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प्रधान संपादक की कलम से

बजट 2021-22, आर्थिक दिशा में भारत के एक बड़े बदलाव की ओर अग्रसर होने के लिए एक स्पष्ट आह्वान है. हालांकि मंदी के बीच बजट पेश करना वैसा ही है जैसे किसी तूफान में ड्राइविंग के दौरान मानचित्र देखना.

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अरुण पुरी

यह मेरे कानों के लिए मीठे संगीत जैसा आनंद देने वाला था जब मैंने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को अपने बजट भाषण में यह कहते हुए सुना, ''महोदय, मैं अब हमारी सरकार के 'न्यूनतम सरकार, अधिकतम राजकाज' के मूल सिद्धांतों पर आती हूं.'' यह वह ऐतिहासिक नारा था जो 2014 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने गढ़ा था और इसकी व्याख्या करते हुए बताया था कि ''व्यापार, सरकार का काम नहीं है.'' इसने मुझे आशा दी थी कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए-1 सरकार के शुरू किए विनिवेश कार्यक्रम को पूर्ण बहुमत वाली एनडीए-2 सरकार, कहीं अधिक आक्रामक अंदाज में आगे बढ़ाएगी. इसके अलावा, उम्मीद जगी थी कि यूपीए की कल्याणकारी राज्य की उस मानसिकता जिसमें आर्थिक सुधारों पर अपर्याप्त ध्यान दिया गया, के उलट देश की आर्थिक समस्याओं को हल करने के लिए एक अधिक बाजार-चालित दृष्टिकोण को अपनाया जाएगा. हालांकि, निर्वाचित होने के तुरंत बाद मोदी सरकार ने सुधार के लिए अपनी वह दिलचस्पी तब खो दी, जब वह अपने भूमि अधिग्रहण विधेयक को पारित करने में विफल रही और राहुल गांधी ने उस पर 'सूट-बूट की सरकार' होने के धुंआधार आरोप लगाए. उसके बाद अगले छह वर्षों में अधिकतम सरकार, और जितना संभव हो सके उतनी अधिक सरकार का रुख दिखा. नौकरशाही की पकड़ मजबूत हो गई. यहां तक कि मंत्रियों को भी दरकिनार करते हुए प्रवर्तन एजेंसियां सारी सीमाएं लांघती चली गईं. ऐसा लगता था जैसे निजी तथा सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों में निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया को लकवा मार गया हो. नवंबर 2016 में हुई नोटबंदी निष्फल रही. महामारी की चपेट में आने से दो साल पहले से ही अर्थव्यवस्था में गिरावट आ रही थी.

इसलिए बजट 2021-22, आर्थिक दिशा में भारत के एक बड़े बदलाव की ओर अग्रसर होने के लिए एक स्पष्ट आह्वान है. हालांकि मंदी के बीच बजट पेश करना वैसा ही है जैसे किसी तूफान में ड्राइविंग के दौरान मानचित्र देखना. भारत में कोविड-19 संक्रमण का आंकड़ा घट रहा है और अब तक 37 लाख लोगों को टीका लगाया जा चुका है, लेकिन अर्थव्यवस्था अब भी आइसीयू में ही है. महामारी और उसके कारण हुए लॉकडाउन की दोहरी मार से जीडीपी में इस साल 7.7 प्रतिशत का संकुचन देखा जाएगा. बेरोजगारी बढ़ी है और छोटे और मध्यम व्यवसाय मर रहे हैं.

सरकार जोर-शोर से प्रयास कर रही है. इसने स्वास्थ्य पर खर्च में 137 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है और स्वास्थ्य एवं कल्याण पर 2.23 लाख करोड़ रुपए खर्च करेगी. 25 जनवरी की हमारी आवरण कथा, 'कैसे मिटे मंदी' में हमारे विशेषज्ञों के पैनल ने जो सुझाव दिए थे, बजट में उस पर अमल दिखता है. सरकार ने हिसाब-किताब में पारदर्शिता दर्शाते हुए राजकोषीय घाटे को रिकॉर्ड 9.5 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है. इसने बजट में पूंजीगत व्यय को 34 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है. उदाहरण के लिए, रक्षा आवंटन में पूंजीगत व्यय में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जिससे सशस्त्र बल, सीमा पर चीनी खतरे का सामना करने के लिए आवश्यक नए साजो-सामान खरीदेंगे. सरकार की योजना अर्थव्यवस्था को तेजी से सुधार की ओर ले जाने और मंदी से प्रभावित लाखों लोगों को रोजगार देने की है. इन सब के लिए पैसे की जरूरत है. बहुत सारे पैसे की जरूरत है.

कहते हैं, आवश्यकता, आविष्कार की जननी है. इस बजट में विपक्ष की ओर से अपेक्षित देश की संपत्ति बेचने के आरोपों को नजरअंदाज करते हुए सरकार ने साहस का भरपूर परिचय दिया है. बजट 2021-22 सरकार द्वारा अपनी संपत्ति के मौद्रिकीकरण और सरकार नियंत्रित सार्वजनिक उपक्रमों में महत्वपूर्ण हिस्सा बेचने का संकल्प दिखाता है. सरकार बंदरगाहों, बैंकों, बीमा फर्मों रेलवे परिचालन का निजीकरण करना चाहती है. इसने 2021-22 के लिए 1.75 लाख करोड़ रुपए का नया विनिवेश लक्ष्य रखा है.

