यह आखिरी सीमांत है जिसे भाजपा भेदना चाहेगी, ताकि फिर अपनी अखिल भारतीय मौजूदगी का दावा कर सके और कांग्रेस के उत्कर्ष के दिनों की रही-सही स्मृतियों को बेदखल कर सके. इस मंसूबे की सबसे बड़ी अड़चन यह हकीकत है कि उसे उत्तर भारतीय पार्टी माना जाता है और कई दक्षिणी राज्यों में प्रधानमंत्री मोदी की अपील सीमित ही है. इसीलिए तमिलनाडु और केरल के विधानसभा चुनाव उसकी लंबे वक्त की रणनीति में कहीं ज्यादा अहमियत अक्चितयार कर लेते हैं. इन राज्यों में अभी तक वह हाशिये की ही खिलाड़ी है.

हमारे इस अंक के लिए ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (पब्लिशिंग) राज चेंगप्पा और सीनियर एडिटर अनिलेश एस. महाजन ने अब तक के उनके सबसे विस्तृत इंटरव्यू के लिए नड्डा को पकड़ा. बेबाक, आत्मविश्वस्त और अनुशासित नड्डा ने न केवल अपनी पार्टी की मौजूदा रणनीति बयान की बल्कि भविष्य के गेम प्लान की रूपरेखा भी बताई. यह गेम प्लान संक्षेप में निरंतरता, मजबूती और विस्तार के लक्ष्य की तरफ बढऩा है. यह रणनीति तेलंगाना सरीखे राज्यों में भी जाहिर है जहां भाजपा ने सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के तौर पर कांग्रेस को बेदखल कर दिया है.

आने वाले महीनों में वह उन राज्यों में देखी जाएगी जहां पार्टी मुक्चय चुनावी लड़ाइयों में उलझी है—2022 में उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात; 2023 में राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश और उसके बाद 2024 का आम चुनाव. नड्डा जोर देकर कहते हैं कि भाजपा हर चुनाव जीतने के लिए लड़ती है. इस इंटरव्यू से उभरकर आई मुख्य जरूरी बातों में एक यह भी थी कि किस तरह उनकी पार्टी अपनी भावी रणनीति के तौर पर हिंदुत्व के बजाए राष्ट्रवाद का इस्तेमाल करना चाहती है. इसी ने हमें आवरण की इबारत दी, 'भाजपा की शक्ति उसकी एकजुटता में है.’’

यह चतुर रणनीति है. हिंदुत्व के बजाए राष्ट्रवाद की कहीं ज्यादा अखिल भारतीय अपील है, खासकर दक्षिण में, जहां भाजपा को शक की नजरों से देखा जाता है. लंबे वक्त की दूरदृष्टि से सन्नद्ध पार्टी अपने ज्यादातर राजनैतिक लक्ष्य हासिल करने के लिए ब्रांड मोदी का इस्तेमाल करने का मंसूबा बना रही है. ब्रांड मैनेजर की पूरी भाव-भंगिमा के साथ नड्डा बस इतना कहते हैं, ‘‘चुनाव अभियान के लिए उनकी सेवाओं का बेहतरीन इस्तेमाल करना पार्टी की जिम्मेदारी है.’’

इस सबके बावजूद, हर मर्ज की दवा मोदी या यूं कहें कि हरेक चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पर पार्टी की हद से ज्यादा निर्भरता के साथ स्थानीय नेतृत्व को विकसित न करने का जोखिम जुड़ा है. इस अनदेखी या चूक की वजह से महान पार्टियों को पतन का मुंह देखना पड़ा है. याद रखना चाहिए कि कांग्रेस का पतन ब्रांड गांधी पर हद दर्जे की निर्भरता और करिश्माई क्षेत्रीय नेताओं को हाशिये पर डाल देने के साथ शुरू हुआ था.

भाजपा की रणनीति का सबसे बड़ा इम्तिहान पश्चिम बंगाल में होना है. वहां अगर वह जीतती है तो दूसरे राज्यों में जहां उसकी मौजूदगी नहीं है, वह इसी फॉर्मूले को आजमाने की कोशिश करेगी. अगर नहीं जीती तो उसे आगे के चुनावों के लिए रणनीति नए सिरे से ढालने और चुनावी गणित पर नए सिरे से काम करने की जरूरत होगी. भाजपा और उसकी समग्र दूरदृष्टि के बारे में हम अब तक जो कुछ जानते हैं, उसको देखते हुए यह तय है. थोड़ी देर के लिए भी ठहरना कोई विकल्प नहीं.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें