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प्रधान संपादक की कलम से

कांग्रेसजनों के लिए अब खड़े होने और अविश्वसनीय साख दुबारा हासिल करने का वक्त आ गया है. उसे एक परिवार का बंधक बनाकर नहीं रखा जा सकता

क्या कांग्रेस राख से उठ खड़ी हो सकती है? क्या कांग्रेस राख से उठ खड़ी हो सकती है?

अरुण पुरी

करीब दो साल पहले लोकसभा चुनाव के बाद भारत की ग्रैंड ओल्ड पार्टी को बुरी तरह क्षत-विक्षत देखकर हमने आलंकारिक ढंग से पूछा था कि ''क्या कांग्रेस राख से उठ खड़ी हो सकती है?'' अभी हाल में अगस्त 2020 की एक आवरण कथा ''क्यों बिखर रही कांग्रेस?'' में हमने पता लगाने की कोशिश की थी कि क्या गांधी परिवार के लिए रुखसत होने का वक्त आ गया है. यह सवाल अब नए सिरे से मौजूं हो उठा है, जब भारत की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी लगातार नाकामी के गर्त में समाती जा रही है.

मार्च 2020 में उसने मध्य प्रदेश गंवा दिया और पिछले ही महीने वह दक्षिण के उस एकमात्र राज्य से बेदखल हो गई जहां उसका नियंत्रण था—पुदुच्चेरी. कांग्रेस अपने दम पर अब केवल तीन राज्यों में सत्ता में है—पंजाब, छत्तीसगढ़ और राजस्थान—और यह बीते सात दशकों में उसकी सबसे छोटी राष्ट्रीय मौजूदगी है. वह कोई ऐसा व्यक्ति नहीं खोज पाई जो दिवंगत अहमद पटेल सरीखे नेपथ्य से काम करने वाले सिपहसालार की जगह ले सके. ज्योतिरादित्य सिंधिया सरीखे नेताओं के जाने से पैदा चुनौती को उसने बेहद कम करके आंका.

किसानों के देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों से कांग्रेस नदारद थी. गुजरात में हाल में हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में वह गद्दीनशीन भाजपा के सामने टिक न पाई और बची-खुची जमीन आम आदमी पार्टी के हाथों गंवा दी. अगले महीने चुनावों का सामना करने जा रहे सभी पांच राज्यों में कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल है, लेकिन अजीब बात है कि उनमें से किसी में भी उसे सत्ता विरोधी भावना का फायदा मिलने की संभावना नहीं जताई जा रही. पश्चिम बंगाल में उसने सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और विपक्षी भाजपा के खिलाफ तिकोने मुकाबले के लिए माकपा से हाथ मिलाया है. केरल में उसका मुकाबला पिनाराई विजयन की अगुआई वाली मजबूत सत्तारूढ़ माकपा से है. वहां राज्य के बेजान नेतृत्व ने उसे खोखला कर दिया है. असम में उसने 15 साल हुकूमत की थी, अब गद्दीनशीन भाजपा के खिलाफ बेहद मुश्किल काम उसके सामने है. तमिलनाडु में डीएमके की सत्ता की लड़ाई में वह जूनियर पार्टनर है. लगता यही है कि इस पार्टी ने मौके गंवाने का कोई मौका नहीं छोड़ा.

उसके घावों पर नमक छिड़कते हुए सात कांग्रेस नेताओं ने, जिनमें दो पूर्व मुख्यमंत्री—भूपिंदर सिंह हुड्डा और गुलाम नबी आजाद—और राज बब्बर, मनीष तिवारी और आनंद शर्मा सरीखे पूर्व मंत्री शामिल थे, बीते हफ्ते जम्मू में एक रैली करके ऐलान किया कि पार्टी कमजोर हो रही है और वे उसे मजबूत करने के लिए एक साथ आए हैं. ये नेता 23 कांग्रेसियों के एक समूह तथाकथित जी-23 के हिस्से हैं, जिन्होंने पिछले साल 15 अगस्त को सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखी थी और संगठन चुनाव करवाने के साथ-साथ ज्यादा 'सक्रिय और उपलब्ध नेतृत्व' की मांग की थी. जम्मू में शर्मा ने पश्चिम बंगाल में इंडियन सेक्युलर फ्रंट से गठजोड़ पर भी पार्टी पर हमला किया. पार्टी धीरे-धीरे खुद को ही कुतरती मालूम देती है.

