scorecardresearch
 

प्रधान संपादक की कलम से

कोविड-19 वायरस अब भी छिपा हुआ और खामोश दुश्मन है जिसके बारे में हम ज्यादा नहीं जानते. हमेशा सतर्क रहें. यही हमारी अकेली उम्मीद है

16 दिसंबर, 2020 16 दिसंबर, 2020

अरुण पुरी

 

कोविड-19 का अध्ययन करने वाले महामारी विज्ञान के बहुत-से मॉडल 2020 में भारत की बर्बादी के अनुमान लेकर आए थे. मार्च में जब भारत ने असाधारण राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लगाया, वाशिंगटन डीसी स्थित जन स्वास्थ्य अनुसंधान संगठन के एक विशेषज्ञ ने भारत में 30 करोड़ मामलों और 2,00,000 से 2,50,000 तक मौतों की भविष्यवाणी की थी. अगस्त में यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के इंस्टीट्यूट फॉर पब्लिक हेल्थ ऐंड मैट्रिक्स इवैल्युएशन ने प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों के आंकड़ों पर आधारित एक अध्ययन किया और साल के अंत तक भारत में करीब 5,00,000 मौतों का अनुमान जाहिर किया था. इन भयावह अनुमानों पर यकीन करना आसान था. घने बसे शहरी केंद्रों और दयनीय स्वास्थ्य ढांचे के साथ भारत तबाही के लिए तैयार खड़ा मालूम पड़ता था. हमारी खुशकिस्मती से इनमें से कोई भी मनहूस भविष्यवाणी सच नहीं हुई.

इस साल 9 फरवरी को भारत में 24 घंटों के भीतर कोविड-19 के 9,000 से भी कम नए मामले दर्ज किए गए. 10 सितंबर 2020 को 95,735 मामलों के शिखर से ये बीते आठ महीनों में सबसे कम मामले थे. 9 फरवरी को भारत में कोविड के मामले 1.08 करोड़ और मौतें 1,55,195 थीं, जबकि अमेरिका में ये आंकड़े क्रमश: 2.7 करोड़ और 4,65,000 थे. उस देश की कुल आबादी 32 करोड़ है और इसको देखते हुए अमेरिका में प्रति व्यक्ति संक्रमण भारत के मुकाबले 12 गुना ज्यादा था.

अब जब पश्चिम इस वायरस की नई लहरों से जूझ रहा है, भारत खरामा-खरामा रास्ते पर लौट रहा है. अर्थव्यवस्था अगले साल तक पूरी बहाली की राह पर है और शेयर बाजार में बहार है. स्कूल और कॉलेज, सिनेमाघर और मॉल धीरे-धीरे खुल रहे हैं और हवाई जहाज तकरीबन पूरी यात्री क्षमता से उड़ रहे हैं.

पिछले पूर हफ्ते भारत के 718 में से 188 जिलों से कोविड-19 के नए मामलों की कोई सूचना नहीं आई. मृत्यु दर तेजी से गिर रही है और 16 फरवरी को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली ने एक दिन में महज 94 मामले दर्ज किए, जो नौ महीने में उसके सबसे कम मामले थे.

भारत ने उन खौफनाक भविष्यवाणियों को आखिर कैसे झुठला दिया? इस प्रश्न ने कई विशेषज्ञों को उलझन में डाल दिया है. उत्तर शायद कई बातों के जोड़ में है—युवा जनसांख्यिकी, दबी-छिपी हर्ड इम्युनिटी या सामूहिक रोग प्रतिरोधक शक्ति और शुरुआत में ही कठोर लॉकडाउन.

सबसे पहले तो भारत को युवाओं की बहुतायत का फायदा मिला. हमारी 65 फीसद आबादी 35 साल से कम उम्र की है. कोविड से मरने वाले हर 10 में से आठ भारतीय 45 साल से ऊपर की उम्र के थे.

सेरोलॉजी के अध्ययनों से भी उजागर हुआ है कि मामलों की वास्तविक संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा हो सकती है. मतलब वायरस से संक्रमित होने वाले तमाम लोग लक्षणविहीन थे; यानी उनमें ऐसे कोई लक्षण ही दिखाई नहीं दिए कि वे जांच करवाते और संक्रमित लोगों में गिने जाते. मसलन, भारत की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती धारावी के 60 फीसद बाशिंदे इस वायरस के संपर्क में आए, जो बताता है कि इस इलाके ने हर्ड इम्युनिटी हासिल करके कोविड को पछाड़ दिया हो सकता है.

