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प्रधान संपादक की कलम से

संकट की गंभीरता को पहचानकर इस सरकार ने जल जीवन मिशन के ‘हर घर नल से जल’ कार्यक्रम के तहत सालाना 3 करोड़ नए घरों में नल का जल पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है.

मुक्त प्रवाह ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा और ग्रुप फोटो एडिटर बंदीप सिंह गुजरात में ढांकी के नर्मदा पम्पहाउस के पास मुक्त प्रवाह ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा और ग्रुप फोटो एडिटर बंदीप सिंह गुजरात में ढांकी के नर्मदा पम्पहाउस के पास

अरुण पुरी

पानी जिंदगी है. मानव शरीर को इसकी जरूरत है और हम जो खाना खाते हैं उसे उगाने के लिए भी पानी की जरूरत है. आधुनिक जीवन के कई दूसरे प्रयोजनों, मसलन साफ-सफाई, के लिए भी इसकी जरूरत है. प्राचीन काल में मानव आबादियां पानी के सुरक्षित स्रोतों के इर्दगिर्द बसी थीं. इसकी आपूर्ति तयशुदा मान ली जाती है मानो यह अंतहीन हो. यह खामोश संकट है जो दुनिया के कई हिस्सों में घुमड़ रहा है.

आज जब हम अपनी स्वतंत्रता की 75वीं सालगिरह की तरफ बढ़ रहे हैं, अपने ज्यादातर नागरिकों को पीने के साफ पानी की आपूर्ति नहीं कर पाना भारतीय राज्य व्यवस्था की सबसे बड़ी नाकामियों में से एक है. ग्रामीण अखबार गांव कनेक्शन के 2019 के एक सर्वे ने बताया कि हालात कितने खराब हैं. इस अध्ययन से पता चला कि 39.1 फीसद भारतीय महिलाओं को पानी भरकर लाने के लिए घरों से बाहर निकलना पड़ता है.

सर्वे में शामिल 19 राज्यों की साठ फीसद महिलाओं ने कहा कि वे पानी लाने के लिए दिन में दो बार एक से पांच किलोमीटर पैदल चलती हैं. कल्पना कीजिए कि कितने घंटे ये लाखों महिलाएं उस एक चीज के लिए रोज व्यतीत करती होंगी जिसे हम शहरों के लोग बस एक नॉब घुमाकर हासिल कर लेते हैं. सोचिए कि इसकी कीमत उन्हें कितने अवसरों से हाथ धोकर चुकानी पड़ती है—यह समय वे शिक्षा, रोजगार या अपने परिवार की देखभाल पर लाभदायक ढंग से बिता सकती थीं.

70 फीसद के करीब भारतीयों को पीने के लिए नल का जल नसीब नहीं है. वितरण समस्या का महज एक हिस्सा है. भारत तेजी से पानी के खत्म होने की तरफ बढ़ रहा है. देश का भविष्य अंधकारमय नजर आता है, वह भी तब जब धरती की 18 फीसद आबादी यहां रहती है जिसे केवल 4 फीसद मीठा पानी उपलब्ध है.

आबादी बढ़ रही है और सतह जल नाकाफी है, ऐसे में संकट के और तीव्र होने की ही आशंका है. भारत में पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 50 साल पहले 5,000 घन मीटर थी जो आज घटकर 1,500 घन मीटर रह गई है. जैसा कि केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने हमारे साथ एक इंटरव्यू में कहा, समस्या ‘‘वाकई, वाकई बहुत बड़ी’’ है.

वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर का 2020 का एक अध्ययन कहता है कि 2050 तक 30 भारतीय शहर 'पानी का गंभीर संकट’ झेल रहे होंगे. वजहें खोजने के लिए दूर जाने की जरूरत नहीं है. हमारे शहर दुनिया के सबसे घने बसे शहरों में हैं और पेयजल सहित बुनियादी सिविक इन्फ्रास्ट्रक्चर मुहैया करवाने की प्राधिकारियों की क्षमता से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं. 

इस सबसे कीमती प्राकृतिक संसाधन तक पहुंचने के लिए कई भारतीयों को गैरमामूली चरम रास्ते अपनाने पड़े हैं. जल शक्ति मंत्रालय का अनुमान है कि भारत हर साल 253 अरब घन मीटर भूमिगत पानी उलीचता है, जो 250 डल झीलों को खाली कर देने के बराबर है. भारत दुनिया का एक चौथाई भूमिगत पानी निकालता है, जिसने देश के कई हिस्सों को तीव्र संकट की तरफ धकेल दिया है.