भूमिकाएं अजीब ढंग से बदल गई हैं. कांग्रेस में सत्तारूढ़ पार्टी सरीखा आत्मसंतोष घर कर गया लगता है, जबकि सत्तारूढ़ भाजपा और मोदी-अमित शाह की जिद्दी जोड़ी विपक्षी पार्टी सरीखी अथक आक्रामकता दिखा रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चतुराई से उसके सारे नारे हथिया लिए हैं और खुद को महान सुधारक और गरीब-समर्थक नेता के तौर पर पेश कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस को लगातार अपनी हिंदू साख साबित करने की तरफ धकेल रहे हैं. कह पाना मुश्किल है कि सत्तारूढ़ पार्टी के लिए पंचिंग बैग होने के अलावा कांग्रेस आज वाकई किन मुद्दों के पक्ष या विपक्ष में खड़ी है.

सरकार के खिलाफ प्रहार करने वालों में प्रमुख उसके पूर्व अध्यक्ष 50 वर्षीय राहुल गांधी ही हैं, जो किसी आधिकारिक पद पर नहीं हैं. उनका झुकाव भी प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ ऐसे मुद्दे उठाने पर होता है जो या तो उलटे उन्हीं को भारी पड़ते हैं या लोगों के गले नहीं उतरते, चाहे वह 'मोदी चोर है' नारा हो, राफेल खरीद में भ्रष्टाचार के आरोप हों या चीनी घुसपैठ को लेकर सरकार पर कायरता के आरोप. सोनिया गांधी दो साल से अंतरिम अध्यक्ष हैं और उनकी सेहत नाजुक है. प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश की प्रभारी महासचिव हैं, जो ज्यादातर वक्त राज्य के बाहर बिताती हैं.

कांग्रेस, जितनी भी बची हुई है, अब भी मानती है कि उसकी रोजी-रोटी गांधी परिवार से ही चलेगी. नतीजा: गांधी परिवार के भाई-बहन गाहे-ब-गाहे चुनाव अभियान पर निकल पड़ते हैं. राहुल गांधी हाल में समुद्र में गोता लगाकर और छात्रों के साथ दंड-बैठक के मुकाबले में शामिल होकर अवाम से जुड़े शख्स होने की छवि बनाने का जतन करते देखे गए. प्रियंका ने असम में चाय की पत्तियां तोड़ते हुए फोटो खिंचवाकर और अपनी पार्टी की तरफ से सेंध लगाने की कोशिश करके एकदम दौड़ते हुए शुरुआत की. लेकिन यह देर से और नाकाफी भी हो सकता है.

पार्टी बदहाल है. जमीन पर उसके पास न कार्यकर्ता हैं न नेता. इससे भी बदतर यह कि जो ब्रांड गांधी कभी पार्टी को जोड़कर रखता था, वह ताकत और चुनावी बाजार में अपनी मौद्रिक साख गंवा चुका है. विडंबना यह है कि ऐसा तब हो रहा है जब हाल के सालों में पहली बार परिवार के तीन सदस्य राजनीति में सक्रिय हैं. अलबत्ता पार्टी में नई जान फूंकने के बजाए यह गांधी त्रयी लगातार बढ़ती खाई की सदारत करती मालूम देती है. पार्टी के तीन में से दो मुख्यमंत्री—अमरिंदर सिंह और अशोक गहलोत—अब स्वतंत्र क्षत्रप हैं जिन्होंने इशारा कर दिया है कि अपने राजनैतिक अस्तित्व के लिए वे गांधी परिवार के ऋणी नहीं हैं.

हमारी आवरण कथा, 'गांधी परिवार का अकेलापन', जो डिप्टी एडिटर कौशिक डेका ने लिखी है, कांग्रेस के प्रथम परिवार की उस विडंबना पर ध्यान केंद्रित करती है, जिसमें वह स्वयं को पहले किसी भी समय से कहीं ज्यादा दिशाहीन और अलग-थलग पा रहा है. पार्टी में अब भी कई प्रतिभावान और अनुभवी लोग हैं जो मौका मिलने पर पार्टी को नए सिरे से खड़ा कर सकते हैं. अपनी तमाम गूंजती हुई चुनावी फतहों के बावजूद भाजपा अब भी आखिरकार देश भर में ज्यादा से ज्यादा महज 37.6 फीसद वोट ही पाती है.

लोकतंत्र सेहतमंद तरीके से काम करे, इसके लिए जीवंत विपक्ष की भी जरूरत है. विडंबना यह है कि तमाम गलतियों के बावजूद कांग्रेस हमारी अकेली दूसरी राष्ट्रीय पार्टी है, भले ही वह अपने अतीत की फीकी छाया भर बनकर रह गई हो. यह देश की मातृ पार्टी है, जिसने सियासी फलक पर कम से कम से नौ सक्रिय पार्टियों को जन्म दिया है. कांग्रेसजनों के लिए अब खड़े होने और अविश्वसनीय साख दुबारा हासिल करने का वक्त आ गया है. उसे एक परिवार का बंधक बनाकर नहीं रखा जा सकता.

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