24 मार्च 2020 को अचानक लगाए गए लॉकडाउन को हालांकि विवादास्पद माना जा रहा था, पर शायद इसी ने वायरस को तेजी से फैलने से रोका और देश को अपने स्वास्थ्य ढांचे को बढ़ाने-चमकाने का मौका दिया. जिस एक और क्षेत्र में भारत ने अच्छा काम किया दिखता है, वह है टीकाकरण अभियान. महज 24 दिनों में देश ने करीब 70 लाख लोगों को टीके लगाने में कामयाबी हासिल की. यह लक्ष्य पाने में अमेरिका को 26 और ब्रिटेन को 46 दिन लगे. जिस देश को कोविड-19 की छाया में कुम्हला जाना था, वह 20 देशों को वैक्सीन की 1.6 करोड़ से ज्यादा खुराक निर्यात कर चुका है. सात और स्वदेशी कोविड वैक्सीन पर शोध जारी है और गृह मंत्री अमित शाह कह रहे हैं कि भारत दुनिया की कोविड वैक्सीन की 70 फीसद मांग पूरी करने की तैयारी में है.

हमने कोविड को पछाड़ दिया है क्या? इस बड़े सवाल का जवाब ढूंढने के लिए एसोसिएट एडिटर सोनाली आचार्जी ने भारत के शीर्ष चिकित्सा विशेषज्ञों से बात की. उन्हें पता चला कि जरा भी आत्मसंतोष और असावधानी हमें फिर खतरे में डाल सकती है. मुंबई को ही लीजिए, जहां लोकल ट्रेन सेवाओं के शुरू होने और स्कूलों के खुलने के साथ संक्रमण का नया प्रकोप सामने आया है. हम अब भी यकीन के साथ नहीं कह सकते कि हम ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और ब्रिटेन में पाए गए कोविड-19 के नए रूपों को संभाल सकते हैं या नहीं.

वैक्सीन विशेषज्ञों को अब भी पूरी तरह नहीं मालूम कि मौजूदा वैक्सीन जिंदगी भर की सुरक्षा देंगी या हर साल कोविड की नई वैक्सीन विकसित करनी होंगी. हमें याद रखना होगा कि वैक्सीनों को आपात मंजूरियां दी गई हैं, जो डब्ल्यूएचओ के नियमों के मुताबिक उनका 50 फीसद असर साबित होने के बाद ही दे दी जाती हैं. भारत में ऐस्ट्राजेनेका वैक्सीन का ही डेटा मौजूद है और उसके मुताबिक इसका 53-80 फीसद असर होता है, जो खुराक की संख्या और उनके बीच फासले पर निर्भर करता है. दूसरी वैक्सीन के डेटा की तस्दीक अभी होनी है.

चिंता की बात यह है कि वैक्सीन को लेकर हिचकिचाहट ने टीके लगाने के अभियान को धीमा कर दिया है. दो वैक्सीन, कोवैक्सिन और कोविशील्ड, व्यापक रूप से मौजूद हैं, इसके बावजूद टीके के लिए पंजीकृत 65 फीसद लोग ही लगवाने आए और जिन्होंने पहली खुराक ली उनमें से भी 37.5 फीसद ही दूसरी खुराक के लिए आए. सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया अपनी वैक्सीन की कोई 5.5 करोड़ खुराक लिए बैठी है और इनका इस्तेमाल होने तक उसने मैन्युफैक्चरिंग रोक दी है. यह अच्छी खबर नहीं क्योंकि हमारी आर्थिक बहाली वैक्सीन के जरिए आबादी के बड़े हिस्से के संक्रमण से सुरक्षित होने पर निर्भर है. महामारी की स्थिति को लेकर कई सवाल कायम हैं. दूसरे देशों में तीव्र दूसरी लहर देखी गई है. इसकी भारत में भी निश्चित आशंका है, खासकर जब देश की अर्थव्यवस्था खुल रही है. वायरस की प्रकृति को लेकर अब भी नई-नई खोज सामने आ रही हैं, जबकि वैक्सीन को दी गई मंजूरियों के नतीजे अभी पता नहीं हैं.

विशेषज्ञों की सलाह है कि वैक्सीन अभियान के बावजूद हम सामाजिक दूरी और साफ-सफाई के नियम-कायदों का पालन करें. कोविड-19 वायरस अब भी छिपा हुआ और खामोश दुश्मन है जिसके बारे में हम ज्यादा नहीं जानते. हमेशा सतर्क रहें. यही हमारी अकेली उम्मीद है.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें