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प्रधान संपादक की कलम से

हमारी आवरण कथा ‘बदनामी का बम’ बिखरे हुए टुकड़ों को जोड़कर इस अविश्वसनीय कहानी का तानाबाना बुनती है और इसके नतीजे सामने रखती है.

29 जून, 2011 का आवरण 29 जून, 2011 का आवरण

अरुण पुरी

बॉलीबुड का कोई धांसू पटकथा लेखक भी वह राजनैतिक थ्रिलर नहीं रच सकता, जो इन दिनों मुंबई में जारी है. एक बिगडै़ल पुलिस अफसर देश के सबसे अमीर शख्स के घर के बाहर विस्फोटकों से भरी एसयूवी खड़ी कर देता है और फिर खुद उस मामले की जांच करने लगता है. अपराध में उसके साझीदार उस गाड़ी के मालिक की हत्या में कथित तौर पर शामिल पाए जाते हैं.

एक पूर्व पुलिस कमिशनर राज्य के गृह मंत्री पर हर माह 100 करोड़ रुपए के लक्ष्य के साथ परिष्कृत वसूली रैकेट को मंजूरी देने का आरोप लगाता है. और आखिर में, विधानसभा में विपक्ष के नेता के जरिए सामने आई महाराष्ट्र के पुलिस अफसर की 2020 की एक चिट्ठी, जिसमें आरोप लगाया गया कि कुछ नेता पुलिस के तबादलों और तैनातियों से पैसा बना रहे थे. 16 माह पुरानी महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार अपने बदतरीन सियासी संकट से गुजर रही है.

एक दशक पहले मुंबई की परेशानियां बाहरी हुआ करती थीं. दुबई और बाद में कराची स्थित संगठित क्राइम सिंडिकेट फिल्म जगत और कारोबारी बिरादरी को आंतकित करते थे और अपनी हुकूमत चलाने के लिए भाड़े के हत्यारे भेज दिया करते थे.

बॉम्बगेट के खुलासों से अब संकेत मिलता है कि मुंबई की आपराधिक परेशानियां निरी भीतरी हैं. वे इतनी ज्यादा गंभीर और तकलीफदेह हैं कि देश में कहीं भी दूसरी जगह नहीं दिखाई देतीं. मुंबई में जो सामने आ रहा है, उसने देश के बदरतरीन रहस्यों के बदशक्ल तहखाने को बेपर्दा कर दिया है—खाकी और खादी की आरामदेह साठगांठ. संविधान में कानून और व्यवस्था राज्य का विषय है, लेकिन कुछ साल में राज्य का नियंत्रण इस हद तक पतित चुका है कि वहां किसी काम के लिए सबसे अच्छा शख्स वह है जो राजनैतिक पार्टी या नेताओं के इशारों पर नाचने को तैयार है.

मुंबई में यह साठगांठ हाल के वर्षों में देखी गई ऐसी मिलीभगत से कहीं ज्यादा संगीन मालूम देती है. वजहों के लिए दूर जाने की जरूरत नहीं है, ‘अधिकतम शहर’ में दांव कहीं ज्यादा ऊंचे हैं. महाराष्ट्र देश का सबसे ज्यादा औद्योगिक और शहरी राज्य है, जो राष्ट्रीय औद्योगिक उत्पादन में 20 फीसद योगदान देता है. देश की वित्तीय राजधानी मुंबई राज्य के जीएसडीपी में 30 फीसद हिस्सा रखती है.

नाइट फ्रैंक की मार्च 2019 की एक रिपोर्ट में मुंबई संपदा के लिहाज से दुनिया का 12वां सबसे अमीर शहर था, जो इससे पहले 2017 की अपनी18वीं पायदान से ऊपर उठकर यहां पहुंचा था. रिपोर्ट ने शहर में ‘अहम संपदा निर्माण’ पर रोशनी डाली. साफ तौर पर दुनिया के सबसे घने बसे महानगरों में से एक में 1.2 करोड़ आबादी की जरूरतें पूरी करने वाले बार, रेस्तरां और नाइटक्लबों से ढेरों पैसा बनाया जा सकता है. इसी ने शायद देश के पहले संगठित अपराध सिंडिकेटों को जन्म दिया जो तस्करी के रैकेट से बढ़कर वसूली तक पहुंच गए.