बेशक, सरकार का यह विनिवेश मंत्र नया नहीं है.

अर्थव्यवस्था को तेजी से गति देने के लिए वित्त मंत्री ने पिछले साल जिन सरकारी हस्तक्षेपों की घोषणा की थी, उन्हें आगे भी जारी रखने की जरूरत है. उन हस्तक्षेपों में विनिवेश भी शामिल था और सरकार ने कहा था कि वह रणनीतिक क्षेत्रों में चार सार्वजनिक उपक्रमों से अधिक नहीं रखेगी. निवेश और लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (डीआइपीएएम) को वित्त वर्ष 2021 के लिए 2.1 लाख करोड़ रुपए का विनिवेश लक्ष्य दिया गया था, लेकिन इसके मात्र 32,000 करोड़ रुपए तक पहुंचने की ही उम्मीद है. वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में बाजार के रिकॉर्ड ऊंचाई छूने के बावजूद वित्तीय प्रणाली से नकदी निकलती रही. यही समस्या का मूल है. क्रियान्वयन.

हमारा कवर पैकेज, 'दमदार सुधार', बड़े पूंजीगत परिव्यय के माध्यम से सरकार के आर्थिक पुनरुद्धार पैकेज पर केंद्रित है जो न केवल नौकरियां बल्कि परिसंपत्तियों का भी सृजन करेगा. इस सुधार का आंशिक वित्त पोषण सरकारी होल्डिंग्स को बेचकर किया जाएगा. सरकार निजीकरण के माध्यम से संसाधनों को बढ़ाने और सार्वजनिक संपत्ति के मौद्रिकीकरण पर दांव लगा रही है. हमारे ब्यूरो ने इस डील के पीछे की राजनीति, विनिवेश रणनीति और रक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे प्रमुख क्षेत्रों के लिए सरकार की योजनाओं की थाह लेने की कोशिश की है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि निजीकरण के लिए सरकार को ऐसे वित्तीय विशेषज्ञों के साथ परामर्श करके एक समयबद्ध कार्यक्रम तैयार करने की आवश्यकता है जिन्हें इस तरह के कार्यों का अनुभव है. इस तरह के निर्णय लेने वालों को भविष्य के अभियोजनों से सुरक्षित किए जाने की भी जरूरत है. उनके साथ वह नहीं होना चाहिए जो वाजपेयी सरकार में विनिवेश मंत्री रहे अरुण शौरी के साथ हुआ. सीबीआइ की एक विशेष अदालत ने 18 साल पहले हुई आइटीडीसी होटल की बिक्री के सिलसिले में शौरी और चार अन्य के खिलाफ पिछले साल गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया था. आखिरकार, राजस्थान हाइकोर्ट ने हस्तक्षेप किया और गिरफ्तारी पर रोक लगाई. यह ऐसे किसी भी व्यक्ति को डराने के लिए पर्याप्त है जो सरकार के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम को क्रियान्वित करने में जुटा हो.

अगर सरकार इस तरह की अड़चनों पर काबू पा लेती है और अपने संकल्प के साथ डटी रहती है, तो उसके लिए संभावनाओं के कई द्वार खुल सकते हैं. पीएसयू और रक्षा तथा रेलवे जैसे विभाग, जिनके पास विशाल भूमि है, अपनी जरूरत से अधिक भूमि को बेचकर सरकार के खजाने में खासा योगदान कर सकते हैं. सार्वजनिक क्षेत्र के 80 उपक्रमों का 81,444 करोड़ रुपए का संचयी नुक्सान, सरकारी खजाने के लिए जोंक साबित हो रहा है. दूसरी ओर हिंदुस्तान जिंक, जिसमें अपनी 45 प्रतिशत हिस्सेदारी सरकार ने 769 करोड़ रुपए में 2002 में बेच दी थी और बाद में कुछ और हिस्सेदारी भी बेची थे, ने 2004 से 2020 के बीच सरकार को 17,690 करोड़ रुपए लाभांश के रूप में दिए और सरकार की इसमें वर्तमान मात्र 29.55 प्रतिशत हिस्सेदारी का मूल्य भी 36,041 करोड़ रुपए आंका गया है. भारत में ऐसे उद्यमों की भरमार है.

हमारे देश में सुधार लाने में जितनी बड़ी भूमिका संकट निभाते हैं उतनी कोई और नहीं निभा सकता. व्यापार से बाहर निकलने की सरकार की सारी तैयारियां सुस्त निष्पादन या उसके लिए कोई उत्साह न होने जैसी बाधाओं की भेंट चढ़ जाती हैं. यही वह जगह है जहां प्रधानमंत्री मोदी और वित्त मंत्री सीतारमण को ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होगी. उन्हें उनके अच्छे इरादों के लिए नहीं, बल्कि अपनी योजनाओं के कुशलतापूर्ण अमल के लिए आंका जाएगा. अन्यथा कई अन्य सरकारी योजनाओं की तरह, विनिवेश और निजीकरण की गति भी संभवत: वही होगी- सुनने में अच्छा लेकिन परिणाम में फुस्स.

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