फिर भी यह कभी पूरा नहीं पड़ता. भारत की पानी की कहानी भीषण कुप्रबंध, प्रचुर बारिश के पानी को रोकने और जमा करने या किफायत से उसका इस्तेमाल करने की नाकाबिलियत की कहानी है. देश के कई हिस्से बाढ़ से त्रस्त हैं तो कई दूसरे एकदम सूखे. तीस फीसद भारत पानी के तीव्र संकट वाले इलाकों में रहता है. दोहरी तकलीफ यह कि करीब 89 फीसद भूमिगत जल कृषि के लिए उलीचा जाता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि हमने अब भी ड्रिप इरिगेशन सरीखे सूक्ष्म सिंचाई के तरीके नहीं अपनाए और हमारी कृषि उत्पादकता दर दुनिया की बदतरीन दरों में से एक है.

संकट की गंभीरता को पहचानकर इस सरकार ने जल जीवन मिशन के ‘हर घर नल से जल’ कार्यक्रम के तहत सालाना 3 करोड़ नए घरों में नल का जल पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है. मोदी सरकार ने इस काम के लिए 3.6 लाख करोड़ रुपए रखे हैं और इसकी प्रगति की निगरानी के लिए उन्नत टेक्नोलॉजी काम में लाई जा रही हैं.

ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (पब्लिशिंग) राज चेंगप्पा ने इस विषय पर विशेष अंक का तानाबाना बुना है, जिसके लिए संवाददाताओं ने देश भर के दौरे किए और मिशन की प्रगति का जायजा लिया. हमें यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि समुदाय जल योद्धाओं में बदल गए हैं और अपनी जिंदगी के इस बेहद अहम मसले के नए-नवेले समाधान निकाल रहे हैं.

हमारी टीम ने अहमदाबाद के नजदीक नटवरगढ़ गांव का दौरा किया. यह पानी के संकट से ग्रस्त गांव था, जिसे हमने 2003 में अपनी पत्रिका के आवरण पर पेश किया था. यह गांव अब पानी से लबालब है, उस नर्मदा नहर की बदौलत जो 2018 में यहां पानी लेकर आई. दूसरे नवोन्मेषी समाधान पानी की निगरानी के लिए टेक्नोलॉजी का प्रयोग करते हैं. एक और अहम बदलाव पानी के वितरण की परियोजनाओं में सामुदायिक भागीदारी है.

चेंगप्पा ने गुजरात की एक पानी समिति का दौरा किया जहां महिलाएं समूचा जल वितरण नेटवर्क चलाती हैं. ड्रिप इरिगेशन सरीखी सूक्ष्म सिंचाई योजनाएं हैं और कम खर्च वाली टेक्नोलॉजी—पुश्ते बांधना—या बड़ी परियोजनाएं भी, मसलन गुजरात की एक वह परियोजना जिसमें राज्य सरकार अपने सूखे इलाकों में नहरों के जरिए नर्मदा का पानी और खुशहाली लेकर आई. केंद्र का जल जीवन मिशन 2024 तक 12.7 करोड़ ग्रामीण घरों को नल से पेयजल देने का वायदा करता है. इस एक योजना की बदलावकारी संभावनाएं हैरान कर देने वाली हैं.

अलबत्ता इन तमाम पहलों की कुंजी उनका टिकाऊ होना है. संयुक्त राष्ट्र का 2020 का एक अध्ययन बताता है कि पानी और जलवायु परिवर्तन आपस में गहराई से जुड़े हैं. रिपोर्ट कहती है कि दक्षिण एशिया को 2030 तक बाढ़ों की कीमत हर साल 215 अरब डॉलर (15.6 लाख करोड़ रुपए) से चुकानी पड़ सकती है; दूषित जल स्रोत जल बिंदुओं और साफ-सफाई की सुविधाओं को नष्ट कर रहे हैं.

हमारे सामने कहीं ज्यादा बड़ी चुनौती खपत से है—अनुमान सुझाते हैं कि अगर हम मौजूदा रफ्तार से पानी की खपत जारी रखते हैं तो भारत के पास 2030 तक अपनी जरूरत का महज आधा पानी होगा. बड़ा संकट बस नौ साल दूर है. अगर हम सही विकल्प नहीं चुनते, तो तय मानिए पानी को लेकर विवाद, विरोध, अशांति, लड़ाई-झगड़े और यहां तक कि युद्ध भी भड़क सकते हैं. यह नया तेल होगा बशर्ते यह पहले ही न हो गया हो. 

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