जब सरकार नाजुक डोर से बंधी हो, तब किसी भ्रष्ट नेता के मन में अपनी या अपनी पार्टी की जेबें भरने की एक निश्चित बेताबी पैदा हो जाती है. बीते दो दशकों के दौरान शहर की पुलिस ने कई ‘एनकाउंटर कॉप्स’ या विशेष पुलिस दस्ते मैदान में उतारे जिन्होंने इन सिंडिकेटों को खत्म करने के लिए कानून के हाशिए पर काम किया. लगता है, उनमें से कुछ ने अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए सीमा पार कर ली और खुद लुटेरे बन गए. 

एनकाउंटर कॉप्स उस वक्त अपने रसातल में पहुंच गए जब 2006 के एक खौफनाक मामले से खुलासा हुआ कि पुलिसवालों ने ही प्रतिद्वंद्वी के कहने पर एक गैंगस्टर का अपहरण और हत्या की हो सकती है. इस मामले के नतीजतन सुप्रीम कोर्ट के एक जज को दोषी पुलिसवालों को भाड़े के हत्यारे कहना पड़ा. एनकाउंटर दस्ते उसके बाद जल्द ही तितर-बितर कर दिए गए, लेकिन जैसा कि हालिया घटनाओं की अजीबोगरीब फितरत से साफ है, उनके तौर-तरीके बरकरार मालूम देते हैं. राष्ट्रीय जांच एंजेसी (एनआइए) की पड़ताल से और भी हैरतअंगेज चीजें सामने आ सकती हैं.

इस मामले और इसके खुलासों ने देश के सबसे बड़े विपक्ष-शासित राज्य—तीन पार्टियों के ढीलेढाले एमवीए गठबंधन सरकार—की स्थिरता को खतरे में डाल दिया. सरकार ने अडिय़ल रास्ता अपना कर गृह मंत्री को हटाने से इनकार कर दिया. नवंबर 2019 में कुछ वक्त राकांपा के साथ गठबंधन की संभावना टटोलने वाली विपक्षी भाजपा ने सरकार को तार-तार करने, बदनाम करने और अंतत: गिराने का अभियान छेड़ दिया.

देश में भ्रष्टाचार के दाग से ज्यादा कुछ भी नहीं चिपकता और यह बात शरद पवार से बेहतर कोई नहीं जानता, जिन्होंने 1995 में कांग्रेस के मुख्यमंत्री के नाते भ्रष्टाचार-विरोधी नारे पर चुनाव लडऩे वाली शिवसेना-भाजपा के हाथों मात खाई थी. कांग्रेस पार्टी की पराजय मुंबई में सबसे ज्यादा प्रबल थी, जहां वह शहर की 34 विधानसभा सीटों में से महज एक जीत सकी थी. भ्रष्टाचार के आरोपों पर कार्रवाई करने में वह जितनी ज्यादा देर करेगी और जितने लंबे वक्त तक जांच से और ज्यादा खुलासे होते रहेंगे, सरकार के लिए बचना उतना ही मुश्किल होता जाएगा.

हमारी आवरण कथा ‘बदनामी का बम’ बिखरे हुए टुकड़ों को जोड़कर इस अविश्वसनीय कहानी का तानाबाना बुनती है और इसके नतीजे सामने रखती है. इसे एग्जीक्यूटिव एडिटर संदीप उन्नीथन और सीनियर एडिटर किरण डी. तारे ने लिखा है.

जिस सरकार का वजूद टिक-टिक करते टाइम बम से खतरे में पड़ गया हो, वह भरोसा नहीं उपजा सकती. न ही वह पुलिस बल जिसकी साख पर इतना तीखा बट्टा लग गया हो. उद्धव ठाकरे सरकार को इस अनोखी कहानी की सचाई खोजनी होगी. फिलहाल कुछ भी साफ नहीं है.

हमें इस अपराध का मकसद नहीं पता. वहीं नेताओं और पुलिस के बीच आरोप-प्रत्यारोप मामले को और भी संदेहास्पद बना रहे हैं. देश के ग्रोथ इंजन के तौर पर मुंबई की भूमिका बेहद अहम है, खासकर तब जब देश की अर्थव्यवस्था धीमी बहाली के रास्ते पर है. बॉम्बगेट के साथ उतनी ही चुस्ती-फुर्ती और संजीदगी से निपटने की जरूरत है, जितने की वह हकदार है